Hindi Newsओपिनियन ब्लॉगHindustan editorial column 12 January 2026
प्रदूषण के खिलाफ

प्रदूषण के खिलाफ

संक्षेप:

राष्ट्रीय पर्यावरण मानक प्रयोगशाला की शुरुआत पर्यावरण प्रबंधन को मजबूत बनाने की दिशा में एक सराहनीय कदम है। नई दिल्ली में शुरू किए गए इस प्रयोगशाला का मकसद आयातित उपकरणों और विदेशी प्रमाणन तंत्रों पर निर्भरता को कम करना है…

Jan 11, 2026 10:19 pm ISTHindustan लाइव हिन्दुस्तान
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राष्ट्रीय पर्यावरण मानक प्रयोगशाला की शुरुआत पर्यावरण प्रबंधन को मजबूत बनाने की दिशा में एक सराहनीय कदम है। नई दिल्ली में शुरू किए गए इस प्रयोगशाला का मकसद आयातित उपकरणों और विदेशी प्रमाणन तंत्रों पर निर्भरता को कम करना है, क्योंकि कभी-कभी ऐसे उपकरण भारत की आबोहवा के अनुकूल साबित नहीं हो पाते हैं। इस प्रयोगशाला का उद्घाटन करते हुए केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा भी कि अब भारत को प्रदूषण निगरानी से जुड़े उपकरणों के प्रमाणन के लिए विदेशी एजेंसियों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा और भारतीय जलवायु परिस्थितियों के अनुसार अब यहीं परीक्षण की सुविधा उपलब्ध रहेगी। इस प्रयोगशाला की शुरुआत से सिर्फ प्रदूषण के खिलाफ हमारी लड़ाई मजबूत नहीं होगी, बल्कि दूसरे देशों पर निर्भरता कम होने से विदेशी मुद्रा की बचत भी होगी और निवेशकों का भरोसा ज्यादा मजबूत होगा। इसकी एक वजह यह भी है कि इस प्रकार की राष्ट्रीय स्तर की सुविधाएं ब्रिटेन के अलावा सिर्फ भारत ही जुटा सका है। इसी कारण कयास लगाए जा रहे हैं कि इससे घरेलू विनिर्माण, स्टार्टअप और लघु व मध्यम उद्योगों को बल मिलेगा, जिससे परोक्ष रूप से भारत की अर्थव्यवस्था को फायदा होगा।

ऐसे प्रयास की जरूरत देश को थी भी। सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी ऐंड क्लीन एयर (सीआरईए) का बीते पांच वर्षों (2020 के कोविड-काल को छोड़कर 2019 से 2024 तक) का आंकड़ा बताता है कि देश के 44 फीसदी शहर एक लंबे समय से वायु प्रदूषण से जूझ रहे हैं। साल 2025 में तो असम-मेघालय सीमा पर स्थित बर्नीहाट सबसे प्रदूषित शहर आंका गया, जिसके बाद ही दिल्ली और गाजियाबाद का स्थान था। लंबे समय तक दूषित हवा में रहना कितना खतरनाक हो सकता है, इसका पता पिछले महीने सरकार द्वारा संसद में दी गई जानकारी से चलता है कि साल 2022 से 2024 के बीच दिल्ली के छह सरकारी अस्पतालों में सांस की गंभीर बीमारियों के दो लाख से भी अधिक मरीज आए, क्योंकि देश की राजधानी प्रदूषण के बढ़े स्तर से लगातार जूझती रही है। इन सबके अलावा ऐसे तमाम आंकड़े हैं, जो बताते हैं, दूसरे देशों की तुलना में यहां स्थिति ज्यादा गंभीर है। ऐसे में, उन उपकरणों की जरूरतें भी बढ़ जाती हैं, जो मानव जीवन को वायु प्रदूषण के नुकसान से बचा सकें। अब चूंकि स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार उपकरणों को जांचा-परखा जा सकेगा, इसलिए उनके अधिक प्रभावी होने की उम्मीद बढ़ गई है।

यह सुखद है कि जीवन की दोनों बुनियादी जरूरतों- हवा और पानी पर अब विशेष ध्यान दिया जाने लगा है। जिस तरह स्वच्छ हवा को लेकर कवायद तेज कर दी गई है, ठीक उसी तरह साफ पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करने को लेकर भी प्रयास किए जा रहे हैं। इंदौर की घटना बेशक हमारी व्यवस्था पर एक गंभीर सवाल है, लेकिन लोकसभा में पेश आंकड़े बताते हैं कि पीने के पानी की गुणवत्ता जांचने के लिए देश में अब कुल 2,847 प्रयोगशालाएं हैं, जिनमें से 1,678 एनएबीएल से मान्यता-प्राप्त हैं। कुछ राज्य, जिनमें दुर्भाग्य से बड़े सूबे भी हैं, जरूर अभी जद्दोजहद कर रहे हैं, लेकिन ऐसी सुविधाएं बढ़ाने की कोशिशें अनवरत की जा रही हैं। जाहिर है, काम दोनों मोर्चों पर हो रहा है। हालांकि, इससे जल को निर्मल और हवा को स्वच्छ बनाए रखने की कवायद ढीली नहीं पड़नी चाहिए, क्योंकि कुदरत से मिली साफ हवा और साफ पानी जैसी नेमतों का कोई विकल्प उपलब्ध नहीं है।