तृणमूल की टूट
तृणमूल कांग्रेस विधायक दल में विभाजन के बाद संसदीय दल में टूट की घटना दीवार पर लिखी एक ऐसी इबारत थी, जिसे कोई भी पढ़ सकता था। इसे सार्वजनिक करने के लिए बस उस दिन को चुना गया, जिस दिन पार्टी की मुखिया…

तृणमूल कांग्रेस विधायक दल में विभाजन के बाद संसदीय दल में टूट की घटना दीवार पर लिखी एक ऐसी इबारत थी, जिसे कोई भी पढ़ सकता था। इसे सार्वजनिक करने के लिए बस उस दिन को चुना गया, जिस दिन पार्टी की मुखिया ममता बनर्जी ‘इंडिया ब्लॉक’ की बैठक में भाग लेने के लिए दिल्ली में थीं। तृणमूल का यह बिखराव एक राजनीतिक दल में टूट या दलबदल की घटना भर नहीं है, यह हमारी राजनीतिक संस्कृति पर एक निर्मम टिप्पणी भी है कि हमारे बहुत सारे जन-प्रतिनिधि अब सिद्धांतों से नहीं, सिर्फ सत्ता से संचालित होते हैं। चाहे वे दिल्ली की सत्ता से संचालित होते हों या राज्यों की राजधानियों में काबिज सत्ता से और इसके लिए कोई एक दल या पार्टी दोषी नहीं है; जिसे जहां मौका मिला, उसने वहीं राजनीतिक शुचिता और नैतिकता को उसी तरह ताक पर रखा, जैसे तृणमूल के विधायकों और सांसदों ने अभी रखा है। आखिर इसे कैसे जायज ठहराया जा सकता है कि जिस पार्टी के चुनाव-चिह्न पर चंद दिनों पहले जनादेश हासिल किया गया हो, उससे बगावत करके अलग सियासी समूह बना लिया जाए?
तृणमूल में हुई बगावत ने जिस पहलू को गहरे रेखांकित किया है, वह यह कि जिस दल को लंबे समय तक राजनीति करनी है, उसे आंतरिक लोकतंत्र को बढ़ावा देना ही होगा। दुर्योग से आज राष्ट्रीय पार्टियां हों या क्षेत्रीय, उनमें आंतरिक लोकतंत्र लगभग खत्म हो चुका है। असहमति रखने वालों को फौरन बागी समझ लिया जाता है और उसके साथ पार्टी के भीतर भेदभावपूर्ण व्यवहार शुरू हो जाता है। राष्ट्रीय पार्टियों में जहां आलाकमान संस्कृति ने पकड़ मजबूत बना ली है, तो वहीं क्षेत्रीय दल किसी जागीर की तरह चलाए जा रहे हैं। बहुमत की राय के बजाय ज्यादातर फैसले आलाकमान या पार्टी प्रमुख की पसंद से लिए जाते हैं। वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध लोगों का संगठन में सम्मान न होने के कारण ही सत्ता से हटते ही एक के बाद दूसरी पार्टियां अब बड़ी टूट की शिकार बन रही हैं। आम आदमी पार्टी के बाद अब तृणमूल में जो कुछ हो रहा है, उसके लिए ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी की कार्यशैली कुछ कम दोषी नहीं है। यह छिपी हुई बात नहीं है कि लोकप्रियता के सुनहरे दौर में उन्होंने पार्टी के प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं की सलाह को न सिर्फ नजरअंदाज किया, बल्कि नेतृत्व की भूमिका के लिए जमीनी कार्यकर्ताओं को तैयार करने के बजाय अपनी पसंद के लोगों को तृणमूल पर थोपा। आज जब उनमें से कई बागी गुट के साथ खड़े हैं, तो स्वाभाविक ही ममता के फैसलों पर सवाल उठाए जाएंगे।
जिस समय तृणमूल कांग्रेस टूट रही थी, ठीक उसी समय मध्य प्रदेश में राज्यसभा चुनाव के मद्देनजर कांग्रेस के विधायकों को भोपाल से दूसरी जगह ले जाने की तैयारी की जा रही थी। इसके पीछे आशंका यह जताई गई कि राज्यसभा चुनाव के मद्देनजर उनकी खरीद-फरोख्त हो सकती है। ओडिशा-बिहार में पिछले राज्यसभा चुनाव में जमकर क्रॉस वोटिंग हुई। जाहिर है, ऐसी घटनाओं से हमारा लोकतंत्र सुर्खरू नहीं होता। जब विधायक और सांसद ही स्वतंत्र अभिव्यक्ति नहीं कर सकते, अपनी मर्जी से मतदान नहीं कर सकते, तो फिर हम किस तरह के लोकतंत्र की पटकथा लिख रहे हैं? इस विषय पर तमाम राजनीतिक दलों ही नहीं, देश की जनता को भी गंभीरता से सोचने की जरूरत है। नैतिक रूप से प्रतिबद्ध जन-प्रतिनिधि के बगैर एक आदर्श और परिपक्व लोकतंत्र की हम कल्पना नहीं कर सकते।
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