बदले की भावना
पश्चिम एशिया में बदले की भावना के चलते बर्बरता की तमाम हदें कई बार पार हुई हैं। अफसोस, ईरान में फिर यही भावना सिर चढ़कर बोल रही है। ईरान के एक कट्टरपंथी अखबार ने इन्फोग्राफिक प्रकाशित किया है….

पश्चिम एशिया में बदले की भावना के चलते बर्बरता की तमाम हदें कई बार पार हुई हैं। अफसोस, ईरान में फिर यही भावना सिर चढ़कर बोल रही है। ईरान के एक कट्टरपंथी अखबार ने इन्फोग्राफिक प्रकाशित किया है, जिसमें 13 विदेशी नेताओं के नाम हैं। अखबार ने दावा किया है कि ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या के बदले में इन नेताओं को निशाना बनाया जाएगा। गौर करने की बात है कि ईरानी प्रशासन ने इसका समय रहते खंडन नहीं किया है। ईरान के नए सर्वोच्च नेता अयातुल्ला मोजतबा खामेनेई ने 28 फरवरी को पिता की मौत का बदला लेने की कसम खाते हुए कहा था, ‘बदला हमारे राष्ट्र की इच्छा है और इसे जरूर पूरा किया जाना चाहिए।’ जब किसी देश का सर्वोच्च नेता खुलेआम ऐसा इजहार करेगा, तो देशवासियों में क्या पैगाम जाएगा? ईरान का यह इजहार एक बड़े खतरे की ओर इशारा है।
एक तरह से ईरान के सर्वोच्च नेता की मर्जी के मुताबिक ही ईरान के इस कट्टरपंथी अखबार ने खतरनाक इरादे से दुनिया को रूबरू कराया है। अब दुनिया में स्वाभाविक ही चिंता की लहर है। जिन नेताओं से ईरान बदला लेना चाहता है, उनके नाम कुछ इस प्रकार हैं -डोनाल्ड ट्रंप, बेंजामिन नेतन्याहू, जॉर्जिया मेलोनी, कीर स्टारमर, इमैनुएल मैक्रों, फ्रेडरिक मर्ज इत्यादि। सूची में अमेरिका और इजरायल के नेताओं के नाम नहीं चौंकाते, पर यूरोपीय नेताओं के नाम देखकर चिंता होती है। ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और इटली के नेताओं ने ईरान का क्या बिगाड़ा है? दरअसल, ईरान को उम्मीद थी कि इन देशों के नेता ईरान पर हुए हमले की कड़ी निंदा करेंगे। हालांकि, यूरोप के ये देश ईरान पर हुए हमले के पैरोकार कतई नहीं थे। फिर भी यह तथ्य है कि कुछ यूरोपीय देशों ने अमेरिका को अपने वायु क्षेत्र का इस्तेमाल करने दिया है। यहां ईरान की नाराजगी को समझा जा सकता है, मगर इसका मतलब कतई यह नहीं कि देशों के राष्ट्राध्यक्षों को निशाना बनाकर बदला लिया जाए। अमेरिका ने जो किया, उसकी निंदा दुनिया के ज्यादातर देश करते हैं। किसी भी देश में घुसकर उसके नेता को निशाना बनाने की अमेरिकी मनमानी की तारीफ कोई नहीं कर सकता, पर जब बदले का फितूर हावी हो जाता है, तब नियम-कायदे और इंसानी तहजीब की बातें किनारे रख दी जाती हैं। बदकिस्मती से ईरान ऐसा ही करता दिख रहा है और यह प्रवृत्ति दुनिया के लिए घातक है।
बदले की ऐसी भावना से ही पश्चिम एशिया में युद्ध फिर भड़क गया है। अमेरिकी भूमि तो ईरान से बहुत दूर है, लेकिन ईरान ने बहरीन, कुवैत, कतर, संयुक्त अरब अमीरात, जॉर्डन और ओमान पर हमले करके जवाब दिया है। अमेरिका-इजरायल भी ईरान में बड़े हमले कर रहे हैं। तनाव चरम पर है। होर्मुज जलमार्ग पर यातायात फिर प्रभावित हुआ है। मतलब, दुनिया की तमाम अर्थव्यवस्थाओं पर बुरा असर पड़ना तय है। बहुत मुश्किल से दोनों पक्षों के बीच शांति-वार्ता की स्थिति बनी थी, सहमति पत्र पर हस्ताक्षर हुए थे। शांति समझौते पर बात चल रही थी, लेकिन अब सब कुछ बिगड़ता लग रहा है। ट्रंप के करीबी सीनेटर लिंडसे ग्राहम की मौत से भी तनाव बढ़ेगा। अमेरिका में इस मौत की जांच हो रही है कि इसके पीछे ईरान की कोई साजिश तो नहीं है। अब अगर दो-तीन देश ईरान के साथ खुलकर आ गए, तो विश्व युद्ध जैसी स्थिति बन जाएगी। दोनों ही तरफ संयम और समझदारी का अभाव साफ दिख रहा है। दुनिया के आम लोग तो यही देखना चाहेंगे कि समाधान या समझौते की कोशिशें कौन शुरू करेगा?
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