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गुजरात जो तय करेगा

निस्संदेह, सभी दल बढ़-चढ़कर लोकतंत्र के इस महाकुंभ में हिस्सेदारी निभा रहे हैं और अब आठ दिसंबर का इंतजार है। उस दिन सिर्फ हार-जीत नहीं, देश की भावी राजनीति की दशा-दिशा का भी संकेत मिलेगा...

गुजरात जो तय करेगा
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अगली आठ दिसंबर को गुजरात और हिमाचल विधानसभा चुनावों के नतीजे हिन्दुस्तान की भावी राजनीति की दशा-दिशा के लिए महत्वपूर्ण साबित होने जा रहे हैं। गुजरात पहले भी दो बार देश की राजनीति पर असर डाल चुका है। 
अपनी बात समझाने के लिए मुझे आपको पचास साल पीछे ले जाना होगा। कांग्रेस ने 1972 का विधानसभा चुनाव जबरदस्त बहुमत के साथ जीता था। उसे 168 में से 140 सीटें हासिल हुई थीं। इस जनादेश के जिन्न पर सवार कांग्रेस ने सवा साल बाद ही अपना मुख्यमंत्री बदल दिया था। चिमन भाई पटेल गांधी नगर के सत्ता-सदन में जा विराजे थे, पर साल बीतते-न बीतते खाद्यान्न, खाद्य तेल और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में जबरदस्त वृद्धि के खिलाफ असंतोष पनपने लगा। छात्रों ने इसकी अगुवाई की। पुलिस-प्रशासन ने इसके जवाब में वही किया, जो उसे अंग्रेज विरासत में दे गए थे- बल प्रयोग। इसके बावजूद हालात हाथ से फिसलते चले गए। लगे हाथ विपक्षी दल भी असंतोष के इस अलाव में अपनी रोटियां सेंकने लगे। हालात इस कदर बिगड़ गए कि इंदिरा गांधी को अपनी ही पार्टी की सरकार भंग करवानी पड़ गई थी। 
गुजरात के सफल छात्र आंदोलन से प्रेरित हो मार्च, 1974 में बिहार के छात्रों ने भी आंदोलन शुरू किया। पहले गुजरात और अब बिहार में नौजवानों का जज्बा देख राजनीति से रिटायर हो चुके जयप्रकाश नारायण अपनी तंद्रा छोड़ मैदान में उतर पडे़ थे। उन्होंने इसी दौरान ‘संपूर्ण क्रांति’ का आह्वान किया। वह मानते थे कि इंदिरा गांधी की ‘तानाशाह प्रवृत्ति’ से निपटने का अकेला तरीका यही है। आज के नीतीश कुमार, लालू यादव, रविशंकर प्रसाद, सुशील मोदी जैसे स्थापित नाम उसी दौर में चर्चा में आए। वे आज तक प्रदेश या देश की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। 
बिहार से शुरू हुआ यह आंदोलन देखते-देखते बडे़ भूभाग में फैल चुका था। इसी बीच इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द कर दिया। घबराई इंदिरा गांधी ने इन हालात से निपटने के लिए देश पर आपातकाल थोप दिया। पौने दो बरस बाद, 1977 में उन्होंने आपातकाल हटाकर चुनाव की घोषणा की, पर परिणाम इंदिरा के पक्ष में नहीं आए। नतीजतन, पहली बार नई दिल्ली की सत्ता पर कोई गैर-कांगे्रसी सरकार विराज सकी। गुजरात से भभकी असंतोष की ज्वाला की यह तार्किक परिणति थी। तब से अब तक आठ गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री शपथ ले चुके हैं। इनमें से नरेंद्र मोदी अकेले ऐसे हैं, जिन्होंने दो लोकसभा चुनाव लगातार बहुमत के साथ जीते हैं। 
इस परिघटना के बरसों बाद मोदी से ही गुजरात से उपजे दूसरे परिवर्तन की शुरुआत हुई।  
आपको 26 जनवरी, 2001 को कच्छ में आया भयानक जलजला याद होगा। उस समय गुजरात में भारतीय जनता पार्टी के केशूभाई पटेल मुख्यमंत्री हुआ करते थे। पटेल इस आपदा से निपटने में असफल साबित हो रहे थे। पनपते जनरोष को थामने के लिए भाजपा आलाकमान ने नरेंद्र मोदी को मुख्यमंत्री की कुरसी पर बैठा दिया। तब तक मोदी के पास सरकार चलाना तो दूर, किसी सरकार में शामिल होने का भी अनुभव न था। वह संगठनकर्ता बहुत अच्छे थे, पर प्रशासक कैसे होंगे, इसको लेकर तमाम आशंकाएं व्यक्त की जा रही थीं। एक साल के अंदर उन्होंने जिस तरह भुज का कायाकल्प किया, उससे उनके आलोचक भी हक्का-बक्का रह गए। यहीं से ‘ब्रांड मोदी’ के पुख्ता होने की शुरुआत हुई, जिसकी चमक आज तक कायम है। वह लगातार तीन बार गुजरात विधानसभा और दो बार लोकसभा चुनाव जीतकर सियासत की नई परिभाषा गढ़ने में कामयाब रहे हैं। 
