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श्रद्धांजलि : अटल बिहारी यूं ही नहीं गुनगुनाते थे-गीत नया गाता हूं

atal bihari vajpayee

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अटल बिहारी वाजपेयी

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अटल बिहारी वाजपेयी पिछले एक दशक से मौन थे। काल के कुचक्र ने देश की प्रखरतम वाणी को हमसे छीन लिया था और वे चलने-फिरने से भी लाचार थे। 

इस आरोपित वार्धक्य ने भले ही उन्हें ‘शीर्ष का सूनापन’ जीने के लिए बाध्य कर दिया हो पर भारतीय राजनीति का ऐसा कोई लम्हा न था, जब वाजपेयी जी को याद न किया गया हो। उनके शब्द लोगों के कानों में गूंजते,उनके ठहाकों के बिना सेंट्रल हॉल और दिल्ली की सियासी महफिलें खुद को रीता महसूस करतीं। कौन कहता है वे मौन थे? कौन कहता है कि आज उनका निधन हो गया?

उन्होंने काल के कपाल पर कभी न मिटने वाली ऐसी छाप छोड़ी है, जो आती दुनिया में ‘अटल’ बनी रहेगी।

1991 की गरमियों की बात है। देश में आम चुनाव का माहौल था। विश्वनाथ प्रताप सिंह और चंद्रशेखर की खिचड़ी सरकारों ने लोगों के लोकतांत्रिक सपनों को चकनाचूर कर दिया था। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक लोगों के मन में सवाल कौंध रहे थे, क्या राजीव गांधी वापस लौटेंगे या फिर से खिचड़ी सरकार बनेगी? अगर मिलीजुली हुकूमत आती है, तो प्रधानमंत्री कौन होगा? उन्हीं दिनों अटल जी की एक जनसभा आगरा के संजय प्लेस में आयोजित की गई। मुझे याद है, वे काफी देर से पहुंचे, पर लोग जमे हुए थे। उन्होंने लगभग 40 मिनट के भाषण में देश और दुनिया के मुद्दों से वहां उपस्थित हरेक शख्स को इस प्रकार जोड़ा कि तालियां रुकने का नाम नहीं ले रही थीं।

दुरूह से दुरूह मुद्दे को जनता के दिल की बात कैसे बनाया जा सकता है, इसे कोई अटल बिहारी वाजपेयी से सीखे।

स्वीकार्यता उनका दूसरा सबसे बड़ा गुण था। वे सच्चे मन से दूसरों को इस हद तक स्वीकार करते थे कि सामने वाला उन्हें अपनाने के लिए विवश हो जाता था। याद कीजिए, उनकी सरकार में व्यवस्था के चिरविरोधी लोगों ने महत्वपूर्ण मंत्रालय संभाले और बेहतरीन काम किया। जॉर्ज फर्नाण्डीज जैसे प्रखर समाजवादी उन दिनों एनडीए के संयोजक हुआ करते थे। राजनीति की तीन देवियों-मायावती, ममता बनर्जी और जयललिता को एक साथ लेकर चलना सिर्फ उनके बलबूते की बात थी।

लोग अटल जी को यों ही अजातशत्रु नहीं कहते।

वे किस हद तक लोगों से घुल-मिल सकते थे, इसका एक और उदाहरण देता हूं। मधुर वाणी वाले वाजपेयी की मौन रहने वाले नरसिंह राव और धारदार  भाषा के  समर्थक चंद्रशेखर से खूब पटती थी। संसद हो या सार्वजनिक सभाएं, उसमें वे एक-दूसरे पर हमला बोलते पर उनमें कटुता कभी न होती। ये तीनों ही प्रधानमंत्री बने। ऐसी विलक्षण मित्रताएं आज के सियासी परिदृश्य से पूरी तरह नदारद हो गई हैं।

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  • Web Title:atal bihari vajpayee passes away tribute by shashi shekhar