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कुछ खुशी, कुछ गम देता चुनाव

मुझे यह कहने में संकोच नहीं कि भारतीय लोकतंत्र की रक्षा ‘व्हाइट कॉलर’ लोगों से कहीं अधिक गंवई और गरीब लोगों ने की है। आप इसे आजाद भारत का दुर्भाग्य कह सकते हैं कि अधिक पढे़-लिखे और आर्थिक रूप से बेहतर

कुछ खुशी, कुछ गम देता चुनाव
शशि शेखर शशि शेखरSat, 01 Jun 2024 09:02 PM
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देश में अठारहवीं लोकसभा के आखिरी चरण का मतदान संपन्न हो चुका है और अब संसार की सबसे विशाल आबादी को नतीजों का इंतजार है। चुनाव परिणामों को जानने के लिए विदेश के भी वे लोग बेकरार हैं, जिन्हें सही या गलत वजहों से नई दिल्ली की हुकूमत में रुचि है। बरसों से चुनाव-दर-चुनाव मुझे दूसरे महायुद्ध के दौरान ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बने विंस्टन चर्चिल याद आते रहे हैं। उन्होंने दंभपूर्वक कहा था कि भारत में लोकतंत्र तीसरी लोकसभा के चुनाव तक नहीं पहुंच पाएगा।
चर्चिल की नजरों में ‘जाहिल’ हिन्दुस्तानियों ने उस उपनिवेशवादी हुक्मरां को मुंहतोड़ जवाब दिया है।
भारत जैसे देश में चुनावों का वैशिष्ट्य सिर्फ मतदान के दोहराव में निहित नहीं है। हर चुनाव के अपने अलग रंग और तेवर होते हैं। मसलन, इस बार कश्मीर घाटी में औसतन 50 फीसदी से ज्यादा मत पड़े। कभी दहशतगर्दी का दुर्ग माने जाने वाले अनंतनाग में तो आंकड़ा 55.40 पर जा टिका। कश्मीर में पहले चुनाव बदमजगी लेकर आते थे। इस बार उम्मीद और उत्साह साफ दिखते थे।
मौजूदा मतदान को छोड़ दें, तो 1980 के दशक के बाद से ऐसा कोई चुनाव नहीं बीता, जब अलगाववादियों ने आरोप न लगाया हो कि मतदाता जबरदस्ती अपने घरों से उठाकर मतदान केंद्रों पर खडे़ किए गए। वे सही थे या गलत? सच जो हो, पर ऐसे बयानों से उनकी खीझ जरूर जगजाहिर होती, क्योंकि वे हर बार चुनाव बहिष्कार की अपील चेतावनी भरे अंदाज में करते थे। मैं खुद ऐसे लोगों से मिला हूं, जिन्होंने ऐसी अपील की अनदेखी कर वोट डालने की हिमाकत की और दुष्परिणाम झेले।
ध्यान रहे। गई 5 अगस्त, 2019 को अनुच्छेद 370 की रवानगी के बाद घाटी में यह पहला आम चुनाव था। पुराने अनुभवों का तकाजा था कि चुनाव आयोग पूरी सावधानी बरते। ऐसा किया भी गया। नतीजतन, घाटी में हिंसा की छोटी-मोटी वारदात तक नहीं हुई। कश्मीरियों को समझ में आ गया है कि अब अगर अपनी बात दिल्ली के दरबार में पहुंचानी है, तो उसके लिए चुनाव में हिस्सेदारी से बेहतर कोई दूसरा तरीका नहीं है। इसी के जरिये अपने नुमाइंदे देश की सबसे बड़ी पंचायत में भेजे जा सकते हैं, ताकि वे उनके हक-हुकूक की आवाज बुलंद कर सकें। घाटी की जेहनियत जानने वाले इसे शुभ संकेत मानते हैं। यहीं सवाल उठता है कि क्या पाकिस्तानी प्रवंचनाओं के दिन लद गए? हालात में सुधार के बावजूद अभी एहतियात बरतना होगा।
जम्हूरियत और जनता का रिश्ता इस इलाके में कई बार छुई-मुई साबित हो चुका है।
घाटी में इस उत्साह को देख देश की राजधानी नई दिल्ली में तो लोग उमड़ पड़ने चाहिए थे। ऐसा नहीं हुआ। नई दिल्ली सीट पर सिर्फ 55.43 फीसदी मतदाताओं ने अपनी लोकतांत्रिक जिम्मेदारी का निर्वाह किया। आज से कुछ दशक बाद कोई शोधार्थी इस आंकडे़ को देख क्या यह नहीं सोचेगा कि नई दिल्ली और अनंतनाग में एक सी बयार बह रही थी! दिल्ली ही नहीं, मुंबई और देश के अन्य महानगरों ने भी इस मामले में समय की मांग को अनदेखा किया।
मुझे यह कहने में संकोच नहीं कि भारतीय लोकतंत्र की रक्षा ‘व्हाइट कॉलर’ लोगों से कहीं अधिक गंवई और गरीब लोगों ने की है।
