
लोक-लुभावन वायदे
बिहार विधानसभा चुनाव की अधिसूचना जारी होने के पहले से ही राज्य में सत्ता के दावेदार मुख्य गठबंधनों- राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) व महागठबंधन के बीच लोकप्रिय कार्यक्रमों व वायदों की होड़-सी लग गई थी…
बिहार विधानसभा चुनाव की अधिसूचना जारी होने के पहले से ही राज्य में सत्ता के दावेदार मुख्य गठबंधनों- राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) व महागठबंधन के बीच लोकप्रिय कार्यक्रमों व वायदों की होड़-सी लग गई थी। सत्तारूढ़ राजग सरकार ने चुनाव से ऐन पहले 26 सितंबर को ‘मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना’ की शुरुआत करके एक बड़ा दांव चल दिया था, जिसके तहत सूबे की लगभग सवा करोड़ महिलाओं के खाते में दस-दस हजार रुपये की पहली किस्त पहुंच गई थी, तो वहीं अब बिहार में महागठबंधन के सबसे बड़े चेहरे और राजद की तरफ से मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी तेजस्वी यादव ने एलान किया है कि उनकी सरकार सत्ता में आई, तो जीविका दीदियों की नौकरी पक्की की जाएगी और उन्हें 30,000 रुपये की मासिक तनख्वाह मिलेगी। साल 2006 में विश्व बैंक की मदद से बिहार ग्रामीण आजीविका मिशन का आरंभ हुआ था। इसका लक्ष्य ग्रामीण महिलाओं के छोटे-छोटे स्व-सहायता समूह बनाकर उनकी माली हैसियत को मजबूत बनाना था। यह कार्यक्रम किस कदर प्रभावी रहा, इसका अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि बिहार की लगभग एक करोड़, 40 लाख महिलाएं आज इस योजना से जुड़ी हैं। जाहिर है, वे अब एक बेहद मजबूत वोट-बैंक बन चुकी हैं। ऐसे में, इन कदमों के राजनीतिक निहितार्थ स्पष्ट हैं।
ऐसा नहीं है कि ये लोक-लुभावन योजनाएं व घोषणाएं पहली बार बिहार में लागू की गई हैं या प्रस्तावित की जा रही हैं। मध्य प्रदेश की लाड़ली बहन योजना, महाराष्ट्र की माझी लाडकी बहिण योजना, झारखंड की मुख्यमंत्री मंईयां सम्मान योजना पहले ही सत्तारूढ़ सरकारों के लिए फलदायी साबित हो चुकी हैं और अब बिहार में इसी तर्ज पर आधी आबादी को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए दोनों तरफ से दांव चले जा रहे हैं। नीतीश सरकार 125 यूनिट तक बिजली मुफ्त कर चुकी है, बेरोजगार स्नातकों को दो साल तक एक-एक हजार रुपये बेरोजगारी भत्ते को मंजूरी दी जा चुकी है। बुजुर्गों, दिव्यांगों की पेंशन बढ़ा दी गई है, तो दूसरी तरफ तेजस्वी राज्य के हर उस घर के एक युवा को सरकारी नौकरी देने का वायदा कर रहे हैं, जिसका कोई सदस्य पहले से किसी सरकारी सेवा में नहीं है। कुल मिलाकर, दोनों पक्ष हर रोज नई-नई घोषणाएं करता जा रहा है, जो किसी गहन मंथन से अधिक त्वरित लाभ से प्रेरित जान पड़ती हैं।
निस्संदेह, किसी भी लोक-कल्याणकारी राज्य में राजनीतिक दलों के लिए हाशिये के समूहों की चिंता न सिर्फ उसका पहला कर्तव्य है, बल्कि किसी भी सरकार का यह मूल उद्देश्य होना चाहिए। मगर बिहार में सत्ता के दावेदार गठबंधनों को क्या अपने मतदाताओं के सामने यह स्पष्टता से नहीं रखना चाहिए कि वे अगले पांच वर्ष में शिक्षा, स्वास्थ्य, औद्योगीकरण के क्षेत्र में ऐसा क्या-क्या करेंगे और इसके लिए संसाधन कहां से लाएंगे, जिससे यह प्रदेश पहली कतार में खड़ा हो सके? जाहिर है, ऐसा न करने के कारण ही जुमलेबाजी व धनबल पर उनका भरोसा अधिक है। गौर कीजिए, अभी दूसरे चरण का नामांकन खत्म ही हुआ है और चुनाव आयोग अब तक करीब 71 करोड़ रुपये बरामद कर चुका है। यूं तो हर चुनाव हरेक प्रदेश के लिए अहम होता है, मगर बिहार के मतदाताओं के लिए यह बेहद अहम घड़ी है, क्योंकि वे तरक्की के मेयार पर बहुत नीचे हैं। उन्हें लोक-लुभावन नीतियों की भीड़, राजनीतिक दलों के प्रलोभनों और परिवर्तनकारी सुचिंतित कार्यक्रमों के बीच चुनना है। इसलिए उनकी परीक्षा नेताओं से कहीं अधिक कठिन है!

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