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एक अनमोल विरासत की विदाई वेला

shashi shekhar

जब वक्त हर रोज हादसे और अनहोनियां गढ़ने पर आमादा हो, तो खबरें जानकारियां देने की जगह मायूस करती हैं, डराती हैं और कभी-कभी कंपकंपाती भी हैं। आज जिस विषय पर लिखने जा रहा हूं, उससे देश और दुनिया को कोई फर्क भले न पड़ता हो, मगर मेरा मन द्रवित है। कठुआती भावनाओं के इस विरल वक्त में ऐसा कम होता है।

समाचार पुरगर्म है कि स्वर्गीय राज कपूर के बेटों ने आरके स्टूडियो को बेचने का फैसला कर लिया है। उनका कहना है कि स्टूडियो अब घाटे का सौदा बन गया है। पिछले वर्ष एक रियलिटी शो की शूटिंग के दौरान यहां आग लग गई थी, जिससे इसे खासा नुकसान उठाना पड़ा। यदि स्टूडियो के आधुनिकीकरण पर पैसा खर्च किया जाए, तब भी कई और दिक्कतें पेश आती हैं, मसलन यहां पार्किंग के लिए पर्याप्त जगह नहीं और चारों ओर आबादी हो जाने के कारण स्टूडियो के क्षेत्रफल का विस्तार नामुमकिन है। यह काल का  चलन है, ‘जो फरा-सो झरा’, पर कहावतें संवेदनाओं को आहत होने से कहां रोक पाती हैं?
 
इस स्टूडियो से आजाद हिन्दुस्तान की दो पीढ़ियों का गहरा वास्ता है। अपने परिवार से बात शुरू करता हूं। मैंने और मेरे पिता ने उम्र के खास मुकाम पर आवारा  देखी थी। जब यह फिल्म रिलीज हुई, तब मेरे पिता बीए के छात्र थे और इसने उन पर गहरा प्रभाव डाला था। संयोगवश, जब मैं बीए में आया, तब आगरा के एक टॉकीज में सिर्फ हफ्ते भर के लिए आवारा  लगी। मैंने लपककर उसका पहला शो देखा और आज तक स्मृतियों के महासागर में हम तुझसे मोहब्बत करके सनम, हंसते भी रहे, रोते भी रहे के राज कपूर जस का तस ताजा हैं। 

गाने की शुरुआत में उभरता बैकग्राउंड म्यूजिक और एक पेड़ के तने में घुसा हुआ चाकू। उसे खींचती हुई इंसानी मुट्ठी और अगले क्षण आंखों में गजब की बेचैनी के साथ उभरता राज कपूर का गमगीन चेहरा। वह गाना शुरू करते हैं, लेकिन दूसरे पेड़ के तने पर हीरोइन का नाम ‘रीटा’ खुदा हुआ देखकर और बेकरार हो पड़ते हैं। अनजाने में रामपुरी चाकू उसके आखिरी शब्द को गहरा करने लग जाता है, जैसे वह तना नहीं, दिल का दर्द खुरच रहा हो। पृष्ठभूमि से शब्द हमारे कानों में टकराते हैं- ऐ दिल की लगी क्या तुझको खबर, एक दर्द उठा भर आई नजर। ये गाना जैसे-जैसे अवसान की ओर बढ़ता है, बदहवास नरगिस पीछे से आती दीखती हैं और गाने के खत्म होते-होते वह राजकपूर के पीछे आ खड़ी होती हैं। तब तक रोशनियां धुंधला चुकी थीं। अनिर्णीत अंधेरे और हवा के आवारा झोंकों ने समूचे वातावरण को अपने आगोश में ले लिया था। कैमरा, संगीत, गीत और अभिनय का वह ऐसा नायाब संगम था कि हॉल में बैठे एक-एक दर्शक के दिल में दर्द का बदहवास गुबार हिलोरें लेने लगा था। 

