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उपभोक्ता इतना लाचार क्यों

जिस विशाल उपभोक्ता वर्ग के बूते हम अपनी अर्थव्यवस्था की सटीक रखवाली कर रहे हैं, उसके अधिकारों की रक्षा, समूची अर्थव्यवस्था के बचाव के लिए जरूरी है। सरकारी नीतियों के संपूर्ण क्रियान्वयन और तेजी से...

उपभोक्ता इतना लाचार क्यों
Shashi Shekharहिन्दुस्तानSun, 09 Oct 2022 06:52 PM
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दिवाली से तीन हफ्ते पहले आई यह खबर उत्साह बढ़ाती है। इस कठिन दौर में जब समूचा अमेरिका, यूरोप और चीन मंदी की आशंकाओं से थरथरा रहा है, तब सिर्फ सात देश ऐसे हैं, जो विपरीत हवाओं में अपनी मशाल जलाए रखने में कामयाब हैं। भारत उनमें से एक है। हिन्दुस्तान को यह विशिष्ट स्थान क्यों हासिल हुआ? जवाब साफ है, हमारा विशाल उपभोक्ता वर्ग, खाद्यान्न में आत्मनिर्भरता, तेजी से बढ़ते पेशेवर और सरकार की प्रोत्साहन नीतियां।

खाद्यान्न उपलब्ध कराने वाले खेतों और खेतिहरों की बात फिर कभी, आज हम पेशेवरों, उपभोक्ताओं के हालात और उनके हक-हुकूक पर चर्चा केंद्रित करते हैं। कैसे हैं उनके हालात? इस सवाल का जवाब देने से पहले मेरे एक कुटुंबी की आपबीती सुनिए। वह पेशे से डॉक्टर है और उसके साथ यह वाकया गुजरे हफ्ते की एक सुबह पेश आया।

हुआ यूं कि उसका ड्राइवर छुट्टी पर था और उसने एक नौजवान पेशेवर की भांति ओला या उबर का सहारा लेने का फैसला किया। उसने इनमें से एक कंपनी की टैक्सी बुक कराई। उसे तत्काल ‘कन्फर्मेशन’ का संदेश मिल गया और साथ ही टैक्सी का विवरण भी। डॉक्टर ने इस तत्परता पर प्रसन्नता जाहिर करते हुए अपने घर वालों से कहा- अरे, अब तो मैं ड्राइवर के बिना भी काम चला सकती हूं। बेचारी को मालूम न था कि अगले एक घंटे उसे किन मुसीबतों का सामना करना है।

टैक्सी चालक को पल भर न इंतजार करना पडे़, इसके लिए वह लिफ्ट की ओर लपकी। उसका फ्लैट नोएडा की सबसे अच्छी सोसायटी में से एक के 17वें माले पर है। लिफ्ट ने नीचे उतरना शुरू किया ही था कि बिजली चली गई। करोड़ों रुपये में फ्लैट बेचने वाले बिल्डर ने ऐसा कोई इंतजाम नहीं किया है कि बिजली जाने से लिफ्ट के संचालन पर असर न पड़े। अगले कुछ मिनट अंधेरे और आशंकाओं की दासता के थे। 
जैसे-तैसे वह नीचे उतरी, तो अपने टैक्सी ऐप में यह देखकर अवाक रह गई कि चालक वहीं खड़ा दिखाई दे रहा है, जहां वह ‘कन्फर्मेशन’ के समय था। उसका ‘लोकेशन’ नौ मिनट की दूरी पर अंगद के पांव की तरह अटल था। कंपनी की निर्धारित नीति के अनुसार डॉक्टर ने कॉल सेंटर नंबर पर फोन किया। दस मिनट से ज्यादा के गहन प्रयास का नतीजा यह निकला कि ड्राइवर ने ‘राइड’ कैंसिल कर दी। बेचारी डॉक्टर! दूसरी बार यही कहानी दोहराई गई। तीसरी बार उसको जो कार मुहैया कराई गई, उसके चालक ने घर (पिक अप प्वॉइंट) के पास आकर राइड कैंसिल कर दी। नतीजतन, डॉक्टर के खाते से चालीस रुपये कट गए। नियमानुसार शिकायत करने पर उसे यह धनराशि वापस मिल सकती है, मगर मामला महज रुपये का नहीं है। इन मामूली लगने वाली घटनाओं ने डॉक्टर के साथ उन मरीजों को दिक्कत में डाल दिया, जो पहले से ‘अपॉइंटमेंट’ लेकर अपने चिकित्सक का इंतजार कर रहे थे। वह जब अपने अस्पताल पहुंची, तो उसे मरीजों के साथ अपने वरिष्ठों का भी कोप झेलना पड़ा, जबकि वह स्वयं संस्थागत बदइंतजामी का शिकार बनी थी।
उपभोक्ताओं के दोषी तथाकथित बहुराष्ट्रीय टैक्सी सेवा प्रदाताओं के चालक व उनकी व्यवस्था ही नहीं, बल्कि विद्युत वितरण कंपनी और नामी-गिरामी बिल्डर भी हैं। ये सब अरबों का व्यवसाय करते हैं, लेकिन इनकी नजर में अपने उपभोक्ता का मोल कितना है? नौजवान डॉक्टर की पेशेवर फजीहत से आप इसका अंदाज लगा सकते हैं। दुर्भाग्य से यह अकेले उसकी व्यथा नहीं है। देश में हर रोज बड़ी संख्या में लोग पेशेवर सेवाओं के प्रति ऐसी बेजारी महसूस करते हैं।

