पश्चिमपरस्त पाक से चिंता क्यों
पाकिस्तान की अति-सक्रियता से हमारे आशंकाशास्त्रियों को लगता है कि वह इस प्रभाव का उपयोग कश्मीर मुद्दे के अंतरराष्ट्रीयकरण के लिए करेगा। मैं विनम्रतापूर्वक पूछना चाहूंगा, ऐसा उसने कब नहीं किया? आजादी के बाद से हम उसकी हर सियासी और सामरिक चाल से निपटते आए हैं…

हमारे कुछ हिन्दुस्तानी साथियों को इस बात से तकलीफ है कि इस्लामाबाद पश्चिम एशिया की जंग पर ‘मध्यस्थता’ क्यों कर रहा है! वे नहीं जानते कि पाकिस्तान उसी काम को अंजाम दे रहा है, जिसके लिए उसे रचा गया था।
इस तथ्य को जानने और समझने के लिए हमें आजादी से पहले के दिनों में लौटना होगा। पाकिस्तान कोई आदिकालिक विचार नहीं है। इस शब्द का पहली बार प्रयोग कैम्ब्रिज में अध्ययनरत चौधरी रहमत अली ने सन् 1933 में किया था। शुरू में किसी ने इसे गंभीरता से नहीं लिया, लेकिन बाद में अल्लामा इकबाल ने इसे भावनात्मक और मोहम्मद अली ‘जिन्ना’ ने राजनीतिक कलेवर प्रदान कर दिया। कहते हैं कि जिन्ना के गले में इस ख्वाब की माला डालने वाली ब्रिटिश हुकूमत थी। ऐसा न होता, तो भला यह कहां संभव था कि सिर्फ 14 बरस में हजारों साल पुराने राष्ट्र-राज्य के दो टुकड़े हो जाते? ब्रिटिश चाहते थे कि उन्हें सैन्य मानसिकता वाला एक ‘बफर स्टेट’ इस भूभाग में हासिल हो जाए।
यहां एक और तथ्य पर ध्यान देना जरूरी है कि सांप्रदायिक खून-खराबे के बावजूद भारतीय राजनीतिज्ञों का बहुमत पाकिस्तान के पक्ष में नहीं था। लॉर्ड माउंटबेटन दोनों पक्षों को समझाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन भारी बहसबाजी के बावजूद कोई सार्थक नतीजा नहीं निकल रहा था। पाकिस्तानी मूल के स्वीडिश प्रोफेसर इश्तियाक अहमद ने विस्तार से अपनी किताब पाकिस्तान दि गैरीसन स्टेट में लिखा है कि भारतीयों के बीच बढ़ते इस विवाद को सुलझाने में अंग्रेज हुक्मरान नाकाम थे। वे कुछ दिन और भारत को अपने अधीन रखना चाहते थे, लेकिन हालात उनके हाथ से निकलते जा रहे थे।
इसी बीच 8 मई, 1947 को तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट रिचर्ड एटली के साथ कुछ पूर्व सेनाध्यक्षों और आला कूटनीतिज्ञों की मुलाकात हुई। ये लोग गई जनवरी से अपनी हुकूमत को समझाने की कोशिश कर रहे थे कि भारत स्वभाव से समाजवादी चरित्र का देश है। अगर हमने पाकिस्तान का गठन न किया, तो आने वाले वर्षों में सोवियत संघ का प्रभाव हिंद महासागर तक फैल सकता है। यह बर्तानिया के सामरिक और व्यापारिक हितों के लिए प्रतिकूल होगा।
8 मई की यह बैठक फैसलाकुन साबित हुई। नतीजतन, लॉर्ड माउंटबेटन ने 3 जून, 1947 को ऑल इंडिया रेडियो पर देश के विभाजन और पाकिस्तान के गठन की घोषणा कर दी। यही वजह है कि पाकिस्तान अपने जन्म के पहले क्षण से पश्चिम की गोद में जा बैठा। उसके छावनीकरण के मूल में भी यही विचार है। आज भी इस्लामाबाद का सत्ता-सदन रावलपिंडी के सैन्य प्रशासन की पुतलियों के रुख से चलता है।
इसके विपरीत भारत ने गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाई। बदले हुए समय और परिस्थितियों में हमारी ‘एकला चलो’ की नीति नए चोले और कलेवर के साथ आज भी बरकरार है। हालांकि, इस दौरान कई ऐसे अवसर आए, जब हम पाला बदलते दिखाई दिए। कुछ उदाहरण देता हूं।
