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भोपाल का वह मृत्युनाद!

भोपाल गैस त्रासदी भी बाद के सालों में खबरों और विचारों से गायब हो गई... इसमें कोई दो राय नहीं कि 2 दिसंबर, 1984 से लेकर आज तक हमारे देश ने तरक्की और मजबूती की बड़ी यात्रा तय की है, पर भोपाल जैसे...

भोपाल का वह मृत्युनाद!
Amitesh Pandeyशशि शेखरSat, 02 Dec 2023 09:13 PM
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वर्ष-1984, तारीख- 2/3 दिसंबर की रात। स्थान- वाराणसी। काशी हिंदू विश्वविद्यालय से एक सादगी भरी बारात डीजल रेल इंजन कारखाना के अतिथि-गृह में पहुंचती है। काशी उन दिनों अपने अकादमिक तेवर के लिए जानी जाती थी। विश्वविद्यालय के प्राध्यापक एवं वाइस चांसलर किसी नेता, अधिकारी या रसूख वाले के मुकाबले ज्यादा आकर्षण का केंद्र होते थे। बारात के आगे-आगे तीनों विश्वविद्यालयों के कुलपति, रजिस्ट्रार, दर्जनों प्राध्यापक, संस्कृतिकर्मी और पत्रकार चल रहे थे। इस नाते यह बारात अभूतपूर्व थी। 
बैंड भी पीएसी का था, जिसे सिर्फ पारंपरिक और शालीन धुनें बजाने की इजाजत थी। आज की बारातों के हो-हल्ले से मुकाबला करें, तो वह बारात जैसे तीनों विश्वविद्यालयों की अकादमिक परिषदों और उनके अंतेवासियों का अनुशासित जुलूस प्रतीत होगी। 
बारात के पार्श्व में कार में सवार दूल्हे की ओर किसी का ध्यान नहीं था। वजह? दूल्हे ने घोड़ी पर चढ़ने और तलवार बांधने से इनकार कर दिया था। दुल्हन के दरवाजे पर बारात पहुंचने के बाद दूल्हा अड़ा हुआ था कि अनावश्यक आडंबरों को परंपरा के नाम पर न थोपा जाए और वैवाहिक रस्में संक्षेप में निपटाकर लोगों को आपस में घुलने-मिलने का अवसर दिया जाए। पूर्वी उत्तर प्रदेश में, जहां शादियां लगभग सारी रात चलती हों, वहां द्वारचार और फेरे सिर्फ डेढ़ घंटे में संपन्न हो गए थे। भोजन की टेबल पर दूल्हे के एक मित्र ने उसके कान में फुसफुसाया, ‘आज तुम्हारी वजह से मुझे अपना भोपाल दौरा रद्द करना पड़ा। अब मैं कल जाऊंगा।’ 
वह कल कभी नहीं आया। क्यों?
जिस समय बाराती भोजन कर ‘पान-पत्ता जमा’ रहे थे, उसी समय भोपाल की हवा अपनी तासीर बदल रही थी। ‘यूनियन कार्बाइड कॉरपोरेशन’ की भोपाल स्थित कीटनाशक बनाने वाली कंपनी से करीब 45 टन खतरनाक ‘मिथाइल आइसोसाइनेट गैस’ का रिसाव शुरू हो चुका था। नतीजतन, सोते या ऊंघते लोगों की आंखों में पहले जलन हुई और फिर फेफड़ों ने जवाब देना शुरू कर दिया। उनकी खांसी रोके नहीं रुक रही थी। शुरुआती लम्हों में वे इस तथ्य तक पहुंचने में नाकाम थे कि उनकी हर सांस के साथ हवा उनके फेफड़ों को बेदम क्यों करती जा रही है? हांफते-कांपते और एक-एक सांस के लिए मोहताज लोगों की भीड़ सड़कों पर बदहवासी की हालत में उतर आई थी। जिसे जिधर सूझ रहा था, उधर भाग रहा था। इस बेबस भीड़ में बहुत से ऐसे थे, जिन्होंने ठीक से कपडे़ तक नहीं पहने थे या लगभग प्राकृतिक अवस्था में थे। जब जान पर बन आई हो, तो शर्म पीछे छूट जाती है। 
उस दिन जो हुआ, वह सरकार और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की बेशर्म सांठ-गांठ का नतीजा था। सरोवरों की नगरी भोपाल के अगले कुछ साल असीम वेदना और कष्ट के थे। 
इस हादसे ने साढे़ तीन हजार से अधिक लोगों की तत्काल बलि ले ली, पर मौत का मातमी खेल रुकने वाला नहीं था। अगले कुछ हफ्तों-महीनों में बीस हजार के करीब लोग और मारे गए। जहरीली गैस ने इनमें से किसी की आंख, किसी की किडनी, तो किसी का लीवर खराब कर दिया था। फेफड़ों पर तो सभी के असर पड़ा ही था। लगभग नौ लाख की आबादी वाले शहर में इतनी मौतों का मतलब है कि यह हादसा हर घर पर आपदा बनकर टूटा था। यह सवाल मैंने तब भी इसी ‘आजकल’ के जरिये पूछा था कि सरकार बहुराष्ट्रीय कंपनी ‘यूनियन कार्बाइड’ पर अपेक्षा के अनुरूप सख्ती क्यों नहीं कर रही है? भारतीयों की जिंदगी का कोई मोल है कि नहीं? 
