जिसने हजारों जिंदगियों को झुलसने से बचा लिया
यह इंसानी फितरत है कि वह बनना तो राम चाहता है, मगर रावण भी उसे कुछ कम आकर्षित नहीं करता। आदर्श और आकर्षण के इसी द्वंद्व के बीच जीवन चलता है। ज्यादातर लोग इस द्वंद्व से पार नहीं पा पाते और जो इसे जीत लेते हैं…

यह इंसानी फितरत है कि वह बनना तो राम चाहता है, मगर रावण भी उसे कुछ कम आकर्षित नहीं करता। आदर्श और आकर्षण के इसी द्वंद्व के बीच जीवन चलता है। ज्यादातर लोग इस द्वंद्व से पार नहीं पा पाते और जो इसे जीत लेते हैं, वे अपने होने की सार्थकता सिद्ध कर जाते हैं। अशोक शंकर राठौड़ ने छोटी सी उम्र में अपने समाज, देश और इंसानियत के लिए जो कुछ किया है, उसे देखते हुए किसी को भी उनकी जिंदगी से रश्क हो जाएगा।
आज से करीब 38 साल पहले मुंबई की सबसे बड़ी झुग्गी बस्ती धारावी के आंबेडकर नगर इलाके में अशोक पैदा हुए। पिता शंकर राठौड़ मछुआरे थे, कोलाबा स्थित ससून डॉक (बंदरगाह) पर काम करते थे, मां गृहिणी थीं। शंकर राठौड़ को इस बात का बड़ा मलाल था कि उनके बड़े बेटे और बेटी ने पढ़ाई नहीं की। वह अशोक को किसी भी कीमत पर पढ़ाना चाहते थे। हालांकि, पढ़ाई छोड़ चुके हमउम्र दोस्तों की मस्ती देख अशोक का भी मन मचलता कि काश! वह भी उनकी तरह बिंदास जी पाते।
अशोक जिस आंबेडकर नगर इलाके में पले-बढ़े, वहां की बच्चियां स्कूल नहीं जाती थीं। लड़के भी नगर-निगम के प्राइमरी स्कूल के आगे न बढ़ पाते, क्योंकि माध्यमिक कक्षाओं से अंग्रेजी पढ़नी पड़ती थी, जो उन्हें कठिन लगती और फिर परिवारों को भी उनकी कमाई की दरकार होती। अशोक यह देखते हुए बड़े हो रहे थे कि 12-13 साल के बच्चे 200 रुपये की दिहाड़ी पर ससून डॉक पर मछलियों की पेटियां लादने-उतारने का काम करते हैं या फिर किसी टोकरे से मोटी मछली चुराने की फिराक में रहते हैं , ताकि उसे बेचकर पैसे कमा सकें। जाहिर है, इन पैसों से वे नशीली चीजें खरीदते थे और जाने-अनजाने अपराध की दुनिया का हिस्सा बनते जा रहे थे।
उम्र के इस नाजुक मोड़ पर किशोर अशोक को अपने माता-पिता और भाई-बहन से भरपूर स्नेह व मार्गदर्शन मिला। उनकी पढ़ाई का सिलसिला जारी रहा। हाईस्कूल में खेल-कूद में वह खूब भाग लेते। मुहल्ले-कस्बे के लोग उन्हें काफी इज्जत की नजर से देखने लगे थे। अशोक करीब 18 साल के थे, जब पहली बार उन्हें एहसास हुआ कि चीजों को देखने का उनका नजरिया समुदाय के हमउम्र लोगों से अलग है। समझते देर न लगी, खेल-कूद और शिक्षा ने उन्हें यह सलाहियत बख्शी थी। अशोक को लगा कि क्यों न वह अपना अनुभव समुदाय के उन बच्चों-किशोरों के साथ साझा करें, जिन्होंने पढ़ाई छोड़ दी है, ताकि वे इसकी अहमियत समझ सकें।