सन् 1965 की जंग के दौरान अमेरिका और चीन खुलकर पाकिस्तान के साथ थे, जबकि सोवियत संघ दृढ़ता से समझौते की हिमायत कर रहा था। सोवियत संघ ने ही ताशकंद में समझौता-वार्ता कराई, ताकि हालात हस्बेमामूल हो सकें। इसी तरह, सन् 1971 में जब भारत और पाकिस्तान भिड़े हुए थे, तब अमेरिका ने अपना सातवां जंगी बेड़ा बंगाल की खाड़ी की ओर रवाना कर दिया था। वाशिंगटन खुले तौर पर इस्लामाबाद का हिमायती था। उस समय भी सोवियत संघ खुलकर भारत के समर्थन में था। इस समूचे विवरण से यह मत समझ बैठिएगा कि हम मॉस्को के पाले में जा बैठे थे। सोवियत संघ से करीबी के बावजूद भारत अपनी गुटनिरपेक्षता की नीति की रक्षा करता रहा। यही वजह है कि हमें पश्चिम से लगातार इमदाद हासिल होती रही। सन् 1960 के दशक में भारत में हुई ऐतिहासिक हरित क्रांति अमेरिकी संस्थाओं के सहयोग के बिना संभव नहीं थी।
एक तरफ, नई दिल्ली तटस्थता की नीति को कुंद नहीं होने दे रही थी, तो दूसरी तरफ इस्लामाबाद अपनी पुरानी रहगुजर पर कायम था। 1971 की जंग के पहले पाकिस्तान ने ही अमेरिका और चीन को समीप लाने में मदद की थी। पहले गोपनीय बीजिंग दौरे से पूर्व तत्कालीन अमेरिकी विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर ने पाकिस्तान से बीजिंग की उड़ान भरी थी। अफगानिस्तान में कार्रवाई के वक्त अमेरिकी फौजों को नभ-जल और थल मार्ग सुगम कराने के साथ पाकिस्तान ने अमेरिका की हर तरह से मदद की थी। क्या इस्लाम के आधार पर बने देश को एक मुस्लिम देश के खिलाफ होने वाली इस कार्रवाई में मदद करना शोभा देता था?
ऐसे में, जंगबंदी की बातचीत अगर इस्लामाबाद में होती है, तो हैरानी कैसी? अब यह जगजाहिर है कि इस्लामाबाद की बातचीत किसी शहबाज शरीफ या आसिम मुनीर के प्रभाव की वजह से नहीं हुई। चीन ने ईरान पर दबाव बनाया और निरर्थक युद्ध से बाहर निकलने को आतुर ट्रंप साहब को भी अवसर मिल गया।
अमेरिका और चीन के मौजूदा रिश्तों को देखते हुए यह बैठक किसी ऐसे स्थान पर होनी थी, जो बीजिंग और वाशिंगटन के दोहरे दबाव में हो। पाकिस्तान अकेला ऐसा इस्लामी देश है, जो दोनों की समान भाव से जी-हुजूरी करता है। यही वजह है कि कूटनीति के जानकार उसे मध्यस्थ नहीं, बल्कि माध्यम मान रहे हैं। जिन्हें भरोसा न हो, वे कृपया प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की उस एक्स पोस्ट पर नजर डाल देखें, जिसमें उन्होंने युद्ध-विराम की घोषणा की थी। उसकी पहली लाइन थी- ‘ड्राफ्ट- पाकिस्तान’स पीएम मैसेज ऑन एक्स।’ मतलब साफ है कि वह ड्राफ्ट किसी और ने मुहैया कराया था और हड़बडी में उस पंक्ति को हटाए बिना जारी कर दिया गया।
बाद में संशोधित वर्जन जारी किया गया, पर प्रश्न उठने लगे कि इस एक्स पोस्ट के मूल ड्राफ्ट को भेजने वाला कौन था? वाशिंगटन या बीजिंग का सत्ता-सदन अथवा रावलपिंडी के कमांडर साहेबान? कमाल यह है कि संशोधन के बावजूद इसमें लेबनान और इजरायल के बीच संघर्ष-विराम की बात की गई थी। वहां बाद में भी बमबारी हुई और अमेरिकी उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस सफाई देते नजर आए कि कोई गलतफहमी हुई है। हमने लेबनान की तो चर्चा ही नहीं की थी।
यहां एक और तथ्य गौरतलब है। पाकिस्तान और इजरायल में कूटनीतिक रिश्ते नहीं हैं। यही वजह है कि शांति-वार्ता से तेल अवीव का प्रतिनिधि नदारद है। इजरायल इस युद्ध की अहम कड़ी है। उसके बिना कोई संधि या समझौता कैसे संभव है? मतलब साफ है, पाकिस्तान महज एक मुखौटा है, असली सूत्रधार कहीं और है। पहले दौर की बातचीत के निहितार्थ अभी सामने नहीं आए हैं और दुनिया टकटकी लगाए उनका इंतजार कर रही है।
इसके बावजूद पाकिस्तान की अति-सक्रियता से हमारे आशंकाशास्त्रियों को लगता है कि वह इस प्रभाव का उपयोग कश्मीर मुद्दे के अंतरराष्ट्रीयकरण के लिए करेगा। मैं विनम्रतापूर्वक पूछना चाहूंगा, ऐसा उसने कब नहीं किया? आजादी के बाद से हम उसकी हर सियासी और सामरिक चाल से निपटते आए हैं, आगे भी सफलतापूर्वक निपटाते रहेंगे।
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