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मतदाता का मन अभी से मत पढ़िए

क्या कम मतदान किसी एक गठबंधन के हक में और दूसरे के विरोध में है? इस सवाल का जवाब अभी असंभव है। कम या ज्यादा मतदान हार-जीत की मुनादी नहीं करता। वर्ष 1971 में मत प्रतिशत लगभग छह फीसदी गिरने के बावजूद...

मतदाता का मन अभी से मत पढ़िए
Monika Minalशशि शेखरSat, 11 May 2024 10:28 PM
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तीसरे दौर का मतदान खत्म हो चुका है। उत्सुक पर्यवेक्षकों की निगाहें अब अगले हफ्ते होने वाले चौथे चरण पर हैं। सवाल उठ रहे हैं कि हिंदी पट्टी के प्रदेश क्या फिर फिसड्डी साबित होने जा रहे हैं? वहां मतदान कम क्यों हो रहा है? 
चर्चा की शुरुआत उस शहर, नोएडा (गौतमबुद्ध नगर) से करना चाहता हूं, जहां मैं रहता हूं। उस दिन चुनाव के दूसरे चरण का मतदान था और हम कुछ पत्रकार एक चैनल में समीक्षा के लिए बैठे हुए थे। सुबह के आठ बजे थे, पर मतदान केंद्रों पर लंबी लाइनें लगी हुई थीं। ऐसा लगता था कि पहले चरण में चस्पां हुए हल्के मतदान के दाग आज धुल जाएंगे।  
हम गलत थे।
दोपहर होते-होते मतदान केंद्र खाली होते गए और शाम होने तक उनमें सन्नाटा पसर गया। इस नए बसे और आजाद खयाल महानगर में कुल 53.63 फीसदी पंजीकृत लोगों ने मताधिकार का प्रयोग किया था। इसमें भी महिलाओं की भागीदारी बहुत कम थी। बताने की जरूरत नहीं कि नोएडा शहर की महिलाओं में साक्षरता और आत्मनिर्भरता दर देश के तमाम हिस्सों की अपेक्षा ज्यादा है। 
उन्होंने अपने लोकतांत्रिक दायित्व का पालन क्यों          नहीं किया?
उस दिन टीवी स्टूडियो में बैठे हुए यह भी लग रहा था कि हिंदी पट्टी के प्रदेशों के साथ समूचा देश मतदान के औसत के मामले में पिछले दो चुनावों से पिछड़ रहा है, लेकिन चुनाव आयोग ने गुजरे मंगलवार को साफ किया कि पहले चरण में 66.14 और दूसरे में 66.71 फीसदी मतदान हुआ था। पिछले दो चुनावों की बात छोड़कर अब तक के राष्ट्रीय औसत से तुलना करें, तो यह कहीं से कमतर नहीं दिखाई पड़ता। 
विपक्ष के नेता इसमें षड्यंत्र तलाश रहे हैं। कुछ स्वतंत्र पर्यवेक्षक भी आयोग पर तरह-तरह के तंज कस रहे हैं। इस समय चुनाव आयोग को अधिक सावधानी बरतने की आवश्यकता है। संचार के आधुनिकतम संसाधनों से लैस आयोग को इतनी देरी क्यों लगी? अगर उसके अधिकारी इसे स्पष्ट कर सकेंगे, तो आयोग के प्रति जन-धारणा बेहतर हो सकेगी। इससे राजनीतिक कार्यकर्ताओं और मताधिकार के प्रति सचेष्ट करने वाली संस्थाओं को मदद मिलेगी। 
हालांकि, तीसरे दौर में आयोग ने तत्परता दिखाई। अंतिम आंकड़ों के अनुसार 07 मई को 65.68 प्रतिशत लोगों ने मताधिकार का प्रयोग किया। इन आंकड़ों के आने के बाद उन लोगों की बोलती जरूर बंद हो गई है, जो  कम मतदान में किसी पार्टी विशेष की हार या जीत तलाश रहे थे। ऐसा करने वाले भी जानते हैं कि कम या ज्यादा मत प्रतिशत कभी हार-जीत की मुनादी नहीं करता। मसलन, 2014 में 2009 के मुकाबले 8.23 फीसदी अधिक वोट पड़े। आप जानते हैं कि इसी के साथ नई दिल्ली में मोदी-युग की शुरुआत हुई, यानी वह चुनाव परिवर्तनकारी था और बढ़े हुए मत उत्साह के प्रतीक थे। इससे पहले सन् 2004 में भी नई दिल्ली के हुक्मरां बदले थे। अटल बिहारी वाजपेयी की जगह मनमोहन सिंह सत्ता-सदन में आ विराजे थे, पर यह बदलाव मतदान के प्रतिशत में लगभग दो फीसदी की गिरावट के बावजूद हो गया। 
