
इंकलाब जिंदाबाद लगा दिया नारा
अहमदाबाद में साल 1921 का कांग्रेस अधिवेशन बहुत खास था। तब पहली बार खादी के तंबू तने थे। नेताओं के कंधे पर खादी के बैग सजे थे। ऐसा मालूम पड़ता था, मानो गुलाम मुल्क को पहली बार जिस्म ढकने के लिए कपड़े नसीब हुए हों…
अहमदाबाद में साल 1921 का कांग्रेस अधिवेशन बहुत खास था। तब पहली बार खादी के तंबू तने थे। नेताओं के कंधे पर खादी के बैग सजे थे। ऐसा मालूम पड़ता था, मानो गुलाम मुल्क को पहली बार जिस्म ढकने के लिए कपड़े नसीब हुए हों। दिसंबर की गुनगुनी ठंड में खादी के सौंधी महक घुली हुई थी। यह खुशी मुसलसल उमड़ रही थी कि कुछ नया होने वाला है।
एक शायर साहब भी अधिवेशन में शरीक थे। उनकी बारी आई, तो उन्होंने कहा, ‘अब छोड़ दीजिए उम्मीद कि अमन-चैन से आपको आजादी मिलेगी, अब तो हथियार उठाने पड़ेंगे। अहिंसा के रास्ते पर चलकर आजादी जल्द नहीं मिलेगी। हम कब तक फिरंगियों के जूतों तले जुल्म सहेंगे?’ बाकी नेताओं ने उनकी ओर गौर किया, अरे यह तो हसरत मोहानी साहब हैं। अक्सर अपने भाषणों में गुलाम मुल्क की ऐसी तस्वीर खींचते हैं कि दिल भर आता है, अश्क बहने लगते हैं, लेकिन आज उनके तेवर-कलेवर काफी बदले हुए हैं। उन्होंने लगे हाथ यह भी प्रस्ताव रख दिया, ‘अब हमें अपने मुल्क के लिए पूर्ण स्वराज की मांग करनी चाहिए। हमें आधी नहीं, पूरी आजादी चाहिए।’
यह कांग्रेसियों के लिए नई बात थी। हलचल मच गई। पूर्ण स्वराज की मांग हो रही है। अनेक नेताओं ने यही सोचा कि हसरत साहब बौरा गए हैं, लेकिन कांग्रेस के ही एक अन्य सदस्य स्वामी कुमारानंद ने भी पूर्ण स्वराज के पक्ष में ध्वज फहरा दिया। अब यह कांग्रेस के लिए निर्णायक मोड़ बन गया। कांग्रेस पूरी तरह से कानून-व्यवस्था के तहत वैध तरीकों से काम करती थी। उसकी मांग यही होती थी कि भारतीयों के साथ नाइंसाफी न हो। ब्रिटिश साम्राज्य के तहत भारतीयों को ज्यादा हक हासिल हो जाएं, पर यहां तो पहली बार किसी ने पूर्ण स्वराज की मांग रख दी।
जैसा होना था, गांधीजी के नेतृत्व में शायर साहब के प्रस्ताव को एहसासे-कमतरी की कुछ दलीलों के सहारे किनारे कर दिया गया, लेकिन शायर साहब ने अपने भाषण का समापन करते हुए जो नारा लगाया- इंकलाब जिंदाबाद, वह सबके जेहन में बैठ गया। इस नारे ने पूर्ण स्वराज की मांग के बीज बो दिए।
हसरत यहीं नहीं थमे, जब वह मुस्लिम लीग के सम्मेलन में गए, तो वहां भी उन्होंने मांग रख दी कि भारत को 1 जनवरी, 1922 से स्वतंत्र घोषित किया जाना चाहिए और इसका नाम संयुक्त राज्य भारत रखा जाना चाहिए। आजादी के लिए जरूरत पड़ जाए, तो गुरिल्ला युद्ध शुरू किया जाना चाहिए। बहरहाल, मुस्लिम लीग ने भी हसरत की मांग को हाशिये पर कर दिया और कुछ ही दिनों बाद हसरत फिर जेल में डाल दिए गए।
वैसे, हसरत मोहानी का जेल से नाता पुराना था। कैद-ए-बा-मशक्कत में हर दिन चक्की पीसते थे। आजादी के लिए बहुत सख्त थे। अंग्रेजों के खिलाफ उनकी आवाज कभी नरम नहीं हुई, पर वह असलियत में मोहब्बत से सराबोर मुकम्मल इंसान थे। मौका मिलते लिखने बैठ जाते थे। जेल में रहते हुए ही उन्होंने हरदिल अजीज गजल लिखी- चुपके-चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है / हमको अब तक आशिकी का वो जमाना याद है।
उनकी कलम में इश्क की स्याही भरी थी और उन्होंने लिखा- कुव्वत-ए-इश्क भी क्या शय है कि होकर मायूस/ जब कभी गिरने लगा हूं तो संभाला है मुझे। उन्हें कृष्ण बहुत प्रिय थे। एक बांसुरी पास रखते थे और बजाते थे। जब कैद में उनसे तमाम सामान जब्त किए जाते थे, तब वह गुहार लगाते, ‘यह बांसुरी मेरे पास रहने दीजिए, यह तो कृष्णजी की है।’ करीब हर जन्माष्टमी वह मथुरा जाते थे। कृष्ण के प्यार में उन्होंने लिखा है- बरसाना-ओ-नंद-गांव में भी/ देख आए हैं जल्वा हम किसी का। हसरत के 13 दीवान हैं, जिनमें से आधे से ज्यादा कैद में रहते तैयार हुए।
वह हिंदू-मुस्लिम एका और अखंड भारत के गजब हिमायती थे। जब मुस्लिम लीग ने यह ठान लिया कि मजहब के नाम पर मुल्क बंटेगा, तब वह लीग से अलग हो गए। आजादी के बाद भारत में ही रहे और आजाद भारत के संविधान लेखन में योगदान दिया। वह मथुरा से मक्का और मास्को तक अमन-चैन-खुशहाली के ख्वाब देखते थे। स्वदेशी के गजब पैरोकार हसरत ने कभी भी सांसद के रूप में किसी सरकारी सहूलियत का फायदा नहीं लिया। अपने पैसे से किराया चुकाकर संसद पहुंचते थे।
हसरत मोहानी (1875-1951) अपने समय से बहुत आगे की सोचने वाले नेता थे। तारीख गवाह है, पूर्ण स्वराज के उनके प्रस्ताव को कांग्रेस ने नौ साल बाद माना। शहीद भगत सिंह से लेकर आज तक दुनिया में कहीं भी इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगता है, तो हसरत मोहानी याद आते हैं। वह खुद ही लिखे गए हैं, आती तो याद उनकी महीनों तक नहीं आती/ मगर जब याद आते हैं तो अक्सर याद आते हैं ।
प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय

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