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त्वरित टिप्पणी: आशा और विश्वास के उफान से उपजी महाविजय

Hindustan Editor Shashi Shekhar

मुझे इस समय जयशंकर प्रसाद के एक नाटक के कुछ संवाद याद आ रहे हैं। चंद्रगुप्त मौर्य से सैनिक पूछता है कि शिविर आज कहां रहेगा देव? चंद्रगुप्त जवाब देता है- ‘अश्व की पीठ पर।’ नरेंद्र मोदी की इस छप्परफाड़ जीत के पीछे भी ऐसे ही अनथक परिश्रम की कहानी है। 

नरेंद्र मोदी के गुजरे पांच साल के कार्यकाल को देखिए। ऐसा नहीं है कि उनके सारे चुनावी वायदे पूरे हुए, फिर भी इस देश की जनता ने उन्हें दोबारा सिर-माथे पर बैठाया। वजह? वह देश के करोड़ों लोगों को समझाने में कामयाब हो गए कि वह उनकी भलाई के लिए ईमानदारी से मेहनत कर रहे हैं। बरसों तक सड़ती-गलती रही सरकारी मशीनरी को ढर्रे पर लाने के लिए उन्हें एक और कार्यकाल की दरकार है। इंदिरा गांधी के बाद अपनी जीत दोहराने वाले वे देश के पहले प्रधानमंत्री हैं।

इसके साथ ही गुजरे पांच सालों में उनके और उनकी सरकार के ऊपर भ्रष्टाचार का कोई संगीन आरोप नहीं लगा। सिर्फ केंद्र ही क्यों, 16 राज्यों में मौजूद भाजपा गठबंधन की राज्य सरकारें भी ऐसे विवादों से अछूती बनी रहीं। बताने की जरूरत नहीं कि इस देश का आम आदमी अब तक यह देखता आया है कि हमारी बदहाली के अंबार से निकला कोई शख्स हमारे ही वोटों से नेता बनता है, फिर उसके और उसके परिवार की संपत्ति बढ़ती चली जाती है। यह मंजर उसे दुखी करता है। मजबूरी में भले ही वह ऐसे नेताओं का साथ देता रहे, पर मौका मिलते ही वह उनसे मुंह फेर लेता है। बिहार में आरजेडी की अगुवाई वाले गठबंधन की यह दुर्दशा इसीलिए हुई, क्योंकि भ्रष्टाचार के आरोप में उसके सुप्रीमो इस वक्त जेल में हैं।

दलितों-दमितों के उद्धार के लिए अस्तित्व में आई एक पार्टी के बारे में मशहूर है कि उसका टिकट उन्हीं लोगों को मिलता है, जो अधिक से अधिक ‘चढ़ावा’ चढ़ा सकते हैं। यही वजह है कि उनके कुछ पुराने सहयोगियों ने इस बार आरोप लगाया कि उनकी पार्टी के टिकट बिकाऊ हैं। उन्होंने अपने मतदाताओं से छल की दुकान खोल रखी है। नरेंद्र मोदी ऐसे नेताओं से ‘त्राता’ के तौर पर उभरे। भारतीय राजनीति को बरसों बाद ऐसा नेता मिला, जिसमें जातियों के मकड़जाल को तोड़ने की ताकत है। 
नतीजा सामने है। 
मोदी में दूसरी सबसे बड़ी खूबी यह है कि वह देश की विविधता और उसके बहुलतावादी रवैये को जानते हैं। यही वजह है कि चरण-दर-चरण उनके भाषणों का आकार-प्रकार बदलता गया। कुछ लोगों को उनके कुछ भाषणों में शील अथवा मर्यादा का थोड़ा अभाव भले ही नजर आया हो, पर आज यह साबित हो गया कि वह जो कुछ बोल रहे थे, मतदाता उसको गौर से सुन रहा था, स्वीकार कर रहा था। 
अब यह बताने की जरूरत तो नहीं कि वह चुनाव जीतने के लिए मैदान में थे। 

यहां अमित शाह की चर्चा भी जरूरी है। मोदी जो कहते या करते हैं, उससे संगठन का समूचा तालमेल बैठाने का दुरूह काम अमित शाह करते हैं। शाह ने समूची पार्टी को एक ‘इलेक्शन मशीन’ में तब्दील कर दिया है, जो एक चुनाव जीतते ही अगले चुनाव की तैयारी में जुट जाती है। एक बार निजी बातचीत में उन्होंने मुझसे कहा था कि सरकार ने 22 करोड़ से अधिक लोगों को सीधा लाभ पहुंचाया है। मेरे पास आंकड़ा मौजूद है और यह पार्टी का काम है कि जन-जन तक यह बात पहुंचाए। आप निश्चिंत रहिए, हम पहले से भी ज्यादा सीटों के साथ चुनाव जीतेंगे। मैंने उन्हें रोककर पूछा था कि उत्तर प्रदेश में तो अखिलेश और मायावती के मिलने की बेहद संभावनाएं हैं। वे आपका रास्ता क्यों हमवार होने देंगे? शाह का जवाब था कि हमें आज नहीं तो कल 50 फीसदी वोटों पर अपनी पकड़ बनानी पडे़गी। जो लोग गठबंधन करना चाहें, करें, पर हम इस लक्ष्य की प्राप्ति की ओर बढ़ते रहेंगे। 

