संवाद से समाधान
सर्वोच्च न्यायालय ने युवाओं की बात संवेदना से सुनने की जैसी पैरोकारी की है, वह स्वागत के योग्य है। न्यायालय ने उचित ही कहा है कि विरोध प्रदर्शनों के दौरान हिंसा रोकने के लिए समाज व कानून लागू करने वाले अधिकारियों के पास…

सर्वोच्च न्यायालय ने युवाओं की बात संवेदना से सुनने की जैसी पैरोकारी की है, वह स्वागत के योग्य है। न्यायालय ने उचित ही कहा है कि विरोध प्रदर्शनों के दौरान हिंसा रोकने के लिए समाज व कानून लागू करने वाले अधिकारियों के पास उपलब्ध सबसे बड़ी ताकत यह है कि युवाओं की बात सुनी जाए और उन्हें सही सलाह दी जाए। लगे हाथ, न्यायालय ने चेतावनी भी दी है कि शक्तिशाली सरकार के नाम पर कोई भी आक्रामक कार्रवाई हालात को बिगाड़कर अशांति को जन्म दे सकती है। देश के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति बागची और न्यायमूर्ति मोहना की पीठ ने बहुत उपयोगी व्यवस्था दी है। इससे प्रदर्शनकारियों और सरकार, दोनों को निर्णय लेने में सहूलियत होगी। वाकई देश में युवा प्रदर्शनकारियों से निपटने के लिए संयमित दृष्टिकोण की जरूरत है। हमें टकराव का रास्ता अपनाने के बजाय संयमित होना चाहिए। संयमित आचरण के तहत पहली जरूरत है संवाद करना। कोई सरकार अगर ऐसा करती है, तो आंदोलन में उग्रता की आशंका घट जाती है। युवाओं को लड़ने के लिए मजबूर करने के बजाय समाधान की राह पर चलने के लिए प्रेरित करना चाहिए।
बीती 20 जुलाई को सीजेपी के आंदोलन के समय जो हिंसा हुई, उस पर देश में अलग-अलग राय हैं। एक बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है, जो युवाओं को माफ करना चाहते हैं, जबकि ऐसे लोग भी हैं, जो हिंसा करने वाले युवाओं पर यथोचित कार्रवाई के पक्ष में हैं। सीजेपी के आंदोलन के समय यह कहना ठीक नहीं होगा कि पुलिस सीधे हिंसा पर उतर आई। पुलिस ने भी जंतर-मंतर पर काफी संयम से काम लिया है। इस तथ्य को कतई नजरंदाज नहीं करना चाहिए कि उस प्रदर्शन या संसद मार्च में कुछ ही लोग थे, जिन्होंने हिंसा का सहारा लिया। हालांकि, यह बहस या अदालती सुनवाई का मुद्दा रहेगा कि हिंसा के लिए कौन जिम्मेदार था? सर्वोच्च न्यायालय में तमाम शिकायतों की सम्मिलित सुनवाई होनी चाहिए और सभी न्यायमूर्ति भी यही चाहते हैं। छात्रों की शिकायतों को सुनने की जरूरत है, तो पुलिस के साथ भी अन्याय नहीं होना चाहिए। ध्यान रहे, ताजा याचिका में भारतीय वायु सेना के एक पूर्व अधिकारी ने 20 जुलाई के संसद मार्च में शामिल आयोजकों और कथित दंगाइयों के खिलाफ कार्रवाई करने व जवाबदेही तय करने की मांग की है। अनेक लोगों का आग्रह है कि हिंसा करने वालों या दिल्ली में बदजुबानी से माहौल खराब करने वालों को केवल राजनीतिक आधार पर माफ न किया जाए।
वैसे, प्रधानमंत्री और सरकार का रुख कुल मिलाकर, सीजेपी के आंदोलन के प्रति लचीला है। आम तौर पर सरकार माफी देने की मुद्रा में है, लेकिन यह सवाल अपनी जगह बिल्कुल जायज है कि क्या आंदोलन को हिंसक बनाने वालों को आसानी से छोड़ देना चाहिए? इस पूरे प्रकरण में संतुलन की जरूरत है, जिसने भी गलती की है, उसे सजा मिलनी चाहिए। इस आंदोलन में बहुत कुछ ऐसा हुआ है, जो नहीं होना चाहिए था। अगर इस आंदोलन में जघन्य आपराधिक पृष्ठभूमि के लोग शामिल हुए हैं, तो उन पर शिकंजा कसना ही होगा। आंदोलनों को न्यायपूर्ण व शांतिपूर्ण बनाने के लिए अपराधियों पर लगाम जरूरी है। छात्रों को भी हर हाल में हिंसक प्रदर्शनों से बचना-बचाना चाहिए। हिंसक प्रदर्शन की नौबत को टालने की हर मुमकिन कोशिश होनी चाहिए। इस दिशा में सबसे जरूरी है, ऐसे आंदोलनों के सही पटाक्षेप के लिए सर्वोच्च न्यायालय सुनिश्चित दिशा-निर्देश जारी करे।
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