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गांधी बनाम गोडसे : द्वंद्व जारी है

गांधी और गोडसे दो पृथक विचारों के प्रतिनिधि थे। राष्ट्रपिता अगर कुछ वर्ष पूर्व किसी बीमारी या किसी अन्य वजह से चले गए होते, तब भी वह ‘गांधी’ बने रहते। गोडसे को सिर्फ एक हत्या ने ‘गोडसे’ बना दिया...

गांधी बनाम गोडसे : द्वंद्व जारी है
Amitesh Pandeyशशि शेखरSat, 30 Sep 2023 08:31 PM
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गांधी नायक थे या खलनायक? वह आज के हालात में प्रासंगिक हैं या अप्रासंगिक? इन सवालों पर उनकी हत्या के बाद से हजारों बार बहस हो चुकी है। न सवाल खत्म होते हैं, न जवाब। वैचारिक द्वंद्व का यह सिलसिला मोहनदास की असली ताकत है। वह आज भी विचारों में जिंदा हैं। 
गांधी भारत में, भारत के लिए भले पैदा हुए हों, परंतु उन्हें दक्षिण अफ्रीका ने गढ़ा था। पीटरमेरिट्जबर्ग स्टेशन पर 7 जून, 1893 की रात को उन्हें ट्रेन से धक्के मारकर उतारा गया था। उस लम्हे ने एक नए इंसान को जन्म दे दिया था। मैं पिछली सदी के आखिरी दशक में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदर कुमार गुजराल के साथ वहां पहुंचा था। स्टेशन प्लेटफॉर्म पर विचरते हुए मेरे मन में सवाल उठा था कि यदि मेरे साथ ऐसा हुआ होता, तो क्या होता? उस विकट लम्हे में हम जैसे किसी आम शख्स के सामने दो विकल्प थे- विरोधस्वरूप शिकायत दर्ज कराने पुलिस थाने जाना। ऐसे में, सहयात्री अंग्रेजों के बाद उनकी पुलिस से भी अपमानित होना तय था। दूसरा, प्रिटोरिया जाए बिना लंदन लौट जाना। गांधी उस वक्त पेशेवर वकील थे और उनके पास अपनी लॉ फर्म से सौंपे गए दायित्व को न पूरा करने का समुचित कारण था। उन्होंने दोनों में से एक भी कदम नहीं उठाया। जलालत भरी उस रात से गुजरते हुए मोहनदास ने जो सोचा, आम इंसानों में ऐसी मिसाल कम मिलती है।
उन्होंने उस रात साम्राज्यवादी सोच और हिंसा से जिस तरीके से जूझने का संकल्प लिया, वह आगे चलकर गांधीवाद कहलाया। 
उसी यात्रा में इंदर कुमार गुजराल नेल्सन मंडेला से मिलने उनके सरकारी आवास पर गए थे। वे लम्हे अविस्मरणीय हैं। हमारी पीढ़ी के लोगों ने गांधी को नहीं देखा था, पर उनसे सबक लेने वाले मंडेला सामने खडे़ थे। हालांकि, दोनों हस्तियों में बुनियादी फर्क है। गांधी ने आजादी पाने के बाद सत्ता संभालने का प्रयास नहीं किया, जबकि मंडेला राष्ट्रपति बने। 
उसी यात्रा में दक्षिण अफ्रीका के अगले राष्ट्रपति थाबो मबेकी से मिलने का मौका मिला। हम एक शाम पहले डरबन से लौटे थे और गांधी की स्मृतियां दिमाग पर हावी थीं। एक साथी ने मबेकी से पूछा कि गांधी के किस गुण से मंडेला सर्वाधिक प्रभावित हैं? क्षमाशीलता और सबको साथ लेकर आगे बढ़ने की प्रवृत्ति- उनका संक्षिप्त जवाब था। मंडेला ने सत्ता में आते ही समदर्शी नीति अपनाई थी। उनके राज में मूल कबीलाई लोगों के साथ गोरे और भारतीय अप्रवासियों के लिए समान स्थान था। यही वजह है कि वह अपनी मातृभूमि को विभाजन के बजाय विकास की राह पर ले जा सके।
रंगभेद विहीन लोकतंत्र के उन शुरुआती पर सधे हुए कदमों का नतीजा है कि आज दक्षिण अफ्रीका पिछले दशकों में सबसे तेजी से उभरे ब्रिक्स मुल्कों (ब्राजील, रसिया, इंडिया, चाइना और साउथ अफ्रीका) का महत्वपूर्ण सदस्य है।
