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आत्मघाती समय के विरोध में

अमेरिका में फिर मंदी के बादल गहराने लगे हैं। समाजशा्त्रिरयों को चिंता व्यापने लगी है कि कहीं हम आत्मघात का नया सिलसिला न पनपते देखें। यहां अमेरिका की प्रथम महिला रहीं एलेनोर रूजवेल्ट का कथन याद आ...

आत्मघाती समय के विरोध में
Amitesh Pandeyशशि शेखरSat, 03 Sep 2022 09:35 PM
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तेज बारिश की वह शाम हम सबके अंदर गहरे तक पैठ चुकी थी। प्रकृति, पर्यावरण और जीवन की रूमानी चर्चा के बीच एक जहीन महिला ने कहना शुरू किया- ‘हमारे यहां लोग कितने पाखंडी हैं कि वे आत्महत्या को कायरों का काम बताते हैं। भला अपने हाथों से ही तकलीफ बर्दाश्त करने वालों को डरपोक कैसे कहा जा सकता है? इसके लिए हिम्मत चाहिए।’ उनकी इस बात से मैं ‘राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो’ की ताजा रिपोर्ट पर सोचने को मजबूर हो गया। गए साल यानी 2021 में भारत में आत्महत्या की घटनाओं में 7.2 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। इस दौरान एक लाख 64 हजार से अधिक आत्महत्या के मामले दर्ज किए गए। 1967 से अब तक खुदकुशी की यह सबसे ऊंची दर है। 
अपना जीवन खुद समाप्त करने वाले ये लोग क्या वाकई जांबाज थे? 
आंकड़ों की गहन पड़ताल इस तर्क को बिना सिर-पैर का साबित करती है। यह सच है कि आत्मघात की थोड़ी-बहुत प्रवृत्ति हर मनुष्य में पाई जाती है। पिछले कुछ सालों में जिस तरह आचार-विचार और व्यवहार में परिवर्तन आया है, उसने इस आदिम अवगुण को काफी बढ़ावा भी दिया है। यही वजह है कि आर्थिक बदहाली के कारण अपनी जीवन-लीला समाप्त करने वाले पुरुषों में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। इनमें सबसे बड़ा तबका दिहाड़ी मजदूरों का है। कुल आत्महत्या करने वालों में एक चौथाई से ज्यादा इसी वर्ग से थे। यही नहीं, स्वरोजगार के जरिये खुद को भौतिक तौर पर आगे बढ़ाने के आकांक्षी लोगों में भी यह प्रवृत्ति घर कर गई है। कुल आंकड़ों में इस वर्ग के लोगों की संख्या 12.3 फीसदी है, जो चौंकाती है। 
हालांकि, घरेलू हिंसा और कलह सबसे बड़ी वजह के तौर पर उभर रहे हैं। क्या ‘न्यूक्लियर फैमिली’ के पनपते चलन से हमारी हजारों साल पुरानी और बेहद मजबूत मानी जाने वाली विवाह संस्था पर दीमक लग गया है? जिस तेजी से हमारे देश में तलाक के मामले बढ़ रहे हैं, उससे तो यही लगता है। हालात इतने विकराल हैं कि हर जनपद में परिवार न्यायालयों पर काम का बोझ बढ़ता जा रहा है। बेंगलुरु में पहले सिर्फ एक परिवार न्यायालय हुआ करता था। बढ़ते मुकदमों के कारण उन्हें बढ़ाकर तीन तक पहुंचा दिया गया, फिर भी मुकदमे अपने निस्तारण के लिए लंबी बाट जोहने को अभिशप्त हैं।
तमाम समाजशास्त्री मानते हैं कि 1991 के बाद से भारत में गरीबी उन्मूलन का शानदार काम तो हुआ, पर साथ-साथ अभिलाषाओं, आकांक्षाओं और उन्हें पाने की ललक में भी बेतहाशा बढ़ोतरी हुई। कृषि व्यवस्था विशाल ग्रामीण आबादी का पेट नहीं भर सकती थी, इसीलिए लोगों को तेजी से नगरों और महानगरों में जलावतनी काटने के लिए विवश होना पड़ा। यह अनवरत तौर पर चलने वाला सिलसिला आबादी के इस विशाल तबके के ‘वैल्यू सिस्टम’ को उलट-पुलट कर देता है। अवसाद बढ़ने का एक बड़ा कारण यह भी है। 2020 के मध्य में अत्याधुनिक स्मार्ट तकनीक पर आधारित स्वास्थ्य प्लेटफॉर्म ‘जीओक्यूआईआई’ ने अपने एक सर्वे में पाया था कि 43 फीसदी भारतीय किसी न किसी कारण से अवसाद के शिकार हैं। 
क्या आपको यह आंकड़ा चौंकने पर बाध्य नहीं करता? 
