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जीत के लिए जहर जरूरी नहीं

जहरीले बोल लोगों के दिलो-दिमाग में कड़वाहट घोल रहे हैं। ऐसा करते वक्त हमारे सियासतदां यह भी नहीं सोचते कि जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा और संप्रदाय की सियासत जाने-अनजाने कुछ ऐसे बबूल रोप जाती है, जो आने..

जीत के लिए जहर जरूरी नहीं
Monika Minalशशि शेखरSat, 18 May 2024 08:06 PM
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चौथे चरण के साथ लगभग 70 फीसदी निर्वाचन क्षेत्रों का नसीब ईवीएम में सील हो चुका है। पांचवें चरण से ऐन पूर्व क्या आपने देश के सियासी सूरमाओं की कथनी में कुछ बदलाव महसूस किया है? रह बची 30 प्रतिशत सीटों के लिए नए दावों, वायदों के साथ वाणी की कटुता चरम पर पहुंच रही है। 
भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगियों का दावा है कि हम यह चुनाव जीत चुके हैं और अब तेजी से ‘400 पार’ के लक्ष्य की ओर अग्रसर हैं। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने लखनऊ में अखिलेश यादव के साथ पत्रकारों को संबोधित करते हुए जवाबी तीर चला कि भारतीय जनता पार्टी चुनाव हार चुकी है और सभी चरणों में हमारी सीटों में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जहां अपने तीसरे कार्यकाल को देश की तेज तरक्की को समर्पित करने की बात करते हैं, तो वहीं गृह मंत्री अमित शाह पीओके (पाक ऑक्यूपाइड कश्मीर) को फिर से भारत का हिस्सा बनाने का संकल्प दोहरा रहे हैं। प्रधानमंत्री ने बिहार की एक जनसभा में यहां तक दावा किया कि हम पाकिस्तान को चूड़ियां पहना देंगे। 
यह पहला मौका है, जब भारत के प्रधानमंत्री और गृह मंत्री सार्वजनिक मंचों पर इतनी कठोर भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे पहले अंतरराष्ट्रीय दबावों की चिंता करते हुए इस तरह की बातें चांदी का वरक लगे अक्षरों में सजाकर एहतियात के साथ परोसी जाती थीं। 
उधर, ‘इंडिया’ ब्लॉक की ओर से मल्लिकार्जुन खड़गे मुफ्त बंटने वाले अनाज को दोगुना बढ़ाकर दस किलो करने के साथ आरक्षण की सीमा 50 फीसदी से ऊपर ले जाने का वायदा कर रहे हैं। क्या यह संभव है? कांगे्रस के एक बडे़ नेता से जब मैंने यह सवाल पूछा, तो उन्होंने ब्राजील का उदाहरण दे दिया। उनका कहना है कि ब्राजील में ‘फ्रीबीज’ के बेहतरीन परिणाम सामने आए हैं, तो भारत में ऐसे प्रयोग करने में क्या बुराई है? 
हो सकता है, आप सोच रहे हों कि अंतिम पायदान की ओर बढ़ते चुनाव में वायदे और दावे क्यों नई रंगत ले रहे हैं? हमारे राजनेता आजादी के साथ ही रंग बदलना सीख गए थे। यही वजह है कि पश्चिम बंगाल में कांग्रेस से मोर्चा लेने वाली ममता बनर्जी ने भी सुर बदल लिए हैं। कल तक वह कांग्रेस को समूचे देश के पैमाने पर 40 सीटों से नीचे समेट रही थीं। अब उनका कहना है कि देश में इंडिया ब्लॉक 300 सीटें लाने जा रहा है और हम उसे बाहर से समर्थन करेंगे।
यह क्या लुकाछिपी है?
जवाब पेचदार है। ममता बंगाल में कांग्रेस और वाम दलों को दरकिनार कर शेष भारत में इंडिया ब्लॉक का समर्थन कर रही हैं। कभी कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे कमलापति त्रिपाठी के प्रपौत्र ललितेश त्रिपाठी उत्तर प्रदेश में भदोही से टीएमसी के टिकट पर चुनावी खम ठोक रहे हैं। समाजवादी पार्टी ने अपने हिस्से से यह सीट उन्हें दी है। इस तरह कांग्रेस का अप्रत्यक्ष समर्थन ललितेश को हासिल है। ममता बनर्जी इंडिया ब्लॉक का लाभ लेने के साथ अपनी झोली का मुंह भी भींचे रखना चाहती हैं। कांग्रेस और वाम दल भी इसी रणनीति पर काम कर रहे हैं। वे केरल में गुत्थमगुत्था हैं, पर बंगाल में तृणमूल की तृष्णा के आड़े आ रहे हैं। इसी तर्ज पर आम आदमी पार्टी और कांग्रेस पंजाब में पंजा लड़ा रहे हैं, लेकिन दिल्ली और शेष देश में साथ खडे़ हैं। 
