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30 दिसंबर, 2020|3:26|IST

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किसान आंदोलन और अधूरे ख्वाब

देश की हुकूमत और किसानों के बीच पांचवें दौर की बातचीत बेनतीजा साबित होते ही साफ हो गया है कि यह संघर्ष अभी जारी रहेगा। मौजूदा सरकार के छह वर्ष लंबे कार्यकाल में यह पहला मौका है, जब देश की राजधानी दस दिनों से अस्त-व्यस्त है। हालांकि, मैं किसानों की समस्याओं के लिए किसी एक सरकार या शख्सियत को कुसूरवार नहीं मानता। यह शताब्दियों लंबा सिलसिला है, जिसे आजाद भारत की सभी सरकारें सुलझाने में नाकामयाब रही हैं।

सरकार ने किसानों को 9 दिसंबर को फिर बातचीत के लिए बुलाया है। इस बीच किसानों का आंदोलन जारी रहेगा। तय है, मौजूदा संघर्ष का हल आज नहीं तो कल, निकल ही आएगा। पर क्या इससे किसानों और किसानी की कायापलट हो जाएगी? क्या भारत की कृषि व्यवस्था पर मंडरा रहे काले बादल सदा-सर्वदा के लिए छंट जाएंगे? क्या किसान अपनी चिर मुफलिसी से मुक्त हो सकेंगे? और क्या उनकी आत्महत्याओं का सिलसिला थम सकेगा?
आज मैं इन सवालों के जवाब ढूंढ़ने के लिए आपको अतीत की एक कथा बताता हूं। जब 1967 का अकाल पड़ा था, तब मेरे पिता मिर्जापुर में तैनात थे। मैंने स्कूल जाना शुरू ही किया था, पर यह महसूस होने लगा था कि शहर की फिजां बदल रही है। आसपास के आदिवासी और गांव वाले काम अथवा भोजन की तलाश में शहर या बडे़ कस्बों की ओर आते थे, पर अक्सर उन्हें निराशा के साथ लौटना पड़ता। जो लोग उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति का माद्दा रखते थे, वे खुद अभावग्रस्त थे। गेहूं दुर्लभ वस्तु बन गया था। राशन की दुकानों पर अमेरिका से आया लाल गेहूं बंटा करता, नतीजतन कालाबाजारी जोरों पर थी।

बाद के वर्षों में अपने गांव की यात्राओं के दौरान मैंने बार-बार यह पाया कि 90 फीसदी से ज्यादा किसानों की बदहाली दूर नहीं हो रही। आबादी के विस्तार के साथ उनकी जोत छोटी होती जा रही थी। इसके अलावा भी तमाम दिक्कतें थीं। वे परंपरागत फसलें उगाना पसंद करते थे। कोई उन्हें यह बताने वाला नहीं था कि कैसे आप कुछ और उगाकर अपनी तकदीर बदल सकते हैं। मौसम मेहरबान हो, तो फसल के बाद की जिंदगी कुछ आसान हो जाती थी और यदि वह अनुकूल न रहा, तो प्रतिकूलता और बढ़ जाती थी।

इसी बीच हरित क्रांति आई। भारत ने अपनी आवश्यकता से अधिक अनाज उगाना शुरू कर दिया, पर वितरण की व्यवस्था तब भी नहीं सुधरी। हमारे देश में एक तरफ फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया के गोदाम भरे पडे़ हैं, तो वहीं दूसरी तरफ लगभग 14 फीसदी आबादी को भरपेट भोजन नहीं मिल पाता। किसान को फसल की समुचित कीमत हासिल नहीं होती और उपभोक्ता को जरूरत से अधिक दाम चुकाने पड़ते हैं। यह समय है, जब हम कृषि को भी बदलती दुनिया की नजर से देखें, ताकि किसानों को उनका हक मिल सके और उनके उत्पाद खरीदने वालों की जेब न कटे। जाहिर है, बदलाव जरूरी है, पर यह हो कैसे? आशंका के कारोबारी बाहें चढ़ाए बैठे हैं। भय का यह बेवजह गोरखधंधा 1990 के दशक की शुरुआत में भी फैलाया गया था। उन दिनों नरसिंह राव और मनमोहन सिंह की जोड़ी आर्थिक उदारीकरण लेकर आई थी। उस समय अटल बिहारी वाजपेयी, जॉर्ज फर्नांडिस तथा अन्य सभी विपक्षी दलों ने इसे भारत को बेच देने की साजिश बताया था। संसद से सड़क तक हंगामा मचा था। प्रवाद फैलाया जा रहा था कि पहले तो एक ईस्ट इंडिया कंपनी ने हमें बर्बाद किया था, अब सैकड़ों परदेशी कंपनियां हमें गुलाम बनाने आ जाएंगी। 
क्या ऐसा हुआ?
यकीनन नहीं। उदारीकरण के इन तीस सालों में भारत में लगभग तीस करोड़ लोग गरीबी की रेखा से उबरने में कामयाब रहे। सरकार, कॉरपोरेट और समाज के बीच एक सामंजस्य बढ़ा, जिसके फलस्वरूप भारत भी आर्थिक महाशक्ति बनने का सपना देखने में समर्थ हो सका। आज कहा जाता है कि अमेरिका, चीन व भारत एक तरफ होंगे और बाकी दुनिया दूसरी तरफ। अंतरराष्ट्रीय राजनीति इसमें जो भी अड़ंगे लगाए, पर यह सच है कि मुक्त बाजार की व्यवस्था ने अगर कुछ बुराइयां जनीं, तो प्रगति के तमाम नए दरवाजे भी खोले। 

