
अरावली की चिंता
जलवायु परिवर्तन के दौर में प्राकृतिक संसाधनों की चिंता अगर प्राथमिकता होनी चाहिए, तो इस विषय को राजनीति से बचाना भी आज की बड़ी आवश्यकता है। पहाड़ों, जंगलों, नदियों और जल स्रोतों को सुरक्षित रखना हमारा कर्तव्य है…
जलवायु परिवर्तन के दौर में प्राकृतिक संसाधनों की चिंता अगर प्राथमिकता होनी चाहिए, तो इस विषय को राजनीति से बचाना भी आज की बड़ी आवश्यकता है। पहाड़ों, जंगलों, नदियों और जल स्रोतों को सुरक्षित रखना हमारा कर्तव्य है। जहां एक ओर, अरावली पर्वत शृंखला को लेकर सीकर से उदयपुर तक प्रदर्शन हुए हैं, तो वहीं दूसरी ओर, केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने उन दावों को खारिज किया है कि केंद्र ने अरावली पहाड़ियों के संरक्षण में ढील दे दी है। दरअसल, पिछले पखवाड़े से ही यह चिंता हावी है कि अरावली की सुरक्षा से समझौता किया जा रहा है। अब जब केंद्रीय मंत्री ने गलतफहमियों को दूर करने की कोशिश की है, तो भ्रम के बादल छंटने चाहिए। माना जाता है कि यह अपने देश की सबसे प्राचीन पर्वत शृंखला है और जब टेक्टोनिक प्लेटें आपस में टकराई थीं, तब इस शृंखला का जन्म हुआ था। यह एक तरह से थार रेगिस्तान को पूरे भारत में फैलने से रोकने का काम करती है। ऐसी जीवन रक्षक शृंखला की रक्षा प्राथमिकता होनी ही चाहिए और किसी भी प्रकार से इसे लेकर संशय या आशंकाओं का बाजार गर्म नहीं होना चाहिए।
कोई संदेह नहीं कि सरकारों की उपेक्षा की वजह से अरावली का काफी हिस्सा खनन का शिकार हुआ है। खनन को पूरी तरह से रोकना आज भी संभव नहीं हुआ है। आधिकारिक रूप से इसके लगभग दो प्रतिशत हिस्से में खनन जारी है, लेकिन अनधिकृत रूप से क्या-क्या हो रहा है, यह सरकारों के लिए हमेशा जांच का विषय है? यह पर्वत शृंखला चार राज्यों में फैली है, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात। इनमें से राजस्थान में सबसे ज्यादा खतरा है और उसके बाद हरियाणा का स्थान आता है। यह भी एक त्रासद पक्ष है कि अरावली के पक्ष में दायर एक याचिका पर 1985 से सुनवाई चल रही है। हालांकि, इस याचिका का ही नतीजा है कि अरावली का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा संरक्षित श्रेणी में आता है। वैसे, अब समय आ गया है कि अरावली को पूरी तरह से खनन-मुक्त रखने का फैसला किया जाए। जितना खनन हो चुका, बहुत है, अब आगे खनन से जो तात्कालिक आर्थिक लाभ होगा, उससे कई गुना ज्यादा कीमत हमें पर्यावरण के मोर्चे पर चुकानी पड़ेगी।
ध्यान रहे, अरावली से वन्यजीव लगभग खत्म होने को हैं। वहां मानव गतिविधियों का विस्तार हो रहा है। हमें उम्मीद करनी चाहिए कि अरावली को लेकर सरकारों की चिंता नई रंग लाएगी। खनन के विकल्प पर विचार करना होगा। खनन मुख्य रूप से पत्थर के लिए होता है और पत्थरों से सुंदर घर बनाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। इस परंपरा से परे सोचने की जरूरत है। घर या इमारत बनाने के दूसरे संसाधन हैं, जिनसे मकान तो बहुत बन जाएंगे, पर कटने वाले पहाड़ फिर कभी खड़े न होंगे। ध्यान देने की बात है, सोमवार को ही सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तराखंड में भी जंगलों में हो रहे अतिक्रमण के खिलाफ चिंता का इजहार किया है। संदेह नहीं कि अदालतों को पर्यावरण या प्रकृति के संरक्षण के प्रति कड़ा रुख अपनाना पड़ेगा। अब सभी सरकारों को प्रकृति प्रेम को अपनी प्राथमिकता में रखना होगा। साथ ही, जो समाज अरावली की रक्षा के लिए सामने आया है, उसे भी सतत सजगता से काम लेना होगा। प्रकृति सामूहिक जिम्मेदारी है। प्राकृतिक संसाधनों का हमारे पास कोई विकल्प नहीं है, अत: उनके संरक्षण से कोई भी समझौता मानव जीवन के लिए घातक है।

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