बापू की अक्सर बोअर युद्ध, प्रथम व द्वितीय महायुद्ध और भारत विभाजन जैसे मुद्दों पर कटु आलोचना होती है। उनके आलोचक भूल जाते हैं कि कोई भी फैसला सदा-सर्वदा सही साबित नहीं हो सकता। इंसान देश, काल और परिस्थितियों के मुताबिक फैसले करता है। अपने देश से हटकर एक उदाहरण देता हूं। 1917 की बोल्शेविक क्रांति के बाद लेनिन बदलाव के फरिश्ते माने जाते थे। वह ताकतवर सोवियत संघ के संस्थापक थे, पर 1991 में हम लोगों ने चकित भाव से उनकी मूर्तियों को खंडित होते देखा। बोल्शेविक उत्थान का उनका स्वप्न पहले ही बिखर चुका था। इससे यह निष्कर्ष तो नहीं निकाला जा सकता कि लेनिन और उनके साथियों ने इंसानी समानता का जो स्वप्न संजोया था, वह गलत था। 
गांधी पर लौटते हैं। 
पहले बोअर युद्ध की बात। इस जंग में मोहनदास अंग्रेजों को जिताने नहीं, बल्कि घायलों की मदद करने के लिए शामिल हुए थे। इसी तरह, पहले और दूसरे महायुद्ध में हमारे पुरखे हिन्दुस्तानी नागरिक के तौर पर नहीं, बल्कि बर्तानिया की शाही फौज के हिस्से के तौर पर शरीक हुए थे। यदि कोई सैनिक अथवा पलटन इन विनाशकारी जंगों में हिस्सा लेने से मना करती, तो उसका कृत्य सैन्य विद्रोह की श्रेणी में आता। गांधी ने इन मुद्दों पर तर्कसम्मत तरीके से भारत के लिए रियायतें जुटाने की कोशिश की थी। वह पूरी तरह सफल नहीं रहे, पर उपनिवेशवाद से रौंदे जाते विश्व में पराधीन कौम अपनी बात सुना सका, यही क्या कम है?
गुलाम भारत के रियासती ओहदेदार के घर जन्मे मोहनदास को सत्ता की शक्ति का बखूबी अंदाजा था। वह जानते थे कि बगावतें कुचल दी जाती हैं, परंतु सविनय अवज्ञा से पार पाना आसान नहीं है। वह अपने आग्रहों पर इतने दृढ़ थे कि पंजाब में जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद हत्यारों को भी क्षमा करने की अपील करने में उन्हें संकोच न हुआ। वह जानते थे कि इससे उनकी साख और लोकप्रियता पर बट्टा लग सकता है। जनसभाओं में लोकप्रिय जनमत के खिलाफ बिना किसी बड़ी सुरक्षा के ऐसी बातें बोलना आसान नहीं है, पर वह अविचल रहे। 
आज छोटे-मोटे ओहदेदार भी कड़ी सरकारी सुरक्षा में चलते हैं और टीवी के कैमरे देखते ही गिरगिट की तरह रंग बदल लेते हैं। 
गांधी ने कभी रंग नहीं बदला। वह जान की कीमत पर अपनी जिद पर अड़े रहे। 30 जनवरी, 1948 के हत्यारे दिन से दस दिन पूर्व भी उन पर बम से हमला हुआ था। उस समय गृह मंत्री का दायित्व संभाल रहे सरदार वल्लभभाई पटेल ने उनसे आग्रह किया था कि वह अपनी सुरक्षा में बढ़ोतरी की इजाजत दें और अपनी दिनचर्या में रक्षकों की सलाह के अनुरूप परिवर्तन करें। वह नहीं माने। 
एक बात और, जिस नाथूराम गोडसे ने उनकी हत्या की थी, वह खुद भी उनसे निजी घृणा नहीं करता था। उसने सुनवाई में कभी गांधी के लिए अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया। नाथूराम गोडसे के छोटे भाई गोपाल गोडसे भी गांधी हत्याकांड में अभियुक्त ठहराए गए थे। रिहा होने के बाद वह दो बार मेरे पास आगरा आए थे। दो दौर की उस घंटों लंबी बातचीत में गोपाल बार-बार कहते थे कि हमने गांधी की हत्या नहीं की, वैचारिक विरोध में उनका वध किया। मुझे उनके तर्कों से अपच होती थी, पर छोटे गोडसे कभी उत्तेजित नहीं होते। बरसों की कैद ने उन्हें ठहराव दे दिया था। आज पलटकर जब तीन दशक पहले कही उनकी बातों पर गौर करता हूं, तो संपूर्ण असहमति के बीच जो एक तथ्य बार-बार उभरता है, वह है, विचार! 
गांधी और गोडसे दो पृथक विचारों के प्रतिनिधि थे। राष्ट्रपिता अगर कुछ वर्ष पूर्व किसी बीमारी या किसी अन्य वजह से चले गए होते, तब भी वह ‘गांधी’ बने रहते। गोडसे को सिर्फ एक हत्या ने ‘गोडसे’ बना दिया। गोडसे और गांधी के बीच यह फर्क हमेशा कायम रहेगा।  

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