तेजपाल को सजा
आखिरकार बॉम्बे उच्च न्यायालय की गोवा पीठ ने पूर्व मीडिया हस्ती तरुण तेजपाल को यौन दुराचरण मामले में दस साल कठोर कारावास की सजा सुना दी है। आरोपी पक्ष सजा को सर्वोच्च न्यायालय में जरूर चुनौती देगा…

आखिरकार बॉम्बे उच्च न्यायालय की गोवा पीठ ने पूर्व मीडिया हस्ती तरुण तेजपाल को यौन दुराचरण मामले में दस साल कठोर कारावास की सजा सुना दी है। आरोपी पक्ष सजा को सर्वोच्च न्यायालय में जरूर चुनौती देगा, पर गौर करने की बात है, यहां तक पहुंचने में 12 वर्ष से ज्यादा वक्त लग गया। तरुण तेजपाल देश की एक चर्चित मीडिया हस्ती थे और उच्च न्यायालय के फैसले के मुताबिक, उन्होंने अपने रसूख का इस्तेमाल अपनी कनिष्ठ सहकर्मी के शोषण के लिए किया। उच्च न्यायालय ने तेजपाल के दुराचरण को बलात्कार माना है, जबकि सत्र न्यायालय ने उन्हें बरी कर दिया था। एक बार फिर, तेजपाल के वकीलों ने उन्हें बचाने की हर मुमकिन कोशिश की। गोवा पीठ से अनुरोध किया गया कि वह उनके मुवक्किल के प्रति नरमी बरते, क्योंकि यह अपराध 13 साल पुराना है और अब वह 62 वर्ष के हो चुके हैं। साथ ही, यह भी बताने की कोशिश हुई कि तेजपाल के खिलाफ अन्य कोई मामला दर्ज नहीं है। खैर, तेजपाल के बचाव की हर कोशिश नाकाम हुई है और इंसाफ अपने मुकाम पर पहुंचा है।
तरुण तेजपाल के प्रति नरमी बरतने का आधार नहीं है। महिला सुरक्षा के लिए जो कानून बने हैं, उनकी पालना होनी ही चाहिए। ऐसे मामलों में नरमी बरतने से समाज में गलत संदेश जाता है। पीड़िता तेजपाल की बेटी के उम्र की थी और उसके इनकार पर तेजपाल ने गौर नहीं किया। यह भूलना नहीं चाहिए, तेजपाल ने सीमाओं का उल्लंघन एक दिन नहीं, दो दिन किया। हम आज ऐसे दौर में हैं, जहां यह सुस्थापित बात है कि एक महिला के ‘न’ कहने का अर्थ केवल इनकार ही होता है और कुछ नहीं। समग्रता में यह मामला न्यायालयों की सामूहिक संवेदना को कठघरे में खड़ा करता है। न्याय न्यायमूर्ति के अपने विवेक पर निर्भर दिखता है। यह बात न्यायालय में बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है कि न्यायमूर्ति किन तथ्यों को देखना चाहते हैं। सत्र न्यायालय की सुनवाई और फैसले से ऐसा लगा कि पीड़िता को ही कठघरे में खड़ा किया जा रहा है। दोष और दोषी के आचरण के बजाय पीड़िता के व्यवहार को देखने की कोशिश हुई थी। यही नहीं, पीड़िता को लिखे गए तेजपाल के माफीनामे को भी नजरंदाज कर दिया गया था। क्या दोष साबित करने के लिए माफीनामा पर्याप्त नहीं था?
यह मुकदमा एक मिसाल बने। ऐसे मामलों में आरोपी के प्रति किसी भी तरह की नरमी बरतना गलत है। यह भी देखना चाहिए कि आरोपी ने बचने के लिए हर मुमकिन प्रयास किए। सत्तारूढ़ दल पर आरोप भी लगाए, लेकिन इन बातों से अपराध की गंभीरता कतई कम नहीं हो जाती। जहां भी कानून का उल्लंघन होता है, वहां पूरी कड़ाई से फैसला लेने की जरूरत है। कॉरपोरेट दुनिया में ऐसी शिकायतों को आम तौर पर दबा दिया जाता है। पीड़ित पक्ष कानून की लंबी प्रक्रिया देखकर सहम जाता है। गौर कीजिए, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार, 90 प्रतिशत से अधिक घरेलू और यौन हिंसा के मामले छिपा लिए जाते हैं और कभी दर्ज नहीं हो पाते हैं। अगर सुनवाई और सजा जल्दी हो, तो निश्चित ही हर यौन अपराध दर्ज होने लगेगा, दुराचरण पर लगाम लगेगी और महिलाओं की सुरक्षा में इजाफा होगा। इसी चर्चित मामले में हम देखें, तो अगर अंतिम फैसला दो या तीन साल के समय में ही आ जाता, तो जाहिर है, हमारे समाज पर कुछ ज्यादा असरदार होता। खैर, अंतिम रूप से इस मामले में फैसले के लिए हमें इंतजार करना पड़ेगा। उम्मीद है कि यह इंतजार अब ज्यादा लंबा नहीं होगा।
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