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संपादकीयइन जुझारुओं के जज्बे को सलाम

शशि शेखरPublished By: Manish Mishra
Sat, 01 May 2021 09:12 PM
इन जुझारुओं के जज्बे को सलाम

‘मुझसे नहीं हो पा रहा है...। मुझसे नहीं हो पाएगा...। सब मर रहे हैं...। मरते चले जा रहे हैं...। मेरे पास दवाएं नहीं हैं...। सेचुरेशन हो रहा है...। मुझसे नहीं हो पाएगा...। मैंने आज शाम 6 बजे लंच किया...। खाना भी नहीं खाया जा रहा...। इधर से उधर दौड़ते हुए पीपीई किट भी नहीं पहनी जा रही। उसे उतार कर फेंक दिया है...। सिर्फ गाउन पहन कर भाग रही हूं।’ दिल्ली के नामचीन अस्पताल की आईसीयू में तैनात एक नौजवान डॉक्टर अपने घर वालों से फोन पर यह सब कहते हुए जार-जार रो रही थी। उसके शब्द सुरंग में फंसे ऐसे व्यक्ति के आर्तनाद की मानिंद थे, जो अपनी पीड़ा खुद को ही सुनाने के लिए सुबकता है।
शासन-प्रशासन की ऊंची कुर्सियों पर बैठे लोग कुछ भी कहें, पर यह एक तल्ख हकीकत है कि महामारी उनके बस से बाहर चली गई है। इस काली सच्चाई को सिर्फ दिल्ली की त्रासदी मानने की गलती मत कर बैठिएगा। देश के अधिकांश शहरों का यही हाल है। स्थिति यह है कि लोग फेसबुक खोलने से डरने लगे हैं। फोन की रिंगटोन उन्हें आतंकित करती हैं और अगर बाहर से कोई घंटी बजाए, तो वे दरवाजा नहीं खोलना चाहते। अपशकुनी खबरों और आशंकाओं ने अभूतपूर्व आतंक बरपा कर दिया है। हमारा देश, जो कल तक कोरोना पर विजय पाने की डींगे हांक रहा था, वह इस वैश्विक बीमारी के आगे बुरी तरह लड़खड़ा गया है। अगल-बगल के छोटे देश भी हमारी बेचारगी पर तरस खा कर मदद की पेशकश कर रहे हैं। तय है, चुनौतियां विकराल हैं और पहले से खोखला हमारा व्यवस्था तंत्र नितांत असफल साबित हो रहा है। राजसत्ताएं जब कामयाब न हों, तो समाज अपने अस्तित्व के लिए जी-जान से जूझना शुरू करता है। आज फिर कुछ जांबाजों ने इस आपदा से दो-दो हाथ करने की ठानी है। ये ऐसे लोग हैं, जिनका नाम इतिहास कभी दर्ज नहीं करेगा, पर ये वही लोग हैं, समय जिनके कंधों पर सवार होकर इतिहास रचता है। आइए, इनमें से कुछ से आपकी मुलाकात कराता हूं।
लखीमपुर खीरी के मिथिलेश सिंह से मिलिए। इनका नौजवान बेटा महामारी ने लील लिया। यह नियति का भयंकर वज्रपात था, पर मिथिलेश सिंह टूटे नहीं। उन्होंने दूसरों के बच्चों और पास-पड़ोस के लोगों को बचाने की ठान ली। हुकूमत भले ही हर मरीज तक ऑक्सीजन पहुंचाने में नाकाम हो, पर हर पल कहां कितनी ऑक्सीजन है, इसकी जानकारी मिथिलेश सिंह रखते हैं और उसे जरूरतमंद तक पहुंचाने की पूरी कोशिश करते हैं। अस्पतालों और दवाफरोशों की लूट-खसोट के बारे भी आपने इस दौरान सुना होगा। किस तरह जीवन रक्षक दवाओं, इंजेक्शन और अन्य सामान की कालाबाजारी की जा रही है! गाजियाबाद के एक मशहूर न्यूरो-सर्जन को इस हफ्ते की शुरुआत में रेमडेसिविर इंजेक्शन की कालाबाजारी के आरोप में गिरफ्तार किया गया। वो और उसका गिरोह इस पाप-कर्म से प्रतिदिन 36 लाख रुपये से अधिक की कमाई कर रहा था। इस धत्कर्म को करने से पूर्व इस शख्स ने क्या यह नहीं सोचा कि वह डॉक्टरी के पवित्र पेशे को कलंकित कर रहा है? एक प्रतिष्ठित डॉक्टर से किसी को ऐसी उम्मीद नहीं रही होगी, पर ऐसे बहुत से नौजवान चिकित्सक हैं, जिन्होंने अपना सबकुछ कोरोना मरीजों की तीमारदारी में लगा दिया है। हल्द्वानी के सात डॉक्टरों के नम्बर इलाके के सभी वाट्सएप ग्रुपों में घूम रहे हैं। ये कोरोना पीड़ितों के लिए प्लाज्मा का इंतजाम करते हैं। कहां कितनी ऑक्सीजन है, कितने बेड हैं, किसको कैसी सुविधा चाहिए और वो कहां मिलती है, इसका आंकड़ा इन्हें ज़ुबानी याद रहता है। अब तक उत्साही डॉक्टरों का ये दल सौ से अधिक मरीजों की जान बचा चुका है। यही नहीं, जरूरत पड़ने पर ये मरीज के घर भोजन लेकर भी पहुंच जाते हैं। इनमें से अधिकांश एक साल से अपने घर भी नहीं गए हैं। कौन कहता है डॉक्टर द्वारकानाथ कोटनिस की परंपरा दम तोड़ चुकी है?