इस बीच मंदिर, मस्जिद, हिंदू, मुसलमान, कब्रिस्तान, श्मशान, औरंगजेब, जातीय गणना, हिन्दुस्तानियों के रंग और वर्ण जैसे जहरीले बोल भी लोगों के दिलो-दिमाग में कड़वाहट घोल रहे हैं। ऐसा करते वक्त हमारे सियासतदां यह भी नहीं सोचते कि जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा और संप्रदाय की सियासत जाने-अनजाने कुछ ऐसे बबूल रोप जाती है, जो आने वाली पीढ़ियों के तन-मन को छलनी करते रहते हैं। 1970 और 80 के दशक में पंजाब और उसके बाद के बीस साल कश्मीर में जो हुआ, वह इसका शर्मनाक उदाहरण है। एक और शर्मनाक, पर सबसे ताजा उदाहरण मणिपुर का है। कारगिल जंग के जांबाज की पत्नी के साथ जो हुआ, वह पनपती नस्लीय नफरत की बानगी है। 
अब इस घातक सिलसिले को रुक जाना चाहिए। 
यह खतरनाक सिलसिला रुक सकता है, अगर चुनाव आयोग अपने समूचे हक-हुकूक का समान भाव से तत्काल उपयोग करे। मैं यहां चुनाव आयोग और उसकी मशीनरी की मंशा पर प्रश्न नहीं उठाना चाहता, मगर अपनी निष्पक्षता का दावा करने वाला आयोग इस मुद्दे पर अपने नख-शिख क्यों नहीं आजमाता? वह जो कर रहा है, अच्छा कर रहा है, पर इतने मात्र से सभी सवालों का समापन नहीं हो जाता। एक उमगते और उफनते लोकतंत्र में तरह-तरह के प्रश्न तो हमेशा हर हाल में उपजते रहेंगे। उनको लंबे समय तक अनदेखा नहीं किया जा सकता। 
यहां एक और महत्वपूर्ण सवाल सिर उठाता है। हमारे कुछ राजनीतिज्ञ इतनी गैर-जिम्मेदारी से कैसे बोल पाते हैं? क्या वे हमारी जम्हूरियत को सेंत-मेंत का मानते हैं? 
उन्हें मैं एक किस्सा सुनाना चाहता हूं। पिछले साल की बात है। मैं कश्मीर घाटी में अनुच्छेद 370 की रुखसती के बाद आए बदलावों को खंगालने की कोशिश कर रहा था। उसी दौरान मुझे वह शख्स मिला। उसका एक पैर लुंज-पुंज स्थिति में लटका हुआ था। दूसरा भी सही तरीके से सड़क नहीं नाप पा रहा था। लाठी के सहारे किसी तरह वह अपने भाई के साथ बाजार में खरीदारी के लिए निकला था। उत्सुकतावश मैंने उसे रोका। बातचीत के दौरान पता चला कि जिला पंचायत के चुनाव के दौरान गांव में कुछ दहशतगर्द आए और लोगों को धमकाया कि अगर मतदान की कोशिश भी की, तो अंजाम बुरा होगा। उसे लगा कि यह कोरी गीदड़ भभकी है। 
वोट डालने के तीसरे ही दिन उसकी टांगों पर कई गोलियां दाग दी गई थीं। 
हो सकता है कि आपके मन में सवाल उठे कि दहशतगर्द टांगों पर गोली मार विदा क्यों हो गए? वे सीना भी तो छलनी कर सकते थे? मैंने भी यही पूछा था। उसका जवाब चौंकाने वाला था। आतंक और अलगाव के हमसाये उसे एक जीते-जागते प्रतीक के तौर पर इस्तेमाल करना चाहते थे, ताकि लोग उसे देखें और खुद को ‘इंडिया’ द्वारा ‘प्रायोजित’ चुनाव से दूर रखें। आप जानते हैं, इन चुनावों में इस तरह के तत्व असफल रहे  और चौथे दौर के मतदान में घाटी के लोगों में जो उत्साह दिखा, वह सीमा पार से प्रायोजित आतंक के मुंह पर जोरदार तमाचा है। मैं उस शख्स का यहां जान-बूझकर नाम नहीं लिख रहा, पर कश्मीर के अलावा पूर्वोत्तर के अलगावग्रस्त और छत्तीसगढ़, झारखंड के साथ महाराष्ट्र के नक्सल प्रभावित इलाकों में ऐसे दर्जनों लोग मिल जाएंगे, जिन्होंने लोकतंत्र की नींव को अपने खून से सींचा है। 
मैं यहां ससम्मान सुरक्षा बलों के शहीदों के परिजनों की भी याद दिलाना चाहूंगा। अपने देश और इसकी कानून-व्यवस्था को कायम रखने के लिए उनके स्वजनों ने घर-बाहर कभी भी जान कुर्बान करने में मामूली सी हिचक तक नहीं दिखाई। कौन कहता है कि जम्हूरियत बरसों-बरस यूं ही चलती चली जाती है? 
हमारे नेता इस तथ्य को इतनी आसानी से बिसरा कैसे देते हैं?  

@shekharkahin

@shashishekhar.journalist

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