उस समय उनकी बात मुझे सियासी जुमला लगी थी, पर उन्होंने जो कहा, उसे कर दिखाया है। 
यहां यह भी गौरतलब है कि खुद की बेहतर स्थिति का भान होने के बावजूद भाजपा ने नीतीश कुमार और उद्धव ठाकरे से विनम्रतापूर्वक हाथ मिलाया। इसका अद्भुत लाभ उसे हासिल हुआ। इसके उलट कांग्रेस कारगर गठबंधन बनाने में नाकाम रही। दोष चाहे जिसका भी हो, पर यह तय है कि अगर दिल्ली और उत्तर प्रदेश में ईमानदारी से गठबंधन किए जाते, तो विपक्ष के लिए परिणाम बेहतर होते। 

कांग्रेस ने कुल चार महीने पहले राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में धुआंधार जीत हासिल की थी। वहां पार्टी की दुर्गति चौंकाती है। कांग्रेस केरल के अलावा कहीं भी दहाई का आंकड़ा नहीं छू सकी है। साथ ही अमेठी से राहुल, गुना से ज्योतिरादित्य सिंधिया और गुलबर्गा से मल्लिकार्जुन खड़गे की हार बहुत चिंताजनक सवाल खडे़ करती है। कांग्रेस के कुलजमा नौ पूर्व मुख्यमंत्री भी सीट गंवा बैठे हैं। आने वाले दिनों में पार्टी को कर्नाटक और मध्य प्रदेश की सरकारें बचाने में मशक्कत करनी होगी, जो तय करेगा कि इस दल के नेताओं में कितनी जिजीविषा शेष है। देश की सबसे पुरानी पार्टी के लिए निश्चित तौर पर यह आत्मचिंतन का वक्त है। 

यहां एक और बिंदु पर आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहूंगा। दक्षिण के कुछ राज्यों को छोड़ दें, तो गैर एनडीए क्षेत्रीय दलों का पराभव साफ नजर आता है। हरियाणा के चौटाला, दिल्ली में केजरीवाल, उत्तर प्रदेश में मायावती-अखिलेश, बिहार में तेजस्वी-कुशवाहा, मांझी-पप्पू यादव, असम में बदरुद्दीन अजमल आदि बुरी तरह ढह गए हैं। बंगाल में जिस तरह ममता बनर्जी को झटका लगा है, वह बताता है कि अगले विधानसभा चुनाव में दीदी के सामने गढ़ बचाने का खतरा पैदा हो गया है। यह भी गौरतलब है कि आजादी के बाद पहला अवसर है, जब बंगाल से एक भी वामपंथी सांसद चुनकर नहीं आया है।

यहां उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की चर्चा जरूरी है। कुछ लोग उनके खिलाफ यह कहकर माहौल बनाने में जुटे थे कि प्रदेश सरकार के खिलाफ सत्ता-विरोधी लहर बह रही है, पर था उलटा। केंद्र की कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में उत्तर प्रदेश अव्वल था। गरीबों को घर-शौचालय, किसानों को फसल का उचित खरीद मूल्य और विधि-व्यवस्था पर उनके काम ने गठबंधन की बयार को बहने से पहले रोक दिया। इसी तरह, स्मृति ईरानी ने पांच साल जी-तोड़ मेहनत कर गांधी परिवार के गढ़ अमेठी को जीतने में कामयाबी हासिल की। 

एक बात और। मोदी ने बड़ी समझदारी से इस चुनाव को अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव की तरह लड़ा। इससे क्षेत्रीय दल भरभराकर गिर पडे़ और कांग्रेस इस ‘नैरेटिव’ का जवाब न दे सकी। तय है कि कांग्रेस सहित समूचे विपक्ष को अपनी रीति-नीति पर पुनर्विचार करना होगा। मोदी पहले से अधिक ताकतवर होकर उभरे हैं। अब वह अपने एजेंडा को तेजी से बढ़ाने के लिए स्वतंत्र हैं। ऐसे में, मोदी और और शाह की विस्तारवादी नीति से ये दल पुराने राजनीतिक औजारों से नहीं निपट सकते। 

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