
वंदे मातरम् और यह विवाद
आज जब इस महान गीत की संरचना की 150वीं जयंती मनाई जा रही है, तब इस मौके पर हम भारतीयों को इस गीत के मूल भावों को समझने की कोशिश करनी चाहिए। सरकार ने भी इसीलिए 8-9 दिसंबर को संसदीय कार्यवाही के 10 मूल्यवान घंटे राष्ट्रगीत पर चर्चा के लिए मुकर्रर किए हैं…
इसी सितंबर की बात है। इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने उद्बोधन की शुरुआत में अरबी के अस्लामु अलैकुम के साथ संस्कृत में ओम् स्वस्तिअस्तु बोला। संयोग से दोनों के भावार्थ समान हैं- ईश्वर आपका कल्याण करें। बताने की जरूरत नहीं है कि इंडोनेशिया वह देश है, जहां संसार के सर्वाधिक मुस्लिम रहते हैं।
इस्लामी राष्ट्रों के नेता अक्सर ऐसा करते हैं, लेकिन सुबियांतो उसी परंपरा पर टिके रहे, जिसे कभी उनके पुरखों ने इस्लाम के अवतरण से पहले शुरू किया था। इंडोनेशिया में तमाम लोग आज भी मांगलिक कार्यों की शुरुआत में गणेश का स्मरण करते हैं। कभी यहां के 20 हजार रुपये के नोट पर लंबोदर की तस्वीर छपा करती थी।
मैं यह उदाहरण क्यों दे रहा हूं?
कभी क्रांति का प्रतीक रहे वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ पर कल संसद में चर्चा होनी है। इसके प्रयोग पर बरसों से विवाद छिड़ा हुआ है। मुस्लिम जनसंख्या का एक तबका इसे राष्ट्रगीत नहीं मानता। वे इसे पूरा गाना तो दूर, वंदे मातरम् कहने से भी इनकार करते हैं। वजह? इस गीत में मातृभूमि की तुलना दुर्गा और लक्ष्मी से की गई है।
वे कहते हैं कि यह इस्लाम के एकेश्वरवाद के विरुद्ध है, जो अल्लाह के अलावा किसी अन्य की आराधना वर्जित करता है। मैं उनकी भावनाओं का सम्मान करने के बावजूद उनसे यह अनुरोध करना चाहूंगा कि जब सुकर्णो से सुबियांतो तक इंडोनेशियाई राष्ट्रपतियों को अपनी परंपरा से परहेज नहीं रहा, तो भला भारत में भ्रम क्यों? यह अल्पसंख्यकों की असुरक्षा-ग्रंथि को हवा देने की कोशिश नहीं, तो और क्या है? राष्ट्रीय गौरव और संघर्षों के प्रतीक धर्मों के मोहताज नहीं होते।
जो नहीं जानते, उन्हें बता दूं कि वंदे मातरम् किसी फिल्म का गीत भर नहीं है। प्रख्यात बांग्ला लेखक बंकिमचंद्र चटर्जी ने सन् 1875 में इसे लिखा था। बाद में उन्होंने अपने उपन्यास आनंदमठ में इसे स्थान दिया। अंग्रेजों के खिलाफ हुए हिंदू मठों के विद्रोहों में संन्यासियों ने इसे वैचारिक चेतना के प्रवाह के लिए इस्तेमाल किया था। सन् 1905 में जब लॉर्ड कर्जन ने बंगाल के विभाजन की घोषणा की, तब यह गीत बांग्ला एकता और ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध नारे की तरह इस्तेमाल होने लगा।
ब्रिटिश पुलिस जब भारतीयों की आवाज कुचलने के लिए लाठियां भांजती या गोलियां बरसाती, तो विद्रोही जत्थे वंदे मातरम् की गर्जना से आसमान गुंजा देते। बहुत से क्रांतिकारियों ने सूली पर लटकाए जाने से पहले वंदे मातरम् का उद्घोष किया था। उस समय वंदे मातरम् राष्ट्रीय चेतना और प्रतिरोध का प्रतीक था, हिंदू धर्म का नहीं। झल्लाए अंग्रेजों ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया था।
पर ऐसी बंदिशें क्रांतियां रोक कहां पाती हैं!
