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20 फरवरी, 2020|10:13|IST

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महाशक्ति की राह पर हम

शशि शेखर

क्या अपनी आजादी की 75वीं वर्षगांठ की ओर बढ़ते हुए भारत ने ‘महाशक्ति’ की तरह बर्ताव करना सीख लिया है? पिछले कुछ महीनों का घटनाक्रम तो यही इशारा करता है। आप समझ गए होंगे, मेरा आशय डोका ला की उठा-पटक से है। 

डोका ला मामले में हिन्दुस्तानी हुकूमत ने बल और बुद्धि का बेहद संतुलित प्रयोग किया। आपको याद होंगे वे दो वीडियो। पहला था डोका ला का, जिसमें भारतीय सैनिक घुसपैठिए लाल सैनिकों को पीछे धकेलते दिख रहे हैं। दूसरा, लद्दाख की पैंगोंग झील का, जिसमें मारपीट साफ दिख रही थी। एक-दूसरे पर पत्थर और लात-घूंसे बरसाते सैनिक जैसे मल्ल-युद्ध में व्यस्त थे। चीन से लगी सीमा पर अतीत में ऐसा होता रहा है, पर यह पहला मौका था, जब बहुत जल्द ये वीडियो घर-घर देखे जाने लगे। 

जहां ये झड़पें हुईं, वहां आम पर्यटक नहीं जा सकते और दूर-दूर तक कोई गांव भी नहीं है। फिर इन्हें किसने ‘शूट’ किया, क्यों ‘वायरल’ किया? इस सवाल का जवाब रहस्य के अंधेरे में है, पर इनसे जाने-अनजाने एक बड़ा मकसद सध गया। देश के आम आदमी में भरोसा जग पड़ा कि हमारे सुरक्षा बल किसी से कम नहीं हैं, जरूरत पड़ने पर वे चीनियों तक को खदेड़ सकते हैं। 

यह भारत की सामरिक नीति में बदलाव का स्पष्ट संकेत है। 
ऐसा कहने का सबसे बड़ा कारण यह है कि पहले भी वीडियो बने और फोटो खींचे गए, पर वे कभी सार्वजनिक नहीं हुए। इनका प्रयोग प्रशिक्षण, रणनीति-निर्धारण अथवा कूटनीतिक कुश्ती में होता था, पर इस बार इन्होंने देश के स्वाभिमान को सहलाने का काम किया। चीन ने जब 1962 में अपनी ओर से युद्ध विराम किया था, तब तक जैसे समूचा देश पराजय मान चुका था। पराजय का यह बोध भारतीय आत्मसम्मान के लिए 55 साल से टीस बना हुआ था। जो लोग देश के संसदीय इतिहास की जानकारी रखते हैं, उन्हें लगातार मलाल रहा कि उस शर्मनाक पराजय के बाद हमारी संसद ने एक स्वर में कसम खाई थी कि हम चीन द्वारा कब्जाई गई एक-एक इंच जमीन वापस लेकर रहेंगे। यह संकल्प पूरा होना तो दूर की कौड़ी बना रहा, उल्टे चीन हमें आए दिन आंखें दिखाता रहा।

गौरतलब है कि भारत अपना चोला बदल रहा था, पर चीन पुराने ढर्रे पर कायम था। पहले घुसपैठ और फिर बीजिंग की गीदड़ भभकियां! कभी उसका रक्षा मंत्रालय कहता कि भारत 1962 को याद कर ले, तो उसकाविदेश मंत्रालय जुगलबंदी करता कि जैसे भारतीय फौज डोका ला में घुस आई, वैसे अगर हम नेपाल में जा बैठें, तो क्या होगा? उन्होंने चुनौतियों और चेतावनियों की झड़ी लगा रखी थी। सनसनी पसंद भारतीयों के लिए बारिश की शीतल बौछारों के बीच यह दूसरा रोमांच था। दो वीडियो क्लिप उनके आशंका-मर्ज की कारगर दवा जो बन चुके थे।

इस उठा-पटक के दौर में भी भारतीय सत्ता प्रतिष्ठान संयम से काम लेता रहा। रक्षा मंत्री अरुण जेटली का चीन को संक्षिप्त और सारगर्भित उत्तर था कि भारत अब 1962 जैसा नहीं रहा। कुछ दिन बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि हम हर समस्या का समाधान बातचीत के जरिए करने के हामी हैं। एक तरफ हमारे फौजी भूटान की धरती पर जबरन सड़क बनाकर खतरा पैदा करने के प्रयासों को ताकत और हिम्मत के साथ रोक रहे थे, तो दूसरी तरफ