अब गुजरात से उपजने वाली तीसरी परिवर्तनकारी संभावना की चर्चा। 
यह चुनाव कई मायनों में अलग हैं। 2017 तक वहां कांगे्रस और भाजपा गुत्थमगुत्था होती थीं, मगर पहली बार आम आदमी पार्टी तीसरी शक्ति के तौर पर ताल ठोक रही है। तीन बार दिल्ली जीतने के बाद अरविंद केजरीवाल पंजाब में अकल्पनीय बहुमत लाकर अपना दम-खम साबित कर चुके हैं। पिछले दिनों उनकी पार्टी ने गुजरात के स्थानीय निकाय चुनावों में दो नगर निकायों में 28 सीट जीतकर सियासी आकलनकर्ताओं को अचरज में डाल दिया था। चुनाव आयोग ने जैसे ही चुनावी तारीखों का एलान किया, केजरीवाल ने ट्वीट कर कहा- गुजरात की जनता इस बार बडे़ बदलाव के लिए तैयार है। हम जरूर जीतेंगे। 
यह आत्मविश्वास है या जरूरत के  मुताबिक चला गया चुनावी दांव?
केजरीवाल के प्रशंसक कहते हैं कि दिल्ली और पंजाब की भांति गुजरात में भी कांग्रेस का वोट आप को ‘ट्रांसफर’ होगा। अगर ऐसा हो जाता है, तो आम आदमी पार्टी की तीन राज्यों में सरकार होगी और 2024 के चुनावों का विमर्श गढ़ने में उसकी प्रमुख भूमिका होगी। इसके विपरीत कई राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि आम आदमी पार्टी ने जबरदस्त चुनावी चर्चा अवश्य हासिल कर ली है, पर बहुत जल्दी प्रचार के शीर्ष पर पहुंच जाना कभी-कदा खतरनाक साबित होता है। पिछली बार कांग्रेस ने अपना ‘टेंपो’ जरूरत से पहले इतना ‘हाई’ कर लिया था कि अंत तक उसका निर्वाह नहीं किया जा सका। 
उत्तर प्रदेश चुनावों में सपा और पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी ने यही गलती की थी। 
यही वजह है कि कांग्रेस नितांत नई रणनीति पर काम कर रही है। राहुल गांधी कन्याकुमारी से कश्मीर तक की भूमि नाप रहे हैं, पर गुजरात को जान-बूझकर उनके ‘रूट’ से अलग रखा गया है। पार्टी के अन्य नेता और नेहरू-गांधी परिवार के बाकी दो सदस्य अभी तक प्रचार से दूर हैं। उनके स्थान पर कांग्रेस की गुजरात इकाई के नेतृत्व को छोटी-छोटी यात्राओं के जरिये पांच करोड़ मतदाताओं से सीधा संवाद बनाने को कहा गया है। आदिवासी नेता छोटू बसावा, जो कुछ दिनों पहले तक आम आदमी पार्टी को गलबहियां डाले हुए थे, अब कांग्रेस की ओर आकर्षित दीख रहे हैं। देश की सबसे पुरानी पार्टी को उम्मीद है कि शहरी क्षेत्रों में आम आदमी पार्टी भाजपा के वोट काटेगी और ग्रामीण क्षेत्रों में हम अपने मतदाताओं को एकजुट रखने में कामयाब हो सकेंगे। कांग्रेस सीधे मोदी और उनके राष्ट्रवाद पर प्रहार करने के बजाय भाजपा को स्थानीय मुद्दों पर घेरने की तैयारी में है। 
मौजूदा देशव्यापी दुर्दशा से उबरने के लिए कांग्रेस को जीत नहीं, तो जीत के करीब तक पहंुचना जरूरी है। वह हिमाचल से भी भली उम्मीद पाले बैठी है।
उधर, भारतीय जनता पार्टी ‘मोदी नाम केवलम्’ के मंत्र पर चल रही है। यह रणनीति 2017 में भी कारगर रही थी। तब मतदाता पत्रकारों से अक्सर कहते पाए जाते थे कि हम भाजपा से नाराज जरूर हैं, पर गद्दार नहीं। यही वजह है कि जब ईवीएम की सील टूटी, तो भाजपा के पक्ष में 49.44 फीसदी, तो कांग्रेस के समर्थन में लगभग 43 फीसदी वोट सामने आए। उत्साहित भगवा दल ने इसीलिए अपने कार्यकर्ताओं के समक्ष 150+ सीट जीतने का लक्ष्य रखा है। 
निस्संदेह, सभी दल बढ़-चढ़कर लोकतंत्र के इस महाकुंभ में हिस्सेदारी निभा रहे हैं और अब आठ दिसंबर का इंतजार है। उस दिन सिर्फ हार-जीत नहीं, देश की भावी राजनीति की दशा-दिशा का भी संकेत मिलेगा। तब तक क्यों न चुनावी चौसर का आनंद उठाया जाए? 

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