भारत में सरकारी योजनाओं से लाभ उठाकर पनपने वाले उद्योगों पर लगाम लगाए जाने की बेहद आवश्यकता है। इनमें से जो कंपनियां बहुराष्ट्रीय हैं, उनका तो हाल और भी निराला है। आप वाहन उत्पादकों पर नजर डाल देखें। पश्चिम के देशों के लिए उनके सुरक्षा मानक अलग हैं और भारत जैसे विकासशील मुल्कों के लिए अलग। उन्हें हमारे रुपयों की तो फिक्र है, पर जान-माल और पर्यावरण की नहीं।
यही नहीं, आप इस तरह के एसएमएस पाकर अक्सर अचंभित हो जाते होंगे कि अमुक बैंक के आपके खाते से इतने रुपये निकाले गए या उसमें जमा किए गए हैं अथवा आपका दूसरा फोन नंबर चालू कर दिया गया है। इसी तरह, अचानक कोई बिजली कंपनी आपसे बकाया बिल के भुगतान का अनुरोध करते हुए संदेश भेज रही होती है। मैं एक ऐसे उपभोक्ता को जानता हूं, जिसने बैंक में निरंतर शिकायत की कि आपके यहां मेरा कोई खाता नहीं है, मगर मुझे निरंतर आपकी संस्था से ईमेल पर अपडेट भेजा जा रहा है, इससे मैं आशंकित हूं कि कहीं कोई असामाजिक या अराजक तत्व तो मेरे नाम का उपयोग नहीं कर रहा है? वह शख्स मेल भेजता रहा, पर बैंक की ओर से कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिला। थक-हारकर उसने ‘बैंकिंग ऑम्बड्समैन’ से शिकायत की, पर महीनों बीत जाने के बाद भी अभी तक उसे किसी तरह का संदेश प्राप्त नहीं हुआ है। उसकी समझ में नहीं आ रहा कि अब क्या करें? कहां हैं उसके हक?

यहां यदि हम उपभोक्ता अधिकारों और उनसे संबंधित आंकड़ों पर नजर डालते हैं, तो अवाक रह जाते हैं। इस वक्त देश में 629 जिला उपभोक्ता अदालतें और 35 उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग काम कर रहे हैं, जहां आप सेवा प्रदाता कंपनियों के खिलाफ 20 लाख रुपये तक की क्षतिपूर्ति का दावा कर सकते हैं। लेकिन कटु तथ्य यही है कि इन अदालतों और आयोगों के सामने आज 5.50 लाख मुकदमे लंबित हैं, जिनमें से 4,029 मामले तो 22 साल पुराने हैं। ध्यान रहे। ये मुकदमे अपने अधिकारों के प्रति जागरूक लोगों ने दायर किए हैं, पर उन्हें अगर न्याय मिलने में इतनी देर होगी, तो इससे चूना लगाने वालों का मनोबल बढ़ेगा ही।
इसी 10 जुलाई को द गार्जियन  ने उबर कंपनी के एक पूर्व आला अधिकारी मार्क मैक्गन द्वारा लीक किए गए 1,24,000 दस्तावेजों के हवाले से खुलासा किया था कि साल 2013 से 2017 के बीच अपने कारोबारी फायदे के लिए उसने पश्चिम से बाहर के मुल्कों में स्थानीय कानूनों को तोड़ने का काम किया। उन दस्तावेजों में यह तक दावा किया गया था कि आरोपी कंपनी ने दुनिया भर के स्थानीय राजनेताओं और नियामकों को प्रभावित करने के लिए अकेले 2016 में नौ करोड़ डॉलर खर्च किए थे।

ये कंपनियां अमेरिका और यूरोप में ऐसी हिमाकत क्यों नहीं कर पातीं, इसका अंदाज सिर्फ एक तथ्य से लगाया जा सकता है कि अमेरिकी उपभोक्ताओं के हितों की संरक्षक संस्था ‘फेडरल ट्रेड कमिशन’ ने जुलाई 2019 में फेसबुक इंक कंपनी पर पांच अरब डॉलर का जुर्माना लगाया था। फेसबुक को अमेरिकी ‘यूजर्स’ की निजता के अधिकारों के उल्लंघन का दोषी पाया गया था।

इसमें दो राय नहीं हो सकती कि अब वक्त आ गया है, जब देश की उपभोक्ता अदालतों की संख्या और अधिकार बढ़ाए जाएं। नियामक एजेंसियों और आयोगों के अधिकारों को भी नई धार की जरूरत है। जिस विशाल उपभोक्ता वर्ग के बूते हम अपनी अर्थव्यवस्था की सटीक रखवाली कर रहे हैं, उसके अधिकारों की रक्षा, समूची अर्थव्यवस्था के बचाव के लिए जरूरी है। सरकारी नीतियों के संपूर्ण क्रियान्वयन और तेजी से पनपते मध्यवर्ग का समुचित विकास भी इसके बिना संभव कहां? 

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