जंगों के नए दौर में उलझती दुनिया
पिछले ही हफ्ते अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चिंता जताई थी कि यदि रूस-यूक्रेन जैसे संघर्ष जल्द खत्म नहीं किए गए, तो दुनिया तीसरे महायुद्ध में फंस सकती है। मगर उन्होंने खुद वेनेजुएला पर सैन्य कार्रवाई करके राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को…

एम जे अकबर, पूर्व विदेश राज्य मंत्री व वरिष्ठ पत्रकार
पिछले ही हफ्ते अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चिंता जताई थी कि यदि रूस-यूक्रेन जैसे संघर्ष जल्द खत्म नहीं किए गए, तो दुनिया तीसरे महायुद्ध में फंस सकती है। मगर उन्होंने खुद वेनेजुएला पर सैन्य कार्रवाई करके राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को सपत्नी बंधक बना लिया और वहां नई सरकार के गठन का एलान कर दिया, जिसे अमेरिका चलाएगा। यह एक देश का ‘कॉरपोरेट टेकओवर’ है, क्योंकि खुद ट्रंप के ही शब्द हैं, ‘उन्हें वेनेजुएला का तेल चाहिए’।
इस घटना से उन देशों को साहस मिलेगा, जिनका एजेंडा अब तक ‘अधूरा’ है। यूक्रेन के कई इलाकों पर अधिकार जमाने का एलान रूस ने किया है, जबकि चीन की मंशा 2027 तक ताइवान पर कब्जा करने की है। अब अमेरिका किस मुंह से इनको रोकने के लिए आगे आएगा? पहली झलक में तो यही लगता है कि यूक्रेन की लड़ाई सिर्फ यूरोप की है, मगर क्रीमिया और यूक्रेन के पूरब में चेचन्या है। चेचन्या से कॉकेशस होते हुए हम सीरिया और पश्चिम एशिया में बहुत जल्द पहुंच जाते हैं, यानी यह यूरेशियाई युद्ध है।
वास्तव में, इस समय भूमध्य सागर, काला सागर, कैस्पियन सागर और लाल सागर के बीच जितने भी इलाके हैं, वे सभी युद्ध में फंसे हुए हैं। यहां इजरायल-हमास जंग, इजरायल-लेबनान तनाव, काकेशस संघर्ष (खासकर आर्मेनिया, अजरबैजान से ईरान का तनाव), वेनेजुएला के घटनाक्रम से ऐन पहले यमन पर सऊदी अरब का हमला, फ्रांस व ब्रिटेन की इराक व सीरिया के आईएस ठिकानों पर बमबारी (वेनेजुएला हमले के दिन) के रूप में तनाव के मोर्चे खुले हुए हैं। उत्तर कोरिया और जापान की ताजा तनातनी को भी इसमें गिन सकते हैं।
सवाल उठता है, क्या यह तीसरे विश्व-युद्ध की आहट है? मेरी नजर में यह ‘वर्ल्ड वार’ नहीं, ‘वर्ल्ड वाइड वार’ है, यानी हर महाद्वीप में जंग वाले हालात।
इसकी वजह भी है।
दूसरे महायुद्ध के बाद दुनिया में शांति व स्थिरता लाने के लिए जितने भी संस्थान बने, वे सभी बेमानी साबित हो रहे हैं। सन् 1945 में दूसरे महासमर का अंत ही नहीं हुआ था, बल्कि औपनिवेशिक देशों में आजादी का आगाज भी हुआ था। इसकी शुरुआत भारत से हुई थी, जब महात्मा गांधी द्वारा शुरू किए गए राष्ट्रीय आंदोलन ने बरतानिया हुकूमत का झंडा झुका दिया। उन दिनों अंग्रेज और अंग्रेजीदां हंसते थे कि क्या धोती पहनकर भी कोई ‘महान ब्रिटिश साम्राज्य’ को झुका सकता है? वे अगले 300 वर्षों तक उस हुकूमत के चलने की भविष्यवाणी किया करते थे। मगर 1920 के बाद वह साम्राज्य 30 साल भी नहीं चला और 1947 के बाद तो अगले तीन दशकों में दुनिया के हर कोने से ही उपनिवेशवाद खत्म हो गया। प्राय: सभी देशों को आजादी अहिंसा के रास्ते ही मिली।