जो लोग सियासी नारेबाजी पर यकीन कर भ्रमित हो जाते हैं, उन्हें याद दिला दूं। बहुत पुरानी बात नहीं है। 1990 के दशक के मध्य तक भारत में एक से दूसरे शहर तक फोन मिलाने में घंटों लग जाते थे। हमलोग भी जब रिपोर्टिंग के लिए कभी विदेश जाते, तो टेलेक्स अथवा फैक्स भेजने के लिए घंटों लाइन में लगना पड़ता। सोचता हूं, कोरोना तब फैला होता, तो क्या होता? आज लाखों भारतीय ‘वर्क फ्रॉम होम’ के जरिए अगर अपना रोजगार बचा पा रहे हैं, तो उसकी अकेली वजह है संचार-क्रांति। यह और ऐसे तमाम फलप्रद उपाय 1991 के सुधारों की देन हैं। 
अब कृषि पर आते हैं। मैं आपको आंकड़ों के मायाजाल में फंसाए बिना सिर्फ एक उदाहरण देना चाहूंगा। दूध भी कृषि उत्पाद है। उस पर कोई एमएसपी नहीं है। कोई खास सरकारी संरक्षण भी उसकी खरीद और बिक्री पर लागू नहीं होता। मदर डेयरी और सुधा जैसे कुछ अद्र्ध-सरकारी संस्थानों को छोड़ दें, तो बड़े स्तर के अधिकांश खरीदार निजी क्षेत्र से आते हैं। अमूल ने तो सहकारिता के जरिए गुजरात से जिस श्वेत क्रांति की शुरुआत की थी, वह आज पूरे देश में परवान चढ़ रही है।

गांवों से जो दूध खरीदा जाता है, उनमें से अधिकांश लोग एक से छह मवेशियोंके स्वामी होते हैं। क्या इनके ढोरों पर किसी मल्टीनेशनल या कॉरपोरेट ने कब्जा कर लिया? दरअसल, खरीद की इस प्रक्रिया ने दुग्ध किसानों की जेब में नियमित तौर पर पैसे डालने शुरू किए। वे, जो फसल काटने और बिकने का इंतजार करते थे, अब हर रोज दाम पाने लगे। इससे महिलाओं में भी जागृति आई, क्योंकि गांवों में मवेशियों की तमाम जिम्मेदारी वे ही उठाती हैं।

हालांकि, विचारविहीन निजीकरण सभी समस्याओं का हल नहीं है। अधिकांश चीनी मिलें निजी हाथों  में हैं, पर सरकारी नुमाइंदों की मिलीभगत से इनमें से तमाम शोषण का व्यवस्थित सिलसिला चला रही हैं। ऐसे में, आवश्यक है कि किसानों के हाथ न केवल विधायी अधिकारों से मजबूत किए जाएं, बल्कि सरकारी प्रशासकों को भी नियम सख्ती से लागू करने के लिए बाध्य किया जाए। इसके साथ ही किसानों को वैकल्पिक फसल उगाने और कृषि संबंधी उद्योग लगाने के लिए भी लामबंद करना होगा। कोरोना ने जब महानगरों की कलई उतार दी हो, तब समाज की सेहत और आर्थिक समृद्धि के लिए भी यह जरूरी है।

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  • Web Title:hindustan aajkal column by shashi shekhar 06 december 2020