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25 अगस्त, 2020|4:55|IST

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मोदी ने मनोज पर दांव क्यों लगाया

मनोज सिन्हा ने जम्मू-कश्मीर के उप-राज्यपाल के तौर पर ‘सांविधानिक दायित्वों के निर्वाह’ के लिए ‘पद एवं गोपनीयता’ की शपथ ले ली है। प्रधानमंत्री के फैसले जन-मन को चौंकाते आए हैं। उन्होंने इस मामले में भी अपने कीर्तिमान को कायम रखा, पर सवाल उठ रहे हैं कि मोदी ने उन्हें यह दायित्व सौंपकर बहुत बड़ा जोखिम तो नहीं उठा लिया? क्या मनोज सिन्हा इस अति-चुनौतीपूर्ण जिम्मेदारी को निभा पाने में सफल होंगे?

पुरानी कहावत है, आगत का आभास अतीत से मिलता है। मनोज सिन्हा को सियासत में ‘सर्वाइवर’ के तौर पर जाना जाता है। 1980 में वह काशी हिंदू विश्वविद्यालय छात्र संघ का चुनाव लडे़, पर हार गए। दो साल कोशिश करते रहे और 1982 में इस लक्ष्य को हासिल कर लिया। इसी तरह, लोकसभा के चार चुनाव हारे, तो तीन बार सांसद भी रहे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में उन्हें रेल राज्य मंत्री बनाया और बाद में संचार मंत्रालय का स्वतंत्र प्रभार भी सौंप दिया। दोनों ही विभागों में उनका काम बेहतरीन और जनपरक था। यही वजह है कि गाजीपुर की जनसभा में जब प्रधानमंत्री अपने उद्बोधन के लिए उठे, तो सबसे पहले वहां मौजूद लोगों से मनोज सिन्हा के लिए ताली बजाने को कहा। यह अप्रत्याशित था। 

इस सबके बावजूद 2019 में वह लोकसभा का चुनाव हार गए। वजह? परिसीमन के बाद गाजीपुर संसदीय क्षेत्र सामाजिक समीकरणों के लिहाज से उनके लिए सुरक्षित नहीं रह बचा था। आलाकमान ने उन्हें दूसरी सीट देने की पेशकश की, पर वह वहीं से लडे़। दुष्परिणाम सामने था। इसके बावजूद शीर्ष नेतृत्व की नजर में उनकी वकत कायम रही। पिछले कुछ महीनों से दिल्ली के सत्ता-सदन में चर्चा थी कि मनोज सिन्हा ‘एडजस्ट’ किए जाएंगे। गए गुरुवार को यह साबित हो गया कि उन्हें मिलने वाली जिम्मेदारी ‘एडजस्टमेंट’ से कहीं अधिक गुरुतर है। वह एक ऐसे व्यक्ति के तौर पर उभरे हैं, जिसे हालात नेपथ्य में धकेलता है, पर वह हमेशा पुरजोर वापसी कर दिखाता है।

इस बार यह वापसी कितनी कारगर साबित होने जा रही है? 
इस सवाल को जम्मू-कश्मीर के पहले उप-राज्यपाल जी सी मुर्मू की अप्रत्याशित रवानगी से जोड़कर देखिए। बतौर प्रथम उप-राज्यपाल उन्होंने घाटी में कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर बेहतरीन काम किया। संसद में गृह मंत्री अमित शाह ने जब अनुच्छेद-370 को हटाने के साथ जम्मू-कश्मीर की भौगोलिक एवं सांविधानिक स्थिति में बदलाव की बात कही, तभी से आशंकाओं के बुलबुले उठने लगे थे, घाटी में कर्फ्यू लागू कर दिया गया था। जब मुर्मू वहां कार्यभार संभालने पहुंचे, तो संगीनों के साये में तनाव ही तनाव पसरा हुआ था। उन्होंने शुरुआती कर्फ्यू और कोरोना के दंश को बखूबी झेला। उनके कार्यकाल के दौरान कोई बड़ी आतंकवादी वारदात नहीं हो सकी और न ही खुले तौर पर सामाजिक प्रतिरोध के मामले सामने आए, लेकिन उनका तौर-तरीका वहां के स्थापित नौकरशाहों से बहुत मेल नहीं खाता था। यही वजह है कि उन्हें दस महीने में बोरिया-बिस्तर बांधकर दिल्ली लौटना पड़ा। अब वह नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक के तौर पर नई सांविधानिक जिम्मेदारी का निर्वाह करेंगे। जानने वाले जानते हैं कि श्रीनगर के राजभवन और दिल्ली के किसी अन्य सरकारी आवास में क्या फर्क है? 

