
मुख्य सचिवों की माफी
देश के न्यायिक इतिहास में सोमवार को एक चौंका देने वाला पन्ना जुड़ गया। दो राज्यों- पश्चिम बंगाल और तेलंगाना को छोड़कर देश के तमाम सूबों के मुख्य सचिवों को सर्वोच्च न्यायालय से एक साथ माफी मांगनी पड़ी…
देश के न्यायिक इतिहास में सोमवार को एक चौंका देने वाला पन्ना जुड़ गया। दो राज्यों- पश्चिम बंगाल और तेलंगाना को छोड़कर देश के तमाम सूबों के मुख्य सचिवों को सर्वोच्च न्यायालय से एक साथ माफी मांगनी पड़ी। दरअसल, 22 अगस्त को ही शीर्ष अदालत ने देश भर के नगर निगमों को यह आदेश जारी किया था कि वे पशु जन्म नियंत्रण के नियमों के अनुपालन के लिए जरूरी संसाधनों, मसलन लावारिस कुत्ते पकड़ने वाले कर्मचारियों, विशेष वाहनों, पशु चिकित्सकों और कुत्तों के बाड़े से जुड़ी जानकारियां विस्तार से दें। मगर 27 अक्तूबर को जब तीन जजों की पीठ मामले की आगे सुनवाई के लिए बैठी, तो सिर्फ दो राज्यों का हलफनामा उसके सामने था। ऐसे में, स्वाभाविक ही सख्त रुख अपनाते हुए पीठ ने बाकी सभी सूबों के मुख्य सचिवों को 3 नवंबर को तलब कर लिया। जाहिर है, सभी राज्य प्रशासनों को अपनी गलती का एहसास हुआ और सोमवार को उनको मुख्य सचिवों के माफीनामे के साथ अपेक्षित हलफनामा भी दायर करना पड़ा। अब इस मामले की अगली सुनवाई आगामी शुक्रवार को होगी।
निस्संदेह, यह पूरा प्रकरण सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुपालन में हमारे तंत्र की दुस्साहसिक उदासीनता का एक ताजा उदाहरण है। इससे यही जाहिर हुआ है कि जब आला अदालत को अपने किसी आदेश के अनुपालन के लिए कठोर कदम उठाने को बाध्य होना पड़ रहा है, तो जिला अदालतों के आदेश के पालन में कितनी हीलाहवाली होती होगी? यह न सिर्फ न्यायपालिका के लिए, बल्कि कार्यपालिका के लिए भी गंभीर चिंता का विषय होना चाहिए। लावारिस कुत्तों के काटने से राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के कुछ बच्चों में रेबीज होने की खबर का स्वत: संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह मामला शुरू किया था और बाद में उसने इसे राष्ट्रव्यापी समस्या मानते हुए इसका विस्तार देश के स्तर पर कर दिया। यकीनन, इससे आला अदालत की संवेदनशीलता का पता चलता है, मगर हमारा प्रशासनिक अमला नागरिकों के प्रति अपना एक जरूरी दायित्व निभाने में विफल रहा और अदालती सक्रियता के बावजूद लापरवाही की चादर ओढ़े रहा। सवाल है कि अधिकारियों में यह दुस्साहस आ कहां से रहा है? इस उदासीनता को दूर किए बिना प्रभावी शासन की उम्मीद नहीं बांधी जा सकती। यह स्थिति तब है, जब दुनिया भर में रेबीज के कारण मरने वाले कुल लोगों में से 36 फीसदी भारतीय हैं!
मुख्य सचिवों के लिए यह वाकई सोचने का समय है कि अगर इतने संजीदा मामले में जरूरी कार्रवाई न हो पाने के लिए उन्हें अदालत में हाजिरी लगानी पड़ रही है, तो राज्य में उनका प्रशासन किस हद तक शिथिल व संवेदनहीन होने लगा है और उसका आम अवाम में क्या इकबाल रह गया होगा? हमारी अदालतों में लाखों मुकदमों के लंबे खिंचते जाने की एक बड़ी वजह वक्त काटने की यही प्रशासनिक सुस्ती है। सरकारें कानून तो बना देती हैं, मगर उनके क्रियान्वयन का दायित्व जिस तंत्र पर है, उसकी जवाबदेही सुनिश्चित नहीं कर पातीं। यहीं पर न्यायपालिका को भी आत्ममंथन की जरूरत है। चंडीगढ़ मेयर चुनाव के पीठासीन अधिकारी अनील मसीह का उदाहरण सामने है। यदि अदालतें बेहद गंभीर अपराध के दोषी को बिना शर्त माफी मांग लेने पर छोड़ती रहेंगी, तो वे दूसरे अफसरों में अदालती आदेश की अवहेलना के दंडनीय होने का भय भला कैसे पैदा कर सकेंगी? न्याय के राज की पहली शर्त है कि न्यायपालिका का सम्मान अक्षुण्ण रहे।

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