आप इसे आजाद भारत का दुर्भाग्य कह सकते हैं कि अधिक पढे़-लिखे और आर्थिक रूप से बेहतर तबके में राजनीति के प्रति आत्मघाती विराग दिखता है। यह वर्ग मतदान केंद्रों में अपनी जिम्मेदारी निभाने के बजाय सैर-सपाटे में अधिक रुचि रखता है। भरोसा न हो, तो एक बार उन खबरों पर नजर डाल देखिए, जो चीख-चीखकर मुनादी करती हैं कि तमाम दर्शनीय स्थलों पर होटलों के सौ फीसदी तक कक्ष पहले से ही आरक्षित करा लिए गए थे। इनमें से अधिकांश महानगरों के समीप हैं।
खुद को संभ्रांत कहने वाले ऐसे लोगों को अब राजनीति और राजनेताओं पर टीका-टिप्पणी बंद कर देनी चाहिए।
यहां एक और आंकड़ा आपके सामने रखना चाहूंगा। आप जानते हैं कि 1951-52 में पहला आम चनाव हुआ था। 17,32,12,343 वोटर थे। इनमें से 44.87 प्रतिशत लोगों ने मताधिकार का प्रयोग किया था। इस वक्त देश में लगभग 97 करोड़ लोग बतौर वोटर पंजीकृत हैं। चुनाव आयोग ने अब जो तथ्य जारी किए हैं, उसके अनुसार इस बार लगभग 65 प्रतिशत लोगों ने मतदान किया है, जो पिछली बार, यानी 2019 से कम है।  
एक और तथ्य गौरतलब है। पहले आम चुनाव की मतदान-प्रक्रिया पांच महीने से अधिक खिंची थी और इस बार डेढ़ महीना। इस नाते यह देश का दूसरा सबसे लंबा चुनाव रहा। इस दौरान ताप लहरी ने तमाम पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त किए, जिससे प्रचार और मतदान की राह अवरुद्ध हुई। कोई अचरज नहीं कि तमाम राजनेताओं और विचारकों ने चुनाव आयोग से इसकी अवधि घटाने और अत्यधिक गरमी अथवा सर्दी के दिनों में चुनाव न कराने की अपील की है।
इसी दौरान कई लोग ‘एक देश एक चुनाव’ के पक्ष में भी बात करते दिखाई दिए। भाजपा भी यही संकल्प व्यक्त करती है।
चुनाव प्रचार के दौरान इस बार भी देश की जनता ने दुखी और चकित भाव से अपने नेताओं की गरिमाहीन भाषा को अभिशाप-भाव से झेला। इतनी छिछली भाषा मतदाताओं की आस्थाओं को चोटिल करती है। संवेदनशील हिंदी पट्टी में कम मतदान इस तथ्य का खुलासा करता है। हमारे नेता अभद्र और अनर्गल तर्क गढ़ते समय भूल जाते हैं कि वे भी सोशल मीडिया के उफनते दिनों से गुजर रहे हैं। इन दिनों आनन-फानन में दूध का दूध और पानी का पानी हो जाता है। कोई आश्चर्य नहीं कि नेताओं की बेतुकी बातों पर इस बार बेशुमार ‘मीम्स’ प्रचलित हुए। भारत के राजनीतिक दल और राजनीतिज्ञ इस संबंध में विचार क्यों नहीं करते? अगर यही हाल रहा, तो उनकी सभाओं में भीड़ सिमटती चली जाएगी।
पिछले कुछ वर्षों की तरह इस बार चुनाव आयोग की भी जमकर छीछालेदर हुई। मतदान के आंकड़ों को इकट्ठा करने में देरी पर मामला अदालत पहुंचा। आयोग नेताओं की बदजुबानी पर भी अंकुश लगाने में आम आदमी की आशाओं पर खरा नहीं उतर सका। इससे आयोग का वह भगीरथ प्रयास धूमिल पड़ गया, जिसके चलते इतने बडे़ देश में हिंसा रहित चुनाव संपन्न हो सके। यहां एक और तथ्य गौरतलब है कि कश्मीर के मुकाबले बंगाल अधिक हिंसक साबित हुआ। हालांकि, यह भी सच है कि पिछले चुनावों के मुकाबले बंगभूमि काफी शांत रही। चुनाव आयोग के निर्देश पर सरकारी तंत्र ने इस बार लगभग नौ हजार करोड़ रुपये की नकदी, नशीले पदार्थ व उपहार जब्त किए। यह ऐतिहासिक बरामदगी है, पर आयोग इसका अपनी छवि के सुधार में प्रयोग न कर सका। उसे न केवल अदालत की फटकार सुननी पड़ी, बल्कि तमाम संगठनों का अभियान भी झेलना पड़ा। हजारों लोगों ने आयोग को पत्र लिखकर ‘ग्रो ए स्पाइन ऑर रिजाइन’ अभियान में हिस्सा लिया, जो अभूतपूर्व था। 
उम्मीद है कि आयोग समय रहते अपनी सफलताओं की गणना के साथ असफलताओं का भी आकलन करेगा। बेहतर चुनाव प्रक्रिया इस वक्त की सबसे बड़ी मांग है। 

@shekharkahin

@shashishekhar.journalist

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