जब एक वाद्य यंत्र से दिल लग गया
संगत से ही संसार बनता-संवरता है। यदि बच्चे को शुरू से सही संगत मिल जाए, तो वह सही राह पकड़ लेता है। बच्चों को सही परिवेश देने के लिए ही कर्नाटक के गांव सजीपामुड़ा से एक बहुत सामान्य परिवार मैसूर दर्शन के लिए आया था…

संगत से ही संसार बनता-संवरता है। यदि बच्चे को शुरू से सही संगत मिल जाए, तो वह सही राह पकड़ लेता है। बच्चों को सही परिवेश देने के लिए ही कर्नाटक के गांव सजीपामुड़ा से एक बहुत सामान्य परिवार मैसूर दर्शन के लिए आया था। वही मैसूर, जिसे महलों का शहर भी कहा जाता है। वहां सबसे चर्चित महल में राज परिवार के लोग रहते थे। देश तो आजाद होकर लोकतांत्रिक हो गया था, पर राजसी शान कहीं-कहीं बची हुई थी। भारतीय और यूरोपीय शैली का वह विशाल महल उस शाम कुछ ज्यादा चमक रहा था। देखने वालों का हुजूम उमड़ रहा था। हवा में रजनीगंधा व मोगरे की खुशबू हावी थी। संयोग से शनिवार था, तो राजसी बैंड का खास संगीत प्रदर्शन भी शुरू हो गया था। संगीत की गूंज होते ही कड़-कड़ झंकृत हो उठा। महल की दीवारें जाग उठीं और बगीचे के फूल कुछ ज्यादा ही मुस्कराने लगे।
पलक झपकते ही देखने वालों का हुजूम सुनने वालों में बदल गया। सब ठिठक से गए, ठिठकने वालों में एक 15 वर्षीय कन्नड़ किशोर भी था। उसके लिए संगीत अपने घर व मंदिर तक सीमित था, पर उसने संगीत का जो राजसी ठाठ देखा, स्तब्ध रह गया। उसने स्वयं को कुछ ऊंचा करके दूर निहारा, राजा की बैंड संगीत में मगन थी। एक से बढ़कर एक वाद्य यंत्र सज रहे थे, पर किशोर की निगाह एक सुंदर वाद्य यंत्र पर जा टिकी। उस वाद्य को करीब से सुनने-देखने के लिए वह धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा।
वह उस वाद्य के जितने करीब पहुंच सकता था, पहुंच गया। फूंक से बजाया जाने वाला वह वाद्य चमक रहा था। लग रहा था कि कहीं विदेश से आया है। वह तीन जगह सुंदर ढंग से मुड़ा हुआ था, बिल्कुल संगीत लहरी की तरह। किशोर ने ऐसा यंत्र कभी देखा न था। वह बचपन से नादस्वरम को देखता और बजाता आया था। नादस्वरम एक सीधा-सा फूंक से बजाया जाने वाला पारंपरिक कर्नाटकी वाद्य यंत्र है, जिससे विवाह, उत्सव और पूजन में मांगलिकता बढ़ जाती है। पिता कभी घर, तो कभी मंदिर में नादस्वरम बजाते थे। नादस्वरम से ऐसी आवाज निकलती थी, मानो कोई महिला गा रही हो, लेकिन यहां जो सामने वाद्य बज रहा था, उससे मर्दाना आवाज आ रही थी। ऐसी आवाज, जो ज्यादा व्यापक और गहरी थी। ऐसी आवाज, जो किसी भी जगह को खाली नहीं छोड़ रही थी। जो अंग-प्रत्यंग में थिरक रही थी। गाढ़ी मधुरता लिए बह रही थी। आखिर यह कौन-सा वाद्य है?
जब बैंड वालों ने वादन का समापन किया, तब वह किशोर किसी तरह से उस वाद्य यंत्र के करीब जा पहुंचा। उसने वादक से बहुत विनम्रता से पूछा, तो जवाब मिला, यह वाद्य यंत्र सैक्सोफोन है। यह फूंककर बजाए जाने वाले तमाम वाद्यों में चरम रूप है, इसलिए यह जहां बजता है, वहां पूरी तरह छा जाता है।
किशोर ने उस वाद्य यंत्र को अपने दिल में बिठा लिया और अपने पिता से कहा, पिताजी, मैं इसी वाद्य यंत्र में महारत हासिल करूंगा। वाकई, गांव लौटे, तो पिता भी बहुत परेशान हुए कि बेटा विदेशी वाद्य बजाना चाहता है। उन्होंने पुत्र को समझाया, पर बात नहीं बनी, तो वह एक सैक्सोफोन खरीदने के इंतजाम में लग गए। यह विदेशी वाद्य यंत्र बहुत महंगा था और पिता गरीब थे। फिर भी पिता ने किसी तरह पैसे जुटाए और पुलिस बैंड के एक सदस्य से एक पुराना सैक्सोफोन कुल 800 रुपये में खरीद लाए। यह उन दिनों में बड़ी रकम थी, पर पिता क्या करते, बेटे का मन रखना था। मेहनती बेटे ने खुद आगे बढ़कर अच्छे गुरु खोजे, उनसे सैक्सोफोन बजाना वर्षों तक सीखा, लेकिन मन में तो कर्नाटकी संगीत बसा था। उसकी कोशिश थी कि विदेशी सैक्सोफोन में भी कर्नाटकी नादस्वरम का तीखापन और खनकता रहे। उसने सैक्सोफोन को शास्त्रीय भारतीय संगीत के अनुकूल बनाने के लिए वाद्य यंत्र में कुछ बदलाव किए और कमाल हो गया।
फिर निर्णायक मौका आया, जब साल 1980 में बॉम्बे जैज महोत्सव हुआ। वहां दुनिया के दिग्गज संगीतकार आए। कैलिफोर्निया से जैज संगीतकार जॉन हैंडी ने जब एक भारतीय युवा को सैक्सोफोन बजाते सुना, तब वह खुद को रोक न पाए। उन्होंने आगे बढ़कर परिचय पूछा और जवाब मिला, मुझे लोग कद्री गोपालनाथ कहते हैं। हैंडी ने तारीफ करते हुए तत्काल प्रस्ताव दिया कि क्या आप मेरे साथ जुगलबंदी करेंगे? गोपालनाथ ने प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार किया और उनकी दुनिया हमेशा के लिए बदल गई। उन्हें पूरी दुनिया ने बहुत चाव से सुना। पश्चिम के सैक्सोफोन को भारतीय बनाकर उन्होंने सबको सुना दिया।
कद्री गोपालनाथ (1949-2019) दुनिया में एक सर्वश्रेष्ठ सैक्सोफोन वादक के रूप में पहचाने गए। वह सैक्सोफोन चक्रवर्ती कहलाए। अपने आखिरी दिनों में वह बैठ नहीं पाते थे और भारी मन से कहते थे, अभी वादन से मन नहीं भरा है।
प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय
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