ईरान पर हुए बड़े हमले से बदल रही दुनिया
ईरान युद्ध का अंदेशा तो था, लेकिन इस आक्रामकता के कयास नहीं लगाए गए थे। अब जब अमेरिकी और इजरायली हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई ही नहीं, उनके रक्षा मंत्री, आईआरजीसी मुखिया समेत कई महत्वपूर्ण लोग…

शशांक, पूर्व विदेश सचिव
ईरान युद्ध का अंदेशा तो था, लेकिन इस आक्रामकता के कयास नहीं लगाए गए थे। अब जब अमेरिकी और इजरायली हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई ही नहीं, उनके रक्षा मंत्री, आईआरजीसी मुखिया समेत कई महत्वपूर्ण लोग मारे गए हैं, तब मध्यपूर्व में वार और पलटवार भी बढ़ गया है। यह लग रहा है कि इस जंग का मकसद ईरान में सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं, पूरे इस्लामी शासन का अंत है। अब बड़ा सवाल यह है कि खामेनेई के बाद ईरान का क्या होगा? एक हिसाब यह भी लगाया जा रहा है कि यह युद्ध पश्चिम एशिया और विश्व राजनीति को किस कदर प्रभावित करेगा?
खबर है कि अयातुल्ला अराफी ने फिलहाल खामेनेई की जिम्मेदारी संभाल ली है, जो साफ संकेत है कि ईरान में इस्लामी शासन का अंत इतना आसान नहीं। खामेनेई भले ही सर्वोच्च नेता थे, लेकिन उन्होंने अपना काम-काज इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) और ईरानी आर्मी के बीच बांट रखा था। ऐसा उन्होंने अपनी बढ़ती उम्र के मद्देनजर किया था। इतना ही नहीं, ईरान काफी बड़ा देश है और एक बड़ी आबादी भले ही वहां के इस्लामी शासन से नाराज है, लेकिन वह किसी बाहरी दखल से सत्ता-परिवर्तन की पक्षधर नहीं है। लिहाजा, अमेरिका के लिए यहां अपनी पसंद की व्यवस्था लागू करवाना टेढ़ी खीर साबित हो सकता है।
दिलचस्प यह है कि अमेरिका और ईरान में दोस्ती व दुश्मनी के रिश्ते रहे हैं। किसी जमाने में यहां पहलवी शासन (शाह शासन) की स्थापना में ब्रिटिशों ने अहम भूमिका निभाई थी, लेकिन बाद में पहलवी सरकार अमेरिका के करीब हो गई थी। यह नजदीकी इतनी बढ़ गई थी कि शाह शासन को वाशिंगटन की ‘कठपुतली’ कहा जाने लगा था। सरकार का विरोध करने वालों पर कार्रवाइयां शुरू हो गई थीं। इसी ने 1979 की इस्लामी क्रांति की नींव रखी, जिसकी सफलता से पश्चिमी प्रभाव वाले समाज को बढ़ावा देने वाले रजा पहलवी को निर्वासित होना पड़ा। तब से यहां की हुकूमत अमेरिका को चुभती रही है, मगर तमाम कोशिशों के बावजूद वह सफल नहीं हो सका।
इस बार की स्थिति उसे अपने अनुकूल जान पड़ी। इसकी बड़ी वजह खामेनेई की वृद्धावस्था और ईरान में हुकूमत व अवाम के बीच बढ़ती दूरी थी। राष्ट्रपति ट्रंप आश्वस्त थे कि अभी बदलाव का सबसे अच्छा वक्त है, इसलिए उन्होंने यहां एक ऐसी हुकूमत की कल्पना की, जो अमेरिका का पक्षधर हो। उनको लगता है कि इसमें ईरानी जनता उनकी मदद करेगी, इसलिए उन्होंने लोगों से सड़कों पर उतरने का आह्वान भी किया है, पर उनका यह विश्लेषण गलत साबित हो सकता है। इतना ही नहीं, पिछले साल जून में जब इजरायल ने ईरान पर हमला बोला था, तब यह दावा किया गया था कि तेहरान की परमाणु क्षमता नष्ट कर दी गई है, पर अब कहा जा रहा है कि ईरान ने परमाणु क्षमता 60 फीसदी तक फिर अर्जित कर ली है। यहां तक कि उसने बैलेस्टिक मिसाइल भी बना लिए हैं।