सत्ता पक्ष और विपक्ष इसका अपने-अपने तरीके से भले ही मतलब निकालते रहें, पर यह तय है कि कुछ वजहों से राजनीतिक कार्यकर्ताओं और सामान्य मतदाताओं का दिल टूटा है। सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी से शुरुआत करते हैं। भगवा दल के तमाम कार्यकर्ता और सांसद सिर्फ प्रधानमंत्री के चेहरे के सहारे अपनी नैया पार लगाना चाहते हैं। ऐसे लोगों की लापरवाही का नतीजा है कि जातियां और पार्टी के अंदर की अंतरकलह लौट आई है। मोदी पिछले दो चुनावों में जाति के बंधनों को ‘बुलडोज’ करने में सफल रहे थे। इसके साथ तेजी से गठबंधनों का बनना-टूटना और ‘बाहर’ से आए नेताओं को वरीयता मिल जाना, कार्यकर्ताओं का मनोबल कायम नहीं रख सका है। ये लोग पिछले चुनाव तक मतदाताओं को निर्वाचन केंद्र तक ले जाने के लिए जी-जान एक कर देते थे।  
अन्य दलों के हालात भी जुदा नहीं हैं। विपक्ष न तो साझा गठबंधन बना सका है और न कोई सार्थक विमर्श गढ़ने में कामयाब रहा। यहां तक कि शरद पवार और उद्धव ठाकरे तो अपने-अपने दल को एकजुट न रख सके। उनसे अलग हुए धड़ों ने भाजपा से हाथ मिला लिया। राहुल गांधी और उनकी कांग्रेस अब क्षेत्रीय क्षत्रपों के साथ चुनाव मैदान में है। 
इसके अलावा, नेताओं का आचार-व्यवहार भी संवेदनशील मतदाताओं का मन तोड़ता है। पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा के पुत्र एचडी रेवन्ना और पौत्र प्रज्वल रेवन्ना के कथित सेक्स-वीडियो का प्रकरण इसका जीवंत उदाहरण है। उनकी एक परिचारिका ने उन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। प्रज्वल विदेश पलायन कर गए हैं और उनकी पार्टी ने उन्हें निलंबित कर दिया है। प्रज्वल खुद लोकसभा के सदस्य हैं। इस बार भी वह हासन से ताल ठोक रहे हैं। उन पर आरोप चौंकाते हैं। कहते हैं, पुलिस को एक ऐसी पेन-ड्राइव हाथ लगी है, जिसमें उनके दो हजार नौ सौ से अधिक ‘अश्लील क्लिप’ हैं। अगर यह सच है, तो इतिहास इसे कैसी त्रासदी के तौर पर दर्ज करेगा? 
आप चाहें, तो अफसोस से हाथ मल सकते हैं। इससे पूर्व भाजपा के एक सांसद की भी ऐसी ही क्लिप वायरल हुई थी। उन्होंने रेवन्ना की तरह इसे फर्जी बताते हुए खुद को चुनाव से अलग कर लिया था। भारतीय कुश्ती महासंघ के पूर्व अध्यक्ष और सांसद बृजभूषण शरण सिंह पर भी शोषण के आरोप हैं। भाजपा ने उन्हें टिकट नहीं दिया है। बात यहीं नहीं खत्म होती। कुछ दिनों पूर्व इंदौर में कांग्रेस प्रत्याशी ने अचानक भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो चौंका दिया। इससे पूर्व सूरत के कांग्रेस प्रत्याशी का पर्चा रद्द होना और अन्य दलों के साथ सभी निर्दलीयों का नाम वापस ले लेना भी लोकतांत्रिक आस्था को चोटिल करता है। झारखंड के मंत्री के करीबी के यहां से भारी रकम की बरामदगी और नेताओं की जहरीली भाषा लोकतंत्र के प्रति आम आदमी के भरोसे का दम घोंटती है। यहां आप सैम पित्रोदा को याद कर सकते हैं। वह इन चुनावों के दौरान दो बार अपने दल को सांसत में डाल चुके हैं।
इन मुद्दों पर राजनीतिक पार्टियों को गंभीरता से विचार करना चाहिए।
सवाल उठता है कि क्या कम मतदान किसी एक गठबंधन के हक में और दूसरे के विरोध में है? इस सवाल का जवाब अभी असंभव है। कम या ज्यादा मतदान हार-जीत की मुनादी नहीं करता। वर्ष 1971 में मत प्रतिशत लगभग छह फीसदी गिरने के बावजूद इंदिरा गांधी पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में लौटी थीं। अगला चुनाव 1977 में हुआ, इस बार कुल मत-प्रतिशत में चार फीसदी से अधिक बढ़ोतरी हुई, पर वह हार गईं। हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि हिंदी पट्टी और महाराष्ट्र के ढीलेपन के बावजूद तीसरे दौर में राष्ट्रीय स्तर    पर सुधार हुआ है। यह टे्रंड और जोर नहीं पकड़ेगा, इसकी क्या गारंटी है?

@shekharkahin

@shashishekhar.journalist