
ईरान में बगावत
ईरान में चल रही बगावत पर पूरी दुनिया की निगाह स्वाभाविक है। ईरान में सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के नेतृत्व वाली मजहबी सरकार के खिलाफ लगातार तीसरे सप्ताह राष्ट्रव्यापी विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं…
ईरान में चल रही बगावत पर पूरी दुनिया की निगाह स्वाभाविक है। ईरान में सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के नेतृत्व वाली मजहबी सरकार के खिलाफ लगातार तीसरे सप्ताह राष्ट्रव्यापी विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं। इसमें महिलाओं की बड़ी भागीदारी है और वे हिजाब या बुर्के से आजादी के लिए बेचैन लग रही हैं। ईरान में बदलाव चाहने वालों ने एक अलग ही ध्वज बना लिया है और जहां भी मौका मिल रहा है, वहीं वे ईरान के वर्तमान ध्वज को हटाकर अपना ध्वज लगा दे रहे हैं। ऐसा नहीं है कि ईरानी प्रशासन चुपचाप सब कुछ देख रहा हो। प्रतिदिन वहां लोग मारे जा रहे हैं। दूसरी ओर, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि अमेरिका अशांति पर कड़ी नजर रख रहा है और हरसंभव विकल्पों पर विचार कर रहा है। एक बड़ी आशंका यह है कि अमेरिका सैन्य हस्तक्षेप कर सकता है। फिलहाल, वह ईरान में विरोध-प्रदर्शनों को लगातार हवा दे रहा है और इसके नतीजे घातक हो सकते हैं।
क्या अमेरिका पूरी सावधानी से ईरान में बदलाव को अंजाम देगा? क्या बाकी पश्चिमी देश अमेरिका या ईरान में बदलाव के पक्ष में हैं? ध्यान रहे, साल 2022 में भी ईरान में बदलाव के लिए प्रदर्शन हुए थे, लेकिन वहां की सरकार ने उस विरोध को कुचल दिया था। इस बार भी यही हो रहा है, विरोध को बेरहमी से कुचला जा रहा है। वर्तमान शासन को भी अपने बचाव का हक है। वैसे, एक बड़ा जोखिम यह है कि विद्रोह को हवा देकर अमेरिका पीछे न हट जाए। दुनिया में अनेक देश हैं, जहां पर ऐसे विरोध हुए हैं, कभी लोकतंत्र के पक्ष में, तो कहीं कट्टरपंथ के खिलाफ, लेकिन अक्सर देखा गया है कि एक सीमा के बाद पश्चिमी देश पीछे हट जाते हैं। आज यूक्रेन अगर युद्ध झेल रहा है, तो इसके लिए पश्चिमी देश और नाटो के देश भी जिम्मेदार हैं। किसी को विरोध के लिए उकसा देना आसान है, लेकिन विरोधियों की प्राण-रक्षा के लिए जमीन पर उतरना मुश्किल है। जब कोई देश तबाह होने लगता है, तब उसके निकट समर्थक भी मुंह चुराने लगते हैं। अमेरिका यह बात जानता है कि ईरानी प्रदर्शनों में 540 से अधिक लोग मारे गए हैं और 10,000 से ज्यादा लोग गिरफ्तार हुए हैं। इन देशों में जो कट्टरता देखी जाती है, वह अपने साथ बर्बरता भी लाती है। बगावत करने वालों को बर्बरता झेलनी पड़ती है। यह दुआ जरूर करनी चाहिए कि ईरान में कम से कम बर्बरता हो। ईरान में अमेरिका क्या इंसानियत को लहूलुहान होने से बचा सकता है?
ईरान में बहुत कुछ ऐसा हो रहा है, जो पहले नहीं हुआ था। वहां इंटरनेट सेवा को सरकार ने रोक दिया है, लेकिन एलन मस्क की मदद से अमेरिका वहां इंटरनेट सेवा बहाल रखना चाहता है। इसके बावजूद अमेरिका अगर जमीनी स्तर पर नहीं उतरेगा और विरोधियों को केवल बाहर से समर्थन देता रहेगा, तो यकीन मानिए, ईरान अपनी नई पीढ़ी के उन तमाम मर्दों और औरतों को गंवा देगा, जाे बदलाव के पक्ष में बिगुल बजा रहे हैं। ध्यान रहे, साल 1979 में सत्ता से हटाए गए ईरानी शाह के अमेरिका में रहने वाले बेटे रजा पहलवी भी बगावत को हवा दे रहे हैं। वह लोकतांत्रिक सरकार की ओर बदलाव का नेतृत्व करने के लिए ईरान लौटने को तैयार हैं। यह तरीका भी निंदनीय है। ईरान में नया निजाम अभी दूर की कौड़ी है, लेकिन दूर देश में बैठा एक शख्स नया बादशाह बनने के लिए तैयार है। लड़ने या बदलाव चाहने का यह सलीका सही नहीं है। यहां सवाल किसी शासन को बचाने या हटाने का नहीं, सिर्फ इंसानियत का है और वह हर हाल में बची रहनी चाहिए।

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