
अमरोहा में ही रह गया दिल
तब एक नदी बान उत्तर प्रदेश के अमरोहा में क्या खूब बहती थी! उस नदी के करीब बैठे-अधलेटे या उसमें पैर गीले किए बीते थे उसके कई दिन। वह ख्वाबों-खयालों में डूबा रहता था और उसके अब्बा भी। उनके लिए शायरी, तारीख, मजहब-ए-आदम…
तब एक नदी बान उत्तर प्रदेश के अमरोहा में क्या खूब बहती थी! उस नदी के करीब बैठे-अधलेटे या उसमें पैर गीले किए बीते थे उसके कई दिन। वह ख्वाबों-खयालों में डूबा रहता था और उसके अब्बा भी। उनके लिए शायरी, तारीख, मजहब-ए-आदम, इल्म-ए-हयात और फलसफों का सिलसिला थी जिंदगी। अब्बा लिखते भी रहते थे। अरबी, फारसी, अंग्रेजी, यूनानी और संस्कृत के विद्वान अब्बा ने अपने इस छोटे बेटे में न जाने क्या देखा कि कहा, ‘तुम मुझसे एक वादा करो।’ बेटे ने हामी भरी, तब अब्बा ने कहा, ‘वादा करो कि तुम जब बड़े हो जाओगे, तब मेरी किताबें जरूर छपवाओगे।’ अब्बा की आंखों में गहरी उदासी थी। अब्बा ने तालीम को पूरा वक्त दिया था, पर शायद दुनियादारी की जंग में शिकस्त मान बैठे थे। तब बेटे ने कहा, ‘हां, मैं वादा करता हूं। जब बड़ा हो जाऊंगा, तो आपकी किताबें जरूर छपवाऊंगा।’
अब्बा ने एक यकीन के साथ अपनी विरासत अपने छोटे बेटे को थमा दी, लेकिन विरासत में बहुत कुछ हासिल होता है और बेटे को वह सब हासिल हुआ। पिता की बेचैनी, उदासी बेटे में उतर आई। वक्त भी ऐसा बीता कि मुसलसल दिल टूटता चला गया, जिस पर बस शायरी ही पैबंद लगाने लगी। मसला यह कि पूरा खानदान ही शायरी करता था। काश! अमन-चैन से पढ़ते-लिखते अमरोहा में ही बीत जाती जिंदगी, लेकिन दिन ऐसे आए कि मुल्क तक्सीम हो गया। तीन बड़े भाई पाकिस्तान के लिए निकल पड़े। अब्बा जाने को राजी न हुए, अम्मी भी रह गईं, छोटी बहन भी और यह चार भाइयों में सबसे छोटा भाई भी यहीं रह गया। आजादी का जश्न मनाया गया था, मगर उसे लाखों चिरागों की रोशनी में अंधेरा ही दिखाई दे रहा था। खून में लिथड़ी ऐसी आजादी का तो कोई तसव्वुर भी न था। बड़े भाई चले गए, तब इस छोटे भाई ने यह शेर कहकर अपने दिल को समझाया कि उस गली ने ये सुन के सब्र किया/ जाने वाले यहां के थे ही नहीं।
तक्सीम के साथ सारी खुशियां जाती रहीं। ऐसे गमगीन वक्त में छोटे बेटे को मुशायरों में बुलाने का सिलसिला शुरू हो गया था, जहां उन्हें जौन एलिया नाम से पुकारा जाता था और वह बेबाकी से अपनी बेचैनी और सवाल पेश करते थे- कहां का दीन, कैसा दीन, क्या दीन/ ये क्या गड़बड़ मचाई जा रही है।
वह पूछते थे कि ये कौन लोग हैं, जो एक-दूसरे को कत्ल कर डालते हैं और ये कत्ल करने वाले हमेशा मजहब के ही क्यों होते हैं? और तब यह शेर सुनाते थे- अब नहीं कोई बात खतरे की/ अब सभी को सभी से खतरा है। उनकी परेशानियों में इजाफा होता चला गया। तपेदिक ने भी घेरा, तो वह उसे भी शायरी में ले आए- मैं हुनर-मंद-ए-रंग हूं / मैंने खून थूका है दाद पाई है।
कुछ साल बीते, छोटी बहन का निकाह हो गया, तो अम्मी दुनिया से रुखसत हुईं और अब्बा भी। अमरोहा में अकेले रह गए जौन एलिया। कराची से बड़े भाई बार-बार बुलाते रहे। आखिर भाइयों की बड़ी कोशिश के बाद जौन एलिया भी रोते-बिलखते छोड़ चले अमरोहा। कराची में एक-एक दिन भारी बीता। वहां समंदर के पास खड़े उन्होंने अमरोहा की बान नदी को बार-बार याद किया- अमरोहा में बान नदी के पास जो लड़का रहता था, / अब वो कहां है? मैं तो वही हूं, गंगा जी और यमुना जी।
वह 21 साल बाद अमरोहा मुशायरे के लिए आए थे। मंच पर जब उन्हें पाकिस्तान के मशहूर शायर कहकर पुकारा गया, तब वह माइक संभालते ही फफक पड़े कि मैं पाकिस्तानी नहीं, हिन्दुस्तानी हूं और शेर अर्ज किया- क्या पूछते हो नाम-ओ-निशान-ए-मुसाफिरों/ हिंदोस्तां में आए हैं हिंदोस्तां के थे।
तक्सीम ने क्या नुकसान किया, उसकी एक बड़ी मिसाल जौन एलिया हैं- मैं भी बहुत अजीब हूं, इतना अजीब हूं कि बस/ खुद को तबाह कर लिया और मलाल भी नहीं।
शायरी की दुनिया में उन्हें सब जानने लगे थे, उनकी उम्र 60 होने वाली थी, लेकिन उनकी एक भी किताब शाया नहीं हुई थी। वह बताते थे कि मैं अपने अब्बा से किया हुआ वादा पूरा न कर सका। मैं बड़ा न हो सका। यही मेरा वह एहसासे-जुर्म है, जिसके सबब में अपने कलाम की पेशकश से गुरेज करता हूं। खैर, एक दिन आया, जब दोस्तों की कोशिश रंग लाई, 14 दिसंबर को जन्म लेने वाले जौन एलिया (1931-2002) का पहला दीवान शायद शाया हुआ, लेकिन अफसोस भी रह गया- एक ही हादसा तो है और वो ये कि आज तक/ बात नहीं कही गई, बात नहीं सुनी गई।
वह एक ऐसे शायर थे कि जब मंच पर होते थे, तब दूसरा कोई न दिखता था। बाकी शायर डूबकर सुनाते थे और वह टूटकर। दुबला-सा बीमार जिस्म, लंबे बेतरतीब खुले बाल के बावजूद उन्हें अपने खास होने का भी अंदाजा था, वह अक्सर कहते थे - मैं जो हूं जौन एलिया हूं जनाब, मेरा नाम जरा अदब से लीजिएगा।
प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय

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