इसके लिए उन्होंने फुटबॉल को आधार बनाया। पढ़ाई छोड़ चुके 18 उत्साही किशोरों को एक शनिवार अशोक ने ओवल मैदान में इकट्ठा किया, ताकि वह उन्हें खेल के जरिये पढ़ाई-लिखाई का महत्व बता सकें, मगर जाति, धर्म और भाषा की संकीर्णताओं के कारण ये बच्चे एक-दूसरे के साथ फुटबॉल खेलने को राजी न थे। इस बात से अशोक को झटका लगा, मगर उन्होंने प्रयास नहीं छोड़ा। कुछ बच्चों के साथ उन्होंने फुटबॉल खेलना शुरू कर दिया। आहिस्ता-आहिस्ता कई और बालक आए। करीब एक साल के बाद अशोक ने गौर किया कि उन सभी में काफी बदलाव आ चुके हैं। वे सब साफ-सुथरे, समय के पाबंद और अनुशासित हो गए थे। उनके चेहरों पर खुशी के भाव कोई भी आसानी से पढ़ सकता था।
फुटबॉल ने इन किशोरों में सराहे जाने की ललक पैदा कर दी थी। अशोक पहले से उनके भीतर की जिज्ञासा को हवा दे रहे थे। एक दिन उन्होंने नियम बनाया कि जो भी किशोर उनके साथ फुटबॉल खेलना चाहता है, उसे स्कूल भी जाना होगा। सारे लड़के इसके लिए तैयार ही नहीं हुए, वे बाकायदा स्कूलों और किताबों की दुनिया में लौट भी आए। फिर वे अपने अन्य दोस्तों को लेकर आए, आगे उनके परिचित किशोर जुटते गए, इस तरह संख्या बढ़ती ही गई।
जाहिर है, अशोक ज्यादा से ज्यादा बच्चों की जिंदगी को अर्थवान बनाना चाहते थे, मगर उनके पास संसाधन ही नहीं था। कहते हैं, ईमानदार कोशिशों को इमदाद की कभी कमी नहीं पड़ती। साल 2008 में मीडिया हाउस सीएनएन आईबीएन ने ‘रीयल हीरो अवॉर्ड’ से नवाजते हुए उन्हें पुरस्कार-राशि के रूप में लगभग 3.5 लाख रुपये दिए। यह बड़ी मदद साबित हुई। इन पैसों से उन्होंने फुटबॉल, बच्चों के लिए पोशाकें लीं और आंबेडकर नगर में ही किराये पर एक कम्युनिटी हॉल लिया, जो 24 घंटे खुला रहता।
साल 2010 तक 300 बच्चे हो गए थे। पुरस्कार में मिले पैसे खत्म होने को थे। मदद मांगने पर लोग पूछते, आपकी संस्था पंजीकृत है? वे बैंक खाता नंबर मांगते थे। ताज होटल समूह के प्रबंधन ने अशोक के प्रयासों के बारे में सुना था। उसकी मदद से बैंक खाते खुले, तो मददगार भी मिले और अशोक का संगठन ‘ऑस्कर फाउंडेशन’ वजूद में आया। इसके बाद अशोक ने लड़कियों के लिए भी फुटबॉल की शुरुआत की। माता-पिता लड़कियों को फुटबॉल खेलने के लिए भेजने में आनाकानी करते। जब अशोक ने उन परिवारों के लड़के को फुटबॉल सिखाने की शर्त में लड़कियों के खेलने देने की अनुमति मांगी, तब बेटियों को आत्मविश्वास से भरी इस दुनिया में ‘किक मारने’ का मौका मिला।
अशोक की ‘नो स्कूल, नो फुटबॉल’ मुहिम ने अब तक 14,000 से अधिक बच्चों की जिंदगी को संवारा है। उनके फाउंडेशन से जुड़े बच्चे ब्राजील और जर्मनी जाने लगे हैं। इनमें से 90 फीसदी बच्चे दसवीं या बारहवीं तक की पढ़ाई पूरी कर चुके हैं या कर रहे हैं। जो बच्चे पास नहीं होते, उन्हें छोड़ा नहीं जाता। उनकी काउंसलिंग कराई जाती है। उनकी संस्था की दो बच्चियां अंडर-17 वर्ल्ड कप खेल चुकी हैं। कई बच्चे लीग खेल रहे हैं। आप ही सोचिए, हाशिये के बच्चों को केंद्र में स्थापित करने से सुंदर देशसेवा क्या होगी!
प्रस्तुति : चंद्रकांत सिंह
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