कोई आश्चर्य नहीं कि अपेक्षाकृत अमीर समझे जाने वाले प्रदेशों में अपनी जीवनलीला खुद समाप्त करने की प्रवृत्ति अधिक पाई जाती है। देश के 53 बडे़ शहरों में होने वाली कुल घटनाओं का 35 प्रतिशत सिर्फ चार शहरों में दर्ज किया गया। ये शहर हैं- दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और बेंगलुरु। इन महानगरों और उनके उपनगरों में बड़ी संख्या में बाहर से आए लोग बसते हैं। उनकी अपेक्षाओं और अवसरों के बीच जब तालमेल में कमी रह जाती है, तब वे इस तरह के अतिवादी कदम उठाने पर मजबूर हो जाते हैं। यहां यह भी गौरतलब है कि देश की राजधानी में इस साल कम घटनाएं हुईं, फिर भी वह अव्वल नंबर पर है। 
दिल्ली वाले चाहें, तो इस तथ्य से कुछ सबक हासिल  कर सकते हैं। 
सवाल उठता है कि क्या सिर्फ भारत में ऐसा हो रहा है? जी नहीं, दुनिया का हाल तो और भी बदहाल है। ताजा वैश्विक आंकड़े गवाह हैं कि बेल्जियम, जापान, चीन, स्वीडन, दक्षिण कोरिया और रूस जैसे संपन्न माने जाने वाले देशों में आत्महत्या करने वालों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। स्वीडन तो ‘हैप्पीनेस इंडेक्स’ में सातवें नंबर पर है, फिर भी वहां आत्महत्या की काफी घटनाएं दर्ज होती हैं। खुदकुशी का वहां लंबा इतिहास है। स्कैंडिनेवियाई प्रायद्वीप में जब सर्दियां शीर्ष पर होती हैं, तब वहां ऐसी घटनाएं बढ़ जाती हैं। सर्दियों में यहां बीस घंटे तक अंधेरा रहता है और अंधकार अवसाद को बढ़ाने का काम करता है। 
प्राकृतिक अंधेरा कुछ भी करे, पर जो देश हिंसा के अंधकार में डूबे हुए हैं, वहां हालात बेहतर हैं। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि युद्ध अथवा गृह-युद्ध से जूझ रहे दक्षिण सूडान, अफगानिस्तान, मिस्र, लेबनान, लीबिया, ट्यूनीशिया, नाइजीरिया व इराक जैसे मुल्कों के लोग ज्यादा सख्त-जान साबित हो रहे हैं। अफगानिस्तान तो ‘हैप्पीनेस इंडेक्स’ में 146वें पायदान पर खड़ा है, लेकिन वहां आत्मघात के     मामले बहुत कम मिलते हैं। यह बात अलग है कि दहशतगर्द तंजीमें नौजवानों के आत्मघाती फिदायीन दस्ते तैयार करने में यकीन रखती हैं। 
आपके दिमाग में यहां सवाल उभर रहा होगा कि धरती के एक बडे़ हिस्से में अपना जीवन खुद नष्ट करने की प्रवृत्ति घर कर रही है, तो सरकारें इसकी रोकथाम के लिए कोई उपाय क्यों नहीं ढूंढ़तीं? विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सिर्फ 38 देशों में इस तरह के इंतजामात हैं। कई देशों में स्वयंसेवी संस्थाओं और सरकारों द्वारा ‘हेल्प लाइन’ चलाई जा रही है। ये ‘हेल्प लाइन’ उन लोगों के लिए हैं, जिनमें खुदकुशी का जज्बा जोर मारने लगता है और वे थोड़ा-सा विवेक इस्तेमाल करके इन ‘हेल्प लाइन’ के जरिये विशेषज्ञों से जुड़ पाते हैं। ये विशेषज्ञ अक्सर इनमें से कइयों को रोक पाने में सफल साबित हुए हैं। इसके बावजूद इस मुद्दे पर भगीरथ प्रयास की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता। 
एक बात और। अमेरिका में एक बार फिर मंदी के बादल गहराने लगे हैं। इससे समाजशा्त्रिरयों को चिंता व्यापने लगी है कि कहीं हम इस महादेश में आत्मघात का नया सिलसिला न पनपते देखें। सन 2008 में ‘लेहमन ब्रदर्स’ भरभराकर गिरी थी। इसकी वजह से समूचे अर्थतंत्र में अविश्वास-लहर दौड़ गई थी। इसका बुरा असर पूरी दुनिया में देखा गया था। एक शोध के अनुसार, उस दौरान यूरोप और उत्तरी अमेरिका में दस हजार से अधिक लोग  आर्थिक विपन्नता के कारण आत्महत्या को विवश हो गए थे। 
यहां अमेरिका की प्रथम महिला रहीं एलेनोर रूजवेल्ट का कथन याद आ रहा है- ‘भविष्य उनका है, जो अपने सपनों की सुंदरता में यकीन करते हैं।’ हमें अपने सपनों की सुंदरता के यकीन को डगमगाने से बचाना होगा। बचाव का अकेला उपाय यही है। 

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