भोपाल के सत्ता-सदन में उस समय अर्जुन सिंह विराजमान थे। उसी साल 31 अक्तूबर को इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी ने सत्ता संभाली थी, पर वह नए थे। देश लोकसभा के चुनाव और इंदिरा गांधी की हत्या से उपजी सहानुभूति के सन्निपात में था। ऐसे में, अर्जुन सिंह से उम्मीद की जाती थी कि वह आशा के अनुरूप सख्ती बरतें। बाद में जांच समिति ने भी कहा कि कार्मिकों की कमी की वजह से यूनियन कार्बाइड की फैक्टरी में रखरखाव में कोताही बरती गई। यही वजह थी कि गैस रिसाव रोकने के लिए जो छह स्तरीय व्यवस्था थी, वह कारगर साबित नहीं हुई। 
कमाल देखिए, कंपनी का सीईओ वारेन एंडरसन दुर्घटना के चार दिन बाद भोपाल आया था। उसे नजरबंद भी किया गया, मगर हिरासत में रखने के बजाय पहले विशेष विमान से भोपाल और फिर देश छोड़ने की इजाजत दे दी गई। ऐसा क्यों हुआ? किसके इशारे पर हुआ? हिन्दुस्तानियों को तिलचट्टों की तरह मारने वालों के साथ ऐसा सुलूक हर संवेदनशील देशप्रेमी के दिल पर आघात पहुंचा गया था, लेकिन राजनीति संवेदनाओं से नहीं, शिगूफों से चला करती है। 
राजीव गांधी ने वह लोकसभा चुनाव 414 सीटों के अभूतपूर्व बहुमत के साथ जीता था। अगले वर्ष मध्य प्रदेश विधानसभा के चुनाव हुए। अर्जुन सिंह की अगुवाई में कांग्रेस ने एक बार फिर सरकार बनाने में सफलता हासिल कर ली थी। मतलब साफ है, ‘भोपाल गैस कांड’ राष्ट्रीय तो क्या, क्षेत्रीय मुद्दा तक नहीं बन सका था। 
उधर, पीड़ित न्याय की गुहार लगा रहे थे। कुछ जुझारू पत्रकार और इंसाफ पसंद लोग उनके साथ खडे़ थे। थका देने वाली लंबी कानूनी लड़ाई के बाद दिसंबर 2021 तक 5,74,393 लोगों में 3,066.63 करोड़ रुपये की राशि बतौर मुआवजा वितरित की जा सकी थी। इंसानी जान और जज्बात अमूल्य होते हैं। आने वाली नस्लें यकीनन हतप्रभ भाव से पूछेंगी, ‘37 साल लंबी लड़ाई और नतीजा सिर्फ इतना!’ 
रही बात वारेन एंडरसन की, तो उसने फिर कभी भारत की ओर मुड़कर नहीं देखा। नई दिल्ली और भोपाल में सरकारें बदलती रहीं और उनके साथ कागजी कार्रवाइयों का चेहरा-मोहरा भी नया रंग-रूप लेता रहा, लेकिन एंडरसन का प्रत्यर्पण कोई नहीं करा सका। सितंबर 2014 में 92 वर्ष की अवस्था में उसकी मौत के साथ इस प्रकरण पर पूर्ण विराम लग गया। 
भोपाल गैस त्रासदी भी बाद के सालों में खबरों और विचारों से गायब हो गई। वह तो भला हो ओटीटी पर आई एक सीरीज का। उसने इस त्रासदी की ओर एक बार फिर सबका ध्यान खींचा है। इसमें कोई दो राय नहीं कि 2 दिसंबर, 1984 से लेकर आज तक हमारे देश ने तरक्की और मजबूती की बड़ी यात्रा तय की है, पर भोपाल जैसे हादसे बताते हैं कि हमें हर देशवासी की जान को मुल्क की अमानत मानना अभी सीखना शेष है। 
अंत में इस आलेख की शुरुआती पंक्तियों की बात। 
आप सोच रहे होंगे कि मैंने उस बारात का जिक्र क्यों किया था? बता दूं, कि उस बारात का दूल्हा मैं ही था और तब से अब तक मैं और मेरी पत्नी जब भी एक-दूसरे को वैवाहिक वर्षगांठ की बधाई देते हैं, तो दोनों के मन में कांटे की तरह भोपाल का विषाद कहीं न कहीं चुभन पैदा कर रहा होता है। 
मेरे मित्र, जो विवाह में शामिल होने की वजह से भोपाल जाने से रह गए थे, वह आज भी वाराणसी में रहते हैं। उन्हें जब उस रात की याद आती है, तो उनकेचेहरे पर एक स्याह परत पल भर को बिछ जाती है। 

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