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संपादकीयकोरोना ने कई नकाब उतार दिए

शशि शेखरPublished By: Manish Mishra
Sat, 08 May 2021 08:45 PM
कोरोना ने कई नकाब उतार दिए

वह बुधवार की हांफती-कांपती सुबह थी। आशंका की कशमकश में टीवी खोला, तो स्क्रीन पर साणंद में जलाभिषेक के लिए सज-धजकर जाती महिलाओं के फुटेज देखकर कलेजा मुंह को आ गया। वजह उनका उत्सवी उत्साह नहीं, बल्कि अगली खबर थी। उस वक्त तक कोरोना गुजरे 24 घंटे में तीन लाख अस्सी हजार हिन्दुस्तानियों को अपना शिकार बना चुका था। शनिवार को ऐसी ही तस्वीरें फिर दिखाई दीं। कच्छ में एक मुस्लिम धर्मगुरु के जनाजे में हजारों लोग शरीक थे। तमाम बिना मास्क के, और आपसी दूरी का तो सवाल ही नहीं था। अब तक कोरोना के शिकारों का आंकड़ा चार लाख प्रतिदिन से अधिक पहुंच गया था।

पुलिस ने जलाभिषेक के फुटेज के वायरल होने के बाद ‘सख्त कार्रवाई’करते हुए छह आयोजकों और तमाम जलसेदारों को सीखचों के पीछे डाल दिया। कच्छ में ऐसी कोई कार्रवाई हुई या नहीं, इन पंक्तियों के लिखे जाने तक पता न चल सका था। मुझे उन लोगों की आस्था से कोई गिला-शिकवा नहीं, और पुलिस की भी वाहवाही कि उसने साणंद में कार्रवाई की, पर अगर वह थोड़ा पहले हरकत में आ गई होती, तो शायद यह जुलूस निकलता ही नहीं। ऐसे जलसे-जुलूस उन लोगों के लिए ही खतरनाक हैं, जो इन्हें रचते और सफल बनाते हैं। हर रोज सुरसा के मुंह की तरह बढ़ते आंकड़े ही इन्हें आईना नहीं दिखा पाते। कुछ ही दिनों पहले हमने हरिद्वार में महाकुंभ का आयोजन पुलिस के संरक्षण में देखा था। देश के नामी चिकित्साशास्त्री उस पर चिंता जता रहे थे। वे गलत नहीं थे। मध्य प्रदेश में कुंभ से वापस लौटे लोगों में से कुछ की जांच-परख में पाया गया कि उनमें से 99 फीसदी लोग कोरोना संक्रमित हो चुके हैं। वे कब संक्रमित हुए होंगे? उनकी वजह से अन्य कितने लोग इस जानलेवा बीमारी की चपेट में आए होंगे? इन सवालों के जवाब मिलने मुश्किल हैं, पर हमें अगर वैज्ञानिकों की चेतावनियां नहीं सुनाई पड़ रहीं, तो क्या आस-पास नए बनते श्मशान, छोटे पड़ते कब्रिस्तान, मरीजों को भरती करने से मना करते अस्पताल और ऑक्सीजन के अभाव में तड़प-तड़पकर मरते लोग भी नहीं दीख रहे? वक्त आ गया है, जब हम अपने सामाजिक तौर-तरीकों में आवश्यक सुधार की सोचें, पर पहले सियासत और सत्ता की बात। पिछले साल ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने अपने देशवासियों से कहा था कि यह बहुत भयानक बीमारी है। हम इसके चलते अपने तमाम प्रियजन गंवा सकते हैं। वहां जो तबाही गुजरी, वह अपनी जगह है, पर आज हमारा देश उसी अभागी व्यथा को जी रहा है। भारत में तो किसी नेता में यह नैतिक साहस भी नहीं कि वह जॉनसन के अंदाज में देश को आगाह कर सके। अगर ऐसा करते, तो चुनाव सभाएं रद्द करनी पड़ जातीं। जिन क्षेत्रों में दहाड़-दहाड़कर वोट मांगे गए, वहां अब कोरोना पांव पसार रहा है। कमाल देखिए! बिहार से लेकर बंगाल तक, जहां सर्वाधिक आग उगलता चुनाव लड़ा गया, कहीं भी ‘स्वास्थ्य’ कोई मुद्दा ही नहीं था।