संकट के इस विकट वक्त में धार्मिक संस्थाएं भी आगे बढ़कर अपनी सेवाएं उपलब्ध करवा रही हैं। गाजियाबाद के एक गुरुद्वारे ने तो ‘ऑक्सीजन-लंगर’ की शुरुआत कर दी है। आप यदि गाड़ी से आते हैं, तो वे उसी गाड़ी में आपको ऑक्सीजन लगा देंगे। बाकी लोगों के लिए गुरुद्वारे का प्रांगण तो खुला ही हुआ है। गुरुद्वारों ने देश भर में अपनी इस सेवा परंपरा की मिसाल जारी रखी है, पर बुलंदशहर जिले में सिकंदराबाद की जामा मस्जिद की कथा कुछ अलग है। वहां के इमाम मौलाना आरिफ ने हालात जब बिगड़ते देखे, तो प्रशासन से अनुरोध किया कि मस्जिद की खाली पड़ी जमीन पर कोविड अस्पताल बना दिया जाए। ऐसे तमाम उपासना स्थल हैं, जिन्होंने अपने दरवाजे मानवता की सेवा में खोल दिए हैं। धर्म के नाम पर विभाजन करने वाले क्या इनसे कुछ सबक हासिल करेंगे? विगत एक वर्ष के दौरान कोरोना की विभीषिका ने स्कूल और कॉलेज जाने वाले बच्चों पर सर्वाधिक असर डाला है। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय ने हालिया अध्ययन में पाया कि पिछले लॉकडाउन के दौरान 44 प्रतिशत विद्यार्थियों के दिमाग पर बहुत गहरा दुष्प्रभाव पड़ा है। ज्यादातर विद्यार्थी एंग्जाइटी के शिकार हो गए हैं। ऐसे में, सवाल उठता है कि नई उम्र की नई फसल को कैसे बचाया जाए? इस सवाल का शास्त्रीय जवाब ढूंढ़ने के बजाय स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के सेवानिवृत अतिरिक्त महाप्रबंधक बी बी शर्मा ने खुद कुछ कर गुजरने की ठानी। वे मोहल्ला-मोहल्ला जाकर बच्चों को पढ़ाने लगे। बच्चे अब उन्हें ‘कार वाले मास्टरजी’ केनाम से जानते हैं। आजकल वे ऑनलाइन पढ़ा रहे हैं, ताकि सामाजिक दूरी के स्वर्णिम नियम का पालन किया जा सके। पिछले साल लॉकडाउन के दौरान हमने देखा था कि महानगरों से किस तरह बड़ी संख्या में लोग गांवों की ओर लौट पड़े थे। अपनी मातृभूमि में भी उनके साथ निष्ठुर व्यवहार किया गया था। इस बार ग्रामीणों ने सबक लिया है। पहले जैसी कटुता नदारद है और जरूरी तौर-तरीकों के साथ बीमारी से लड़ने के संसाधन जुटाए जा रहे हैं। गोरखपुर जनपद केपीपीगंज के रामपुर, लक्ष्मीपुर, तिघरा और गोला के ग्रामीणों ने खुद-ब-खुद एक क्वारंटीन सेंटर तैयार किया है। बाहर से आने वाले लोग अपने परिवार के साथ रहने के बजाय पहले इस सेंटर में चौदह दिन गुजारते हैं। इसका खर्च भी मिल जुलकर किया जाता है। जब हर ओर त्राहि-त्राहि मची हो, तब ऐसी कहानियां सुनाने का मकसद सिर्फ इतना था कि हमें अपना हौसला खुद संजोना होगा। इन कथाओं के पात्र और इन जैसे लोग उन दीयों की मानिंद हैं, जो जानते हैं कि वो समूची धरती का अंधियारा दूर नहीं कर सकते, पर फिर भी डरावनी रात से जूझने का साहस रखते हैं। वे बिना बोले यह संदेश भी देते हैं कि अंधेरा तभी जीतता है, जब चिराग अपनी रोशनी से एतबार खो बैठते हैं। हमारे बीच जन्मे इन महामानवों को सलाम।

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