इंसानी जंगल में शिकारियों का हांका
हम ऐसे विरल वक्त से गुजर रहे हैं, जहां शिकारी खुद शिकार और तमाशाई खुद तमाशा बन रहे हैं। वैचारिक कुहासे के इस दौर में भारतीय समाज को गहरे आत्ममंथन की जरूरत है, क्योंकि लम्हों की खताएं अक्सर सदियों की...

हम ऐसे विरल वक्त से गुजर रहे हैं, जहां शिकारी खुद शिकार और तमाशाई खुद तमाशा बन रहे हैं। वैचारिक कुहासे के इस दौर में भारतीय समाज को गहरे आत्ममंथन की जरूरत है, क्योंकि लम्हों की खताएं अक्सर सदियों की सजा मुकर्रर करती हैं।
गौरी लंकेश से चर्चा शुरू करता हूं।
मैं चाहता, तो पिछले हफ्ते इस मुद्दे पर लिख सकता था, पर जान-बूझकर चुप्पी लगा गया। एक विचारशील व्यक्ति की हत्या पर जिस तरह कुतर्क के जाल बुने जा रहे थे, मैं उन्हें किसी मुकाम तक पहुंचते देखना चाहता था, पर ऐसा हुआ कहां? अभी तक बुद्धू बक्से (किसी ने टेलीविजन को क्या खूब उपमा दी है) पर ऊटपटांग बहस के दौर जारी हैं। पहली बार पत्रकार ऐसी तू-तू, मैं-मैं में उलझे हैं कि एक साथी की मौत साझी पीड़ा बनने की बजाय वैचारिक प्रभुता की लड़ाई में तब्दील हो गई है। इस दलदल में महज पत्रकार नहीं, बल्कि विचारक, लेखक अथवा अभिनेता तक शामिल हो गए हैं।
कौन कहता है कि हम हिन्दुस्तानियों को महाभारत के लिए किसी कुरुक्षेत्र की जरूरत पड़ती है?
चार्ली चैपलिन ने कभी कहा था- ‘जिंदगी को करीब से देखा जाए, तो यह एक त्रासदी है, लेकिन दूर से देखने पर यह कॉमेडी है।’ वे आज सही साबित हो रहे हैं। जो लोग कल तक चाशनी भरे शब्दों में खुद को कालजयी विचारक साबित करने की कोशिश करते रहे थे, वे आज कीचड़ में लिथडे़ पडे़ हैं। वजह? कुछ ने अपने नकाब खुद उतार दिए हैं, तो कुछ के आलोचकों ने नोच फेंके हैं। उछलती पगड़ियों का यह दौर डरावनी आशंकाएं रच रहा है।
सच की मृत्यु की घोषणाएं करने वालों के लिए यह ठहाका लगाने का वक्त है।
इसमें कोई दो राय नहीं कि गौरी लंकेश कुछ भी लिखती, खाती या बोलती रही हों, उनकी हत्या नहीं होनी चाहिए थी। आजादी की हीरक-जयंती की ओर बढ़ते भारत के नागरिकों को यह विश्वास कायम रखना चाहिए कि संविधान हमें बोलने और लिखने की आजादी देता है। जो लोग इसकी अवमानना करते हैं, उनके लिए उपयुक्त दंड भी तय है।
यहां याद आया, पत्रकारों की सुरक्षा के मामले में अफगानिस्तान तक को हमसे बेहतर पाया गया है। ‘कमिटी टु प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट’ के अध्ययन के अनुसार, पत्रकारों के लिए हिन्दुस्तान सातवां सर्वाधिक जोखिमपूर्ण देश है। जो मुल्क खुद को आर्थिक महाशक्ति बनाने का सपना संजोए हो, उसके लिए यह शुभ संकेत नहीं। इसीलिए मुझ जैसे लाखों लोग, जिन्होंने इस हादसे से पहले गौरी का नाम तक नहीं सुना था, आहत हैं, पर इसका यह मतलब नहीं कि हम खुद मुंसिफ बन मनमाने फैसला सुनाने लग जाएं।
स्वस्थ लोकतंत्र में जांच एजेंसियों को अपना काम करने की मोहलत देनी चाहिए। व्यर्थ का शोर-शराबा उन पर प्रतिकूल मानसिक दबाव डालता है। सोशल मीडिया पर हाहाकार मचाते लोग यह क्यों नहीं सोचते कि उनकी फतवेबाजी भी संविधान की मूल भावना के उतने ही खिलाफ है, जितनी कि खून-खराबे की कार्रवाई। गौरी के हत्यारों ने दैहिक हिंसा की, मगर आप सोशल मीडिया पर जो वैचारिक हिंसा कर रहे हैं, वह ऐसा अभिलेख है, जो हमेशा डिजिटल दुनिया में कायम रहेगा।
ऐसे शब्दबली दूसरों पर सवाल उछालने की बजाय खुद से क्यों नहीं पूछते कि उनके बेतुके तर्क पढ़-देखकर दुनिया भर के लोग क्या समझेंगे? आने वाली पीढ़ियों पर इसका क्या असर पडे़गा?