उस वक्त संयुक्त राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसे तमाम संस्थान गढ़े गए और इनमें हरेक मुल्क का होना यह आश्वासन था कि उनकी संप्रभुता और आजादी अक्षुण्ण रहेगी, बेशक वे अमीर हों अथवा गरीब। मगर 1990 के बाद, खास तौर से 21वीं सदी की शुरुआत से ये तमाम संस्थान बेअसर होने लगे, क्योंकि ताकतवर देशों ने अपने लिए या विश्व-हित में उस नीति को तोड़ना शुरू किया, जिसमें किसी दूसरे देश में दखल न देने की बात कही गई थी। वि-उपनिवेशीकरण से हुए बदलाव को बड़ी ताकतें मानने को तैयार नहीं हुईं, जैसे- चीन ने तिब्बत की आजादी नहीं मानी; वियतनाम विभाजन मानने को तैयार नहीं हुआ और सूडान में जो कुछ हुआ, वह तो जगजाहिर ही है।
वेनेजुएला घटनाक्रम इस सच्चाई को एक नई ऊंचाई पर ले जा रहा है। राष्ट्रपति ट्रंप उसी ‘मोनरो नीति’ का पालन कर रहे हैं, जिसे साल 1823 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जेम्स मोनरो ने उस वक्त की भौगोलिक हकीकत के आधार पर तैयार किया था। उस जमाने में पूरा दक्षिणी व उत्तरी अमेरिका का अधिकतर हिस्सा यूरोप का उपनिवेश था। मोनरो ने दावा किया था कि उत्तरी हिस्सा तो अमेरिका का है ही, दक्षिणी अमेरिका पर भी अब विदेशी हित स्वीकार नहीं किए जाएंगे, क्योंकि वह उनका ‘आंगन’ है। मगर सबसे बड़ा सवाल यह है कि 19वीं सदी की नीति क्या 21वीं सदी में प्रासंगिक साबित होगी?
हालांकि, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने साफ कर दिया है कि उन्हें अगर कुछ चाहिए, तो वह साम-दाम-दंड-भेद, सबका इस्तेमाल करके उसे अपने कब्जे में लेना पसंद करेंगे। अब अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था और कानून निरर्थक हैं। वेनेजुएला में जो हुआ है, वह इसी संदेश को पुख्ता कर रहा है। ‘अमेरिका ही असल संयुक्त राष्ट्र है’ यह बात राष्ट्रपति ट्रंप कहते भी रहे हैं। अब क्या वह ग्रीनलैंड जाएंगे? यूरोपीय देशों के सामने यह दुविधा भी खड़ी हो गई है कि कनाडा को अमेरिका का 51वां राज्य बनाने की बात ट्रंप मजाक में कहते रहे हैं या वाकई उनकी यह मंशा है? नया घटनाक्रम यूक्रेन को भी एक संदेश है। अगर अमेरिका पड़ोस में अपने हित संभालने को स्वतंत्र है, तो रूस भी यह अधिकार रखता है। इससे कीव की हिम्मत और पस्त हो सकती है।
दूसरी बात। वेनेजुएला की एक सच्चाई यह है कि वहां दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार है, करीब 300 अरब बैरल। इसके बाद सऊदी अरब (लगभग 265 अरब बैरल) का स्थान आता है। अमेरिका के पास बमुश्किल 35 अरब बैरल तेल है। वेनेजुएला पर कब्जे के बाद अमेरिका के पास तेल बाजार को नियंत्रित करने की ताकत आ जाएगी। अब तेल ही नहीं, खनिज भी काफी महत्वपूर्ण हैं, खास तौर से सेमीकंडक्टर और चिप के लिए, तो जाहिर सी बात है कि तेल व खनिज की राजनीति अधिक परवान चढ़ेगी। पिछले 100 साल में आधे से अधिक जंग तेल के कारण ही हुए हैं।
रही बात भारतीय नीति की, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बखूबी यह समझते हैं कि आंतरिक ताकत जुटाए बिना कोई भी देश आजाद नहीं रह सकता। आज कई सारे देश स्वतंत्र तो हैं, लेकिन ‘आजाद’ नहीं हैं। हमें आजाद भी रहना है और संप्रभु भी, जो बिना सामरिक ताकत और राजनीतिक इच्छाशक्ति के संभव नहीं है। ‘टैरिफ जंग’ में ही हमने देखा है कि प्रधानमंत्री मोदी अमेरिका से टकराने की कुव्वत रखते हैं। वह मौजूदा विश्व-व्यवस्था को समझ रहे हैं।
यह घटनाक्रम बता रहा है कि 2026 में राजनीतिक अस्थिरता बढ़ेगी। दिक्कत यही है कि जिन संस्थानों पर इसे संभालने की जिम्मेदारी थी, वे खत्म कर दिए गए हैं। इस कारण यदि यह सदी का सबसे खतरनाक साल बन जाए, तो कोई आश्चर्य नहीं होगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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