राज कपूर की फिल्मों के दर्जनों दृश्य मेरे दिमाग की हार्ड डिस्क पर जस के तस दर्ज हैं। इनमें से अधिकांश की संरचना में आरके स्टूडियो में स्थित कृष्णा कॉटेज का जबरदस्त योगदान था। तय है कि इसी सरजमीं ने राजकपूर को अमरत्व गढ़ने के लिए प्रेरित किया, ऊर्जा दी और आगे बढ़ाया। इसी कॉटेज में जमाने की सबसे मशहूर हीरोइनों के साथ हिंदी सिनेमा की सर्वाधिक रसीली प्रेम-कथाओं ने जन्म लिया। इसी आरके स्टूडियो में हर गणेश चतुर्थी को रंग बरसते थे और होली पर मदिरा मस्ती। फिल्म उद्योग की नामचीन शख्सियतें इन जलसों में निमंत्रण के लिए इंतजार किया करती थीं, पर यह मानना भूल होगी कि आरके स्टूडियो राज कपूर की क्रीड़ा स्थली थी।
 
इसके उलट यह एक ऐसा गुरुकुल था, जहां हिंदी सिनेमा ने नई अंगड़ाइयां लीं और खुद को विश्वस्तरीय बनाने की ताकत हासिल की। ‘मेरा जूता है जापानी’ या ‘आवारा हूं’ की ख्याति आज तक अंतरराष्ट्रीय पटल पर बनी हुई है। यह जमीन एक इंसान, एक टीम, एक पीढ़ी और एक रूमानी समाज की साझा परिकल्पना की गवाह है। राज कपूर से उनकी टीम हो या दर्शक अगर एक बार जुडे़, तो फिर जुडे़ ही रहते। उनकी टीम के लोग कभी रूठ जाते, तब भी उनसे अपना जुड़ाव खत्म न कर पाते। इस दरो-दीवार से राज कपूर का नाता इतना गहरा था कि पत्नी कृष्णा तक उससे रश्क करतीं।  

राज कपूर और यह स्टूडियो एक-दूसरे के प्रतिरूप बन गए थे। यहीं वह अनाड़ी से छलिया बने और जीवन के रहस्यपूर्ण सत्यम्, शिवम्, सुंदरम् को सबके लिए सहज, सरल और सुगम बनाने की कोशिश की। वह मसीहा न थे, न संत अथवा परमज्ञानी। अपनी कमजोरियों, बीमारियों और दुश्वारियों के साथ वह बस इस स्टूडियो में हाजिर-नाजिर थे। यही उनका जीवन, यही उनकी यात्रा और यही उनका मुकाम था। रंग और चेहरे बदलती इस दुनिया में भला अजर-अमर क्या हो सकता है, पर आरके और उनके स्टूडियो ने ऐसा कर दिखाया। उसके बिकने की खबर इसीलिए मायूस करती है। 

यहां बरसों पहले बॉन की वह बेहद खुशनुमा सुबह याद आ रही है, जब भारत की एक मशहूर नृत्यांगना के साथ नाइन्थ सिंफनी के रचयिता बीथोविन का आवास देखते वक्त मन में उभरा था कि हम भारतीय अपने कलाकारों की यादों को संजोते क्यों नहीं? आज बरसों बाद आरके स्टूडियो के बिकने की खबर ने यह हूक दोबारा पैदा कर दी है। यकीनन, 2017 की आग ने भी बहुत कहर ढाया था। मेरा नाम जोकर का मुखौटा, भारतीय सिने संगीत के कई अमर गीतों में प्रयोग किया गया प्यानो, बॉबी  में डिंपल की ड्रेस और इसके साथ बहुत कुछ खाक हो गया, पर वह आग आरके स्टूडियो को नहीं जला पाई थी। उसके बाद भी चैंबूर से गुजरते वक्त लोग टैक्सी ड्राइवर से कहते, ‘आरके स्टूडियो आए, तो बता देना।’ जो काम आग न कर सकी, वह वक्त क्यों कर रहा है?

हम कब समझेंगे कि इस विरासत को संजोना सिर्फ उनके बेटों नहीं, बल्कि हिन्दुस्तानी सिनेमा और सरकार, दोनों का दायित्व है। राज कपूर होते, तो इन हालात में अपने मशहूर अंदाज में  यकीनन इससे मिलता-जुलता कुछ कह उठते- ‘हम हिन्दुस्तानियों को विरासत संजोने की आदत नहीं है मिसेज डीसा।’

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  • Web Title:Shashi Shekhar column Aajkal in Hindustan on 02 september on rk studio