यहां यह भी गौरतलब है कि गौरी लंकेश एक निश्चित विचारधारा से जुड़ी थीं, इसीलिए उनकी हत्या पर इतने सारे लोग छातियां कूटने के लिए आ जुटे। उनका क्या, जो चुपचाप पत्रकारिता धर्म यानी तटस्थता का निर्वाह कर रहे हैं? वे महानगरों के महफूज वातावरण में नहीं रहते। इलाकाई हुकूमतें, हाकिम, दबंग और दुश्वारियां उनका हर पल रास्ता रोकती हैं। वे मारे जाते हैं, पर डटे रहते हैं। हमारे सहयोगी राजदेव रंजन भी उन्हीं में से एक थे। लगभग सवा साल पहले ‘हिन्दुस्तान’ के सीवान कार्यालय से घर जाते समय बीच-बाजार सरेशाम उनकी हत्या कर दी गई थी।
हमारे लिए वह विपदा की घड़ी थी। एक साथी का शव अस्पताल में पड़ा था। उनके दो नाबालिग बच्चे और पत्नी दुर्भाग्य के भंवर में फंस गए थे, जिससे उन्हें बाहर निकालना था। हत्यारों को इंसाफ की दहलीज तक पहुंचाना था। इन सबके साथ अगले दिन का अखबार भी छापना था। हम जानते थे कि हत्या की साजिश रचने वाला माफिया राजदेव के खून से लोगों का ध्यान भटकाने के लिए उनकी चारित्रिक हत्या की कोशिश करेगा, इसीलिए ‘हिन्दुस्तान’ के साथियों ने तय किया कि हम उनकी मौत को तमाशा नहीं बनने देंगे।
यही वजह है कि उनके हत्यारे आज जेल में हैं। राजदेव की पत्नी आशादेवी रंजन गांव के पास मौजूद एक सरकारी स्कूल में पढ़ाती हैं और उनके बेटे की सुरक्षित स्थान पर पढ़ाई का जिम्मा हिन्दुस्तान मीडिया वेंचर्स लिमिटेड ने उठा रखा है। यह ठीक है कि बिहार पुलिस ने कार्रवाई में कसर नहीं छोड़ी और बाद में सीबीआई ने चार्जशीट भी दाखिल कर दी, पर सरकार चाहती, तो आशादेवी को स्थाई कर सकती थी। उन्हें सरकारी खजाने से आर्थिक मदद भी दी जा सकती थी। आंचलिक पत्रकारिता की यही हतभागिता है। दिल्ली-मुंबई के चैनलों में गला फाड़ते लोगों की नजरें उन पर नहीं जातीं। ‘इस’ या ‘उस’ की ओर से आवाज बुलंद करने वाले लोग इस मुद्दे पर चुप रहते हैं। रही बात सरकारों की, तो वे हमेशा से अपनी गढ़ी लीक पर चलती आई हैं।
दुर्भाग्य से प्रताड़ना के शिकार 99 फीसदी से अधिक पत्रकार ऐसे ही कस्बों और छोटे शहरों से आते हैं। सरकार उन्हें प्रश्रय नहीं देती और अगर वे किसी विचारधारा से नहीं जुडे़ हैं, तो उन पर पड़ी आफतें अनकही-अनसुनी रह जाती हैं। क्या यह स्थिति स्वतंत्र पत्रकारिता के हक में है? जो समाज अपनी आवाज के लिए उनसे उम्मीद करता है, वह भी वक्त पड़ने पर चुप्पी लगा जाता है। क्या पत्रकारों की सुरक्षा सामाजिक दायित्व नहीं है? खुद और अपने परिजनों को सुरक्षित रखने की आकांक्षा रखने वाले कम से कम इस सवाल पर जरूर गौर फरमाएं कि प्रतिरोध के मामले में हम इतने ‘सेलेक्टिव’ क्यों हैं?
मामला महज पत्रकारों तक सीमित नहीं है। गुरुग्राम के रेयान स्कूल में बच्चे की हत्या हुई, जिससे दिल्ली से लेकर मुंबई तक हिल गई। उसके अगले ही दिन पूर्वी दिल्ली के एक दोयम दर्जे के स्कूल में पांच साल की बच्ची चौकीदार की हवस का शिकार बन गई, लेकिन कोई हो-हल्ला नहीं मचा। ठीक वैसे ही, जैसे गौरी लंकेश पर गमजदा लोग राजदेव जैसों की हत्या पर चुप रहे। प्रतिरोध भी अगर वर्गवाद का शिकार हो जाए, तो डर जाना चाहिए। ऐसे माहौल में शोर मचवाने वाले तो
महफूज रहते हैं, पर मारे वे जाते हैं, जो कोरस में शामिल होते हैं।
सोशल मीडिया के अधिकांश रणबांकुरे इन्हीं बदकिस्मत लोगों की जमात से आते हैं। वे समझते क्यों नहीं कि इंसानों के जंगल का यह हांका उनके और उनके अपनों के खिलाफ है?
@shekharkahin
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