ईरान की वह आवाज खामोश न हो पाई
दादा सुरीली आवाज के मालिक थे, तो पिता भी सुर के अमीर हुए और पोते को भी मौसीकी विरासत में बेहिसाब मिली। दुनिया में हुनर का यह सिलसिला कुदरती है, पर इंसान कुदरत की कितनी सुनता है? इंसान अपना दिमाग लगाता है…

दादा सुरीली आवाज के मालिक थे, तो पिता भी सुर के अमीर हुए और पोते को भी मौसीकी विरासत में बेहिसाब मिली। दुनिया में हुनर का यह सिलसिला कुदरती है, पर इंसान कुदरत की कितनी सुनता है? इंसान अपना दिमाग लगाता है और फैसला सुनाने लगता है कि क्या कुदरती है और क्या नहीं? तो यहां पिता भी खुद के इस फैसले पर मुत्मइन थे कि मौसीकी कुरान के पाठ तक हलाल और उसके आगे हराम है। उन्होंने बेटे को कुरान का पाठ प्रेम से सिखाया, पर किसी और तराने से महरूम कर दिया।
बेटे की आवाज रूहानी थी। वह जब कुरान पढ़ता, तो सुनने वाले सजदे में उतर जाते थे। वह मौसीकी में कुछ आगे बढ़ना चाहता था, कुछ ज्यादा सुनना-गाना चाहता था। प्रॉपर्टी एजेंट पिता ने पहरे बिठा रखे थे कि खबरदार, घर में कोई मौसीकी का गलत मजा नहीं लेगा। घर में रेडियो हराम था, क्योंकि उस पर अक्सर फारसी नग्मे बजने लगते थे। बहरहाल, बेटे की आवाज पहचान बनाती गई। उसे बारह की उम्र में ही रेडियो खोरासान पर कुरान पाठ का मौका मिल गया। सामने एक नई खुशनुमा दुनिया खुली, जो तमाम तरह के साज-साजिंदों से गुलजार थी। एक से बढ़कर एक बजाने, गाने और सिखाने वाले तैयार बैठे थे। हर उस्ताद चाहता है- काबिल शागिर्द मिल जाए, पर यहां तो एक काबिल फनकार मजहबी मौसीकी तक महदूद था।
खैर, वह दिन आया, जब बेटे से रहा न गया। उसने पिता के रूबरू फरमाया, ‘बाबा जान, मैं आगे और गाना-बजाना चाहता हूं।’ बाबा जान कहां पिघलने वाले थे, उन्होंने और सख्ती से धमकाया, ‘अपने इस नापाक इरादे से तौबा करो। खबरदार ,अगर तुम्हारा नाम मैंने कहीं सुन लिया, तो तुम्हारी खैर नहीं।’
बेटे को गम ने घेरा, पर उसका इरादा नहीं बदला। उसने बगावत की ठान ली और इस फिक्र में डूब गया कि मंजिल तक कैसे पहुंचा जाए? उसने तय किया, पिता अपने काम में मशगूल रहते हैं, तब उनसे छिपकर गाया जाए। क्यों न नाम बदल लिया जाए? बदले हुए नाम के साथ ही कुछ नया सीखा-गाया जाए। उसने अपना नाम रखा- सियावश बिदाकनी। बहुत जल्दी ही यह नाम ऐसे मशहूर हुआ कि लोगों ने खुद आगे बढ़कर असली नाम - मोहम्मद रजा शाजेरियन- का पता लगा लिया।
पिता को भी पता चला, पर गनीमत है, पुत्र ने आगे पढ़ने के लिए गांव से दूर रहने का फैसला ले लिया। रजा जान गए कि मनमानी के लिए अपने पैरों पर खड़ा होना जरूरी है। काम भर की डिग्री हासिल करने के बाद वह 20 की उम्र में स्कूली शिक्षक बन गए। उन्हें अपना आजाद आसमान मिला, जहां मौसीकी को नई उड़ान मिली। फारसी या ईरानी शास्त्रीय संगीत रादिफ के वह उस्ताद हुए। वह जितना मीठा गाते, उससे भी मधुर संतूर बजाते। रेडियो स्टेशन में नौकरी मिल गई और मौसीकी बढ़ चली।
एक पिता से पीछा छूटा, पर मुल्क में उन जैसे इफरात में थे। मजहबी क्रांति हो गई। अयातुल्लाह के फरमान से मौसीकी पर पाबंदी लग गई। साज गैर-कानूनी हो गए। कई गायक मुल्क बदर हुए, कुछ कैद हुए, तो कुछ कत्ल। खुशकिस्मती थी कि मोहम्मद रजा शाजेरियन को बख्श दिया गया। दरअसल, वह घर-घर में सुने जाते थे। लोग उन्हें ईरान की आवाज कहते थे। कुछ पाबंदियां रजा पर भी आयद हुईं, पर वह खामोश न हुए। उन्होंने एक गीत बनाया, मोरघे सहर मतलब सुबह की चिड़िया। यह तराना कानों-कान मशहूर हुआ- सुबह की चिड़िया, अपना मातम शुरू करो/ मेरे दर्द को फिर जगा दो/ अपनी चमकीली आहों से इस पिंजरे को तोड़ दो और इसे उलट दो/ पंखों से बंधी बुलबुल, पिंजरे के कोने से बाहर निकलो/और इंसानी आजादी के तराने गाओ।
यह तराना आजादी का अघोषित राष्ट्रगान बन गया। पूरे रमजान हर सुबह रजा की आवाज रेडियो पर गूंजती- हे ईश्वर, हमारे हृदय को कोमल कर और हमारे पापों को क्षमा कर...। उन्हें दुनिया भर में बुलाया गया। उन्होंने अपने मंचों पर महिलाओं को भी मौका दिया। वह मुल्क का गम खुलेआम गाते थे और बताते थे कि एक वक्त का खूबसूरत मुल्क कैसे खंडहर में बदल गया।
एक मुकाम वह भी आया, जब ईरान के एक राष्ट्रपति ने अपने मुल्क के प्रदर्शनकारियों को धूल और राख बता दिया, तब रजा ही जवाब देने के लिए आगे आए और गीत गाया- मेरी आवाज हमेशा धूल और राख की आवाज रही है और हमेशा रहेगी।
मोहम्मद रजा (1940-2020) अपने मुल्क और पारसी तहजीब से बेहिसाब मोहब्बत करते थे। वह बुजुर्ग और बीमार हो गए थे, तब भी उन्होंने जबान-ए-आतश नाम से एक खास तराना बनाया और देश-दुनिया को हमेशा के लिए नसीहत दे गए- अपनी बंदूक नीचे रख दो, आओ, बैठो, बात करो, सुनो। शायद इंसानियत की रोशनी तुम्हारे दिल तक पहुंच जाए।
प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय
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