आरोप भले ही लगाए जा रहे थे कि अमुक पार्टी कोरोना फैला रही है, पर सच यही है कि इस तरह की आग उगलने वालों ने ऐसा कुछ नहीं किया था, जिससे उनके लोगों की सेहत दुरुस्त रह सके। कोरोना ने राजनीति के चेहरे पर पडे़ सारे नकाब उतारकर फेंक दिए हैं। तय है, सियासत को अब अपनी रीति-नीति बदलनी होगी, क्योंकि कोरोना ने राजनीति के हम्माम के दरवाजे आमजन के लिए खोल दिए हैं। वहां सभी सियासी दल समान मुद्रा में पाए गए हैं। किसी एक से गिला करना सच से मुंह मोड़ने जैसा होगा। आप पूछ सकते हैं कि जब सब एक से हैं, तो बदलाव होगा कैसे? बताता हूं। कई बार ऐसा हुआ है, जब तंत्र ने लोक की अनदेखी की, तो लोक ने उसके संचालकों के चेहरे बदल दिए। 1977 की इंदिरा गांधी को याद कीजिए। वह सत्ता के शीर्ष पर थीं। ‘इमरजेंसी’ ने उनके हाथों में अकूत अधिकार दे रखे थे, पर वह जान ही न सकीं कि कब तंत्र उनके हाथ से निकल गया। नसबंदी और पुलिस ज्यादती ने उन्हें अगले चुनाव में कहीं का नहीं छोड़ा। बात यहीं खत्म नहीं हुई। जनता पार्टी के हुक्मरानों ने भी ऊल-जुलूल हरकतें शुरू कीं, तो उन्हें सिर्फ पौने दो साल में उखाड़ फेंका गया। उस वक्त तो क्षेत्रीय स्वरों को दिल्ली तक पहुंचाने के लिए सुबाई दल भी न थे। अब हालात बदल चुके हैं। आज का भारत मिला-जुला है। यहां ममता बनर्जी, उद्धव ठाकरे, शरद पवार, जगनमोहन रेड्डी, स्टालिन, अखिलेश यादव, मायावती, चौटाला बंधु और अकाली जैसे क्षेत्रीय दलपति हैं, तो वहीं राष्ट्रीय पार्टियों में भी कई नए क्षत्रप उदित हो चुके हैं। पिनाराई विजयन को क्या कहिएगा? वह यकीनन मनसा-वाचा-कर्मणा वामपंथी हैं, परंतु पिछले पांच वर्षों के दौरान उन्होंने पार्टी के अंदर असहमति की तमाम आवाजों को कुचल दिया। वामपंथी उन्हें भले ही अपना मुख्यमंत्री कहें, पर सच यह है कि विजयन ने अपने बलबूते पार्टी को दोबारा जिताकर नया इतिहास रचा है। पंजाब में अमरिंदर सिंह भी इसी तरह के  राजनेता हैं। कांग्रेस में होते हुए भी उनकी एक खास शख्सियत है और यही वजह है कि तमाम प्रश्रय के बावजूद नवजोत सिंह सिद्धू जैसे नए नेता मंत्रिमंडल से बाहर बसर करने पर मजबूर होते हैं। भारतीय जनता पार्टी में बी एस येदियुरप्पा ऐसे ही मुख्यमंत्री हैं, जो पार्टी में रहते हुए भी अपनी आवाज कायम रखते हैं। 

आपको यह सब बताने के पीछे आशय यह था कि जब क्षेत्रीय दल अथवा राष्ट्रीय दलों में क्षेत्रीय आवाजें मजबूत होती हैं, तब इससे सूबाई हक-हुकूकों को ताकत मिलती है। आज जब ऑक्सीजन, कोरोना प्रतिरोधी टीकों, जीवन रक्षक दवाओं आदि के असमान वितरण को लेकर आवाजें उठ रही हैं, तब तय जानिए कि हमारे यहां व्यवस्था के तौर-तरीकों में जरूरी परिवर्तन भी, आज नहीं तो कल, आकार ले लेगा। भरोसा न हो, तो एक साल का अंतर देखिए। पिछले वर्ष केंद्र सरकार ने खुद लॉकडाउन लागू किया था। इस बार अब तक नई दिल्ली ने राज्यों को आवश्यकतानुसार प्रतिबंध लागू करने की इजाजत दे रखी है। अब सामाजिक विद्रूपताओं पर लौटते हैं। हम हिन्दुस्तानी अपने बलबूते इन पर काबू पाते आए हैं। सती-प्रथा और अस्पृश्यता सिर्फ कानून के चलते अतीत का फसाना नहीं बनीं। इनके खिलाफ असहमतियां पहले से विद्यमान  थीं। समयगत आवश्यकताओं और उनसे उपजे उपायों ने इस बदलाव को गति प्रदान की। ऐसे उदाहरण और भी हैं, इसलिए मुझे यकीन है कि इन अवसाद भरे दिनों में भी हम आगे के लिए कुछ ऐसी राहें खोल सकेंगे, जो अब तक अनजानी थीं।

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