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2 जुलाई, 2020|11:31|IST

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सिक्किम सीमा पर तनाव

सिक्किम में पिछले कुछ दिनों में चीन ने जो रवैया अपनाया है, वह चौंकाने वाला है। सिक्किम में भारत-चीन सीमा पर दोनों देशों के दावे हमेशा से अलग-अलग रहे हैं, इसके अलावा एक सच यह भी है कि सिक्किम के भारत में विलय को चीन ने कभी स्वीकार नहीं किया। बावजूद इसके कि यह विलय पूरी तरह लोकतांत्रिक प्रक्रिया से हुआ था। सिक्किम की जनता का बहुत बड़ा बहुमत इस विलय के पक्ष में था। इसके साथ ही एक बड़ा सच यह भी है कि इस इलाके में भारत-चीन सीमा सबसे शांत सीमाओं में शामिल रही है। अभी चंद रोज पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि यह ऐसी सीमा है, जहां पिछले कई बरस में एक भी गोली नहीं चली। फिर अचानक क्या हुआ कि इस सीमा पर तनाव दिखने लगा? तनाव के पहले संकेत तब दिखे, जब यह खबर आई कि चीन ने नाथुला दर्रे के रास्ते से कैलाश- मानसरोवर जा रहे तीर्थयात्रियों के जत्थों को रोक दिया है। पहले कहा गया कि भारी बारिश से रास्ता खराब हो गया है, इसलिए उन्हें चीन में प्रवेश की इजाजत नहीं दी गई। इस बात की पोल खुली, तो दूसरा तर्क आ गया कि भारतीय सेना नियंत्रण रेखा पार करके चीन में घुस आई, इसलिए यात्रा को रोक दिया गया। तभी खबर आई कि चीन सेना ने डोका ला इलाके में हमला बोलकर भारतीय सेना के दो बंकर तोड़ दिए हैं। भारतीय सेना के चीन प्रवेश के सुबूत तो नहीं मिले, लेकिन चीनी सेना के भारत प्रवेश के ये सुबूत बहुत स्पष्ट हैं।

अब रक्षा विशेषज्ञ विभिन्न घटनाओं के तार जोड़कर यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि यह क्यों हुआ? एक तो इसे दलाई लामा की अरुणाचल यात्रा से जोड़कर देखा जा रहा है। दलाई लामा जब अरुणाचल यात्रा पर गए थे, तब चीन ने न सिर्फ इसका विरोध किया था, बल्कि यह भी कहा था कि भारत को इसके नतीजे भुगतने होंगे। हमें पता नहीं है कि ‘नतीजे’ से चीन का क्या अभिप्राय था? पर अगर ताजा तनाव को दलाई लामा के दौरे से जोड़ा भी जाए, तो सवाल यह है कि चीन ने उनकी यात्रा के इतने दिनों बाद यह समय क्यों चुना? इस तनाव को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा से भी जोड़कर देखा जा रहा है। विदेश नीति के ज्यादातर विशेषज्ञ मानते हैं कि कुछ दूसरे मुद्दों के साथ ही भारत और अमेरिका के बीच चीन एक ऐसा मुद्दा है, जिस पर दोनों देशों के हित आपस में मिलते हैं। न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप में भारत के शामिल होने से लेकर पाकिस्तान में बैठे बड़े आतंकियों के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई जैसे मुद्दों पर अमेरिका जहां भारत का समर्थन कर रहा है, वहीं चीन खुलकर इन मामलों में भारत का रास्ता रोके हुए है। संभव है कि ताजा घटनाओं से चीन दुनिया को यह संदेश देना चाहता हो कि भारत और चीन के बीच रिश्ते पहले ही तनावपूर्ण हैं। वैसे कुछ लोग यह भी मानते हैं कि यह तनाव किसी गलतफहमी की वजह से हो सकता है, जो कठिन भौगोलिक इलाकों वाली सीमाओं पर अक्सर हो जाती है।

सच कुछ भी हो, तनाव अभी इतना नहीं बढ़ा कि हम यह मान लें कि अब वापसी संभव नहीं है। यह तनाव किसी गलतफहमी की वजह से हुआ हो या गलत नीयत की वजह से, दोनों ही स्थितियों में पहली जरूरत यही है कि दोनों देश इस मुद्दे पर आपसी संवाद कायम करें। चीन कम से कम पाकिस्तान तो नहीं ही है, जिसके साथ संवाद का आपसी तनाव पर अक्सर कुछ भी असर नहीं दिखता। भारत और चीन के बीच ऐसे तनावों का एक इतिहास रहा है और दोनों देश इतने परिपक्व हैं कि वे इससे आसानी से निपट भी लेते हैं। बावजूद इसके कि दोनों देशों की सीमा समस्या का समाधान आसान नहीं, शांति बहाल करना इतना कठिन भी नहीं।