परेशान हुक्मरानों को साल 1909 में मुस्लिम लीग के नेता सय्यद अली इमाम के एक बयान से उम्मीद जगी। सय्यद अली और उनके मुट्ठी भर साथी मानते थे कि यह एक विधर्मी गीत है और हमें इसके इस्तेमाल से दूर रहना चाहिए। जो शब्द बांग्ला एकता और आजादी के राष्ट्रीय आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे, वही सत्ता के सहयोग से अब मजहबी वर्जना के शिकार बन चले थे। यह सिलसिला सन् 1937 में तब शीर्ष पर जा पहुंचा, जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने राज्य की हुकूमत हासिल की।
उस वक्त कांग्रेस पार्टी को राष्ट्रगान की जरूरत थी और इसके लिए एक समिति का गठन किया गया। इस कमेटी के सदस्य थे- जवाहरलाल नेहरू, सुभाष चंद्र बोस और रवींद्रनाथ टैगोर। टैगोर की सलाह पर कांग्रेस ने वंदे मातरम् के शुरुआती दो पैराग्राफ राष्ट्रगीत के तौर पर चुने। इनमें भारत-भूमि, नदियों, बगीचों, शीतल मंद समीर आदि का गुणगान किया गया। इस समिति ने बाकी हिस्सों को छोड़ने की सिफारिश की, क्योंकि इसमें हिंदू देवी-देवताओं का जिक्र था।
इन तीनों महानुभावों ने वक्त की नब्ज को सही पहचाना था। तब तक मुस्लिम लीग के कार्यकर्ताओं के बीच ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ का नारा जोर पकड़ चुका था। गांवों और शहरों में ‘पाकिस्तान डिक्लरेशन’ के परचे बांटे जा रहे थे। सन् 1933 में चौधरी रहमत अली ने इसकी संरचना की थी। मोहम्मद जिन्ना ने तब तक आधिकारिक तौर पर पाकिस्तान का राग नहीं छेड़ा था, पर उनकी गिद्ध-दृष्टि इस हलचल पर थी। वंदे मातरम् का विवाद इस अलाव को और भड़का सकता था।
इससे वक्ती तौर पर तो विवाद थमा जरूर, पर अंदर ही अंदर शोले खदबदा रहे थे।
यही वजह है कि 24 जनवरी, 1950 को जब देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा कि वंदे मातरम् गीत को जन-गण-मन के बराबर का दर्जा मिलना चाहिए, तब उनकी इस इच्छा का सम्मान तो किया गया, पर इसे सांविधानिक दर्जा नहीं मिल सका। भारतीय संविधान के अनुच्छेद-51ए के मुताबिक, हर भारतीय के लिए राष्ट्रगान, यानी जन-गण-मन अधिनायक जय हे गाना जरूरी है। वंदे मातरम् की स्थापना राष्ट्रगीत के तौर जरूर है, पर इसके लिए कोई सांविधानिक बाध्यता नहीं है।
इसके बावजूद रह-रहकर इसे राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने की कोशिश होती है। इसके समर्थक मानते हैं कि यह विवाद बेबुनियाद है, क्योंकि जिन पंक्तियों को राष्ट्रगीत का दर्जा दिया गया है, वे सिर्फ भारत-भूमि की महानता और सौंदर्य का वर्णन करते हैं। इनमें किसी देवी-देवता का जिक्र नहीं है, लेकिन कई मुस्लिम सांसदों और प्रतिनिधियों को इस पर भी ऐतराज है।
भरोसा न हो, तो एआईएमआईएम के आला नेता और सांसद असदुद्दीन ओवैसी के इस बयान पर नजर डाल देखिए। वह फरमाते हैं- ‘आप यकीनन अपने मजहब पर चलिए, सरस्वती वंदना पढ़िए, वंदे मातरम् पढ़िए, मगर किसी को आप फोर्स नहीं कर सकते।’
क्या कमाल है?
हमारा राष्ट्रगीत, जो आजादी के दीवानों का भावनात्मक संबल हुआ करता था, विवाद के घेरे में है।
क्या अमृतकाल के दौरान आर्थिक महाशक्ति बनने का स्वप्न संजोए भारत के लिए यह विवाद नितांत अनावश्यक नहीं है? अगर हमें आगे बढ़ना है, तो इस तरह के बनावटी प्रतिरोधों पर काबू पाना सीखना ही होगा। पर यह हो कैसे? राजनीति और धर्म की खिचड़ी ऐसी अनावश्यक कलह जनने से बाज नहीं आने वाली।
आज जब इस महान गीत की संरचना की 150वीं जयंती मनाई जा रही है, तब इस मौके पर हम भारतीयों को इस गीत के मूल भावों को समझने की कोशिश करनी चाहिए। सरकार ने भी इसीलिए 8-9 दिसंबर को संसदीय कार्यवाही के 10 मूल्यवान घंटे राष्ट्रगीत पर चर्चा के लिए मुकर्रर किए हैं। क्या हमारे माननीय सांसद इस मौके का इस्तेमाल कर इस घातक विवाद पर सदा-सर्वदा के लिए पूर्ण-विराम लगा सकेंगे?
@shekharkahin
@shashishekhar.journalist

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