बहरहाल, यह दावा कितना सच है, इसका जवाब तो आने वाले दिनों में मिल सकेगा, लेकिन अपने हित में तथ्यों को मरोड़ना और सत्ता-परिवर्तन करना अमेरिका की प्रवृत्ति रही है। वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी इसका हालिया उदाहरण है। इराक में भी उसने उन सद्दाम हुसैन को सैन्य-कार्रवाई के बाद हटाया, जिनका इस्तेमाल व्हाइट हाउस ने कभी ईरान के खिलाफ किया था। लीबिया में भी मुअम्मर गद्दाफी के शासन के खिलाफ इसी तरह की कार्रवाई हो चुकी है। सीरिया में तो असद सरकार को ईरान का समर्थन हासिल था, पर उसका पतन भी 2024 में हो चुका है।
जाहिर है, अमेरिका की यह मंशा रही है कि जिन राष्ट्रों की उसके लिए रणनीतिक व आर्थिक अहमियत है, वहां की सरकार पश्चिम के खिलाफ न हो; वाशिंगटन की हिमायती हो, तो और भी बेहतर। लिहाजा, ईरान युद्ध तब तक चलता रहेगा, जब तक उसकी यह रणनीति सफल न हो जाए। हालांकि, तेहरान भी दमखम दिखाता रहेगा। यदि वह पीछे हटता भी है, तो संभावित सरकार का प्रारूप अभी साफ नहीं है।
यह जंग विश्व व्यवस्था के भी प्रतिकूल है। इससे ऊर्जा सुरक्षा पर खतरा सबसे अधिक है। अगर तेल जहाजों को होर्मुज जलडमरूमध्य का रास्ता बदलकर अफ्रीका से आना पड़ेगा, तो उनकी लागत बढ़ सकती है। यहां से खाड़ी देशों के तेल चीन, भारत, जापान, दक्षिण कोरिया आदि मुल्कों में जाते हैं। अमेरिका ने बेशक वेनेजुएला से तेल-आपूर्ति की बात भारत से कही है, पर हम अपनी जरूरत का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा निर्यात करते हैं, यानी करीब 13 लाख बैरल तेल प्रतिदिन। इतनी बड़ी मात्रा में वेनेजुएला से आपूर्ति मुश्किल है। लिहाजा, हमारे लिए अपने संसाधनों और अक्षय ऊर्जा के विस्तार की जरूरत बढ़ गई है।
विश्व व्यवस्था की परीक्षा मध्य-पूर्व की अस्थिरता भी ले सकती है। ईरान ने अमेरिकी-इजरायली हमले के खिलाफ यहां के उन देशों पर मिसाइलें दागी हैं, जहां अमेरिका के सैन्य ठिकाने हैं। इससे इस युद्ध का दायरा बढ़ गया है, जिससे यहां का निवेश प्रभावित हो सकता है। भारत भी यहां निवेश करता रहा है।
नई दिल्ली के लिए परेशानी की बात यह है कि यदि यह युद्ध लंबा खिंचा, तो गैस की दिक्कत हो सकती है, जो खाड़ी से यहां आती है। फिर, तकरीबन एक करोड़ प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा भी बड़ा मुद्दा है, जो खाड़ी के देशों में बसे हुए हैं। ईरान में तो कई छात्र फंस गए हैं।
यह युद्ध दक्षिण एशिया की भू-राजनीति को गहरे प्रभावित कर सकता है। पाकिस्तान भले अफगानिस्तान से अभी उलझा हुआ है, लेकिन ईरान में इस्लामाबाद अपनी भूमिका निभाने की जुगत में है। अगर अमेरिकी शह पर ऐसा होता है, तो भारत के लिए चुनौती बढ़ सकती है। ईरान युद्ध उन सभी इलाकों की महत्वाकाक्षाएं बढ़ा सकता है, जो अपनी हुकूमत से नाराज हैं। बलूचिस्तान भी इनमें एक है। वह पाकिस्तानी हुकूमत के खिलाफ अमेरिका की मदद मांग सकता है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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