यह भी कहा जा सकता है कि गिरीश चंद्र मुर्मू नौकरशाह थे, उन्हें फौरी तौर पर जो काम निपटाने थे, निपटा चुके। अब वहां राजनीतिक और सामाजिक पहल की जरूरत है, जिसे सिर्फ कोई सुलझा हुआ राजनीतिज्ञ ही सिरे तक पहुंचा सकता है। यहां यह जान लेना जरूरी है कि भारत में औपचारिक विलय के बाद से इस प्रदेश में नौकरशाह और सेवानिवृत्त जनरल साहबान ही राज्यपाल पद को सुशोभित करते रहे हैं। मोदी सरकार ने सत्यपाल मलिक को इस कुरसी पर बैठाकर नई परंपरा कायम की थी। अब यह जिम्मेदारी मनोज सिन्हा को संभालनी है। 

काम कठिन है, क्योंकि कश्मीर के हालात पहले से कहीं अधिक जटिल हैं। पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती सहित तमाम लोग अभी भी या तो नजरबंद हैं, अथवा सलाखों के पीछे हैं। दूसरे पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला घोषणा कर चुके हैं कि जब तक सूबे का पुराना स्वरूप नहीं लौटेगा, तब तक वह विधानसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे। अब तक कश्मीर की राजनीति में इन्हीं दो घरानों का बोलबाला रहा है। केंद्र का मानना है कि अब्दुल्ला और मुफ्ती खानदान चुक चुके हैं।

अब जम्मू-कश्मीर को नई राजनीति और राजनीतिज्ञों की जरूरत है। नए लोगों को मौका देने, पुरानों से तालमेल बैठाने और समाज के सभी वर्गों को एक साथ लाने का काम अब मनोज सिन्हा को करना है। वह एक अनुभवी राजनेता हैं और अब तक विवादों से दूर रहे हैं। मैं उन्हें काशी हिंदू विश्वविद्यालय के दिनों से देख रहा हूं। उन दिनों बीएचयू के मौजूदा आईआईटी को आईटी कहते थे। आज के आईआईटी की तरह उसमें पढ़ने वाले विद्यार्थियों का दर्जा विशिष्ट होता था, पर वह आम बनारसियों की तरह सहज थे। सबसे घुले-मिले और शांत भाव से बतकही का रस लेते हुए मनोज अक्सर ‘लंकेटिंग’ करते मिल जाते। छात्रों के साथ पहलवान के यहां का लौंगलता और सोहाल खाते-खाते वह सियासी समीकरण भी बैठाते चलते। कम से कम दुश्मनी, अधिक से अधिक दोस्ती, उनका उसूल था। यह सियासी शैली घाटी में कितनी कारगर होगी, इसे देखना दिलचस्प होगा।

हमें भूलना नहीं चाहिए कि कश्मीर की समस्या सिर्फ सियासी नहीं है। यह सूबा लंबे समय से दहशतगर्दी का शिकार है। जिस दिन उनके प्रशंसक उनकी नियुक्ति का जश्न मना रहे थे, ठीक उसी दिन भाजपा के एक सरपंच के घर में मातम पसरा पड़ा था। उसे दहशतगर्दों ने गोली से उड़ा दिया था। घाटी में पिछले दिनों लगातार भाजपा समर्थक नेताओं की हत्या हुई है। हमारे सुरक्षा बल वहां दहशतगर्दों से खूनी जंग में मुब्तला हैं। इस साल अब तक कश्मीर में 206 लोग मारे जा चुके हैं। इनमें सुरक्षा बलों के भी 34 जवान शामिल हैं।

यही नहीं, लंबे कर्फ्यू और कोरोना की मार ने आर्थिक बदहाली झेल रहे सूबे को फटेहाल कर दिया है। अगर ‘कश्मीर चैंबर ऑफ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्रीज’ के अध्यक्ष शेख आशिक अहमद की मानें, तो गए एक साल में यहां के कारोबारियों को 40 हजार करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है और सिर्फ घाटी के पांच लाख से अधिक लोग बेरोजगार हो गए हैं। पिछले दिनों यहां के कारोबारी अपनी पीड़ा लेकर गृह मंत्री और वित्त मंत्री से मिले थे। मतलब साफ है। मनोज सिन्हा को एक साथ कई मोर्चों पर लड़ना है।

इसमें दो राय नहीं कि नई जिम्मेदारी ने मनोज सिन्हा के सिर पर फूलों की जगह कांटों भरा ताज रखा है। पूरी दुनिया की निगाहें अभी से उनके ऊपर लगी हैं कि वह इन शूलों को फूलों में कैसे तब्दील करते हैं?

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  • Web Title:hindustan aajkal column by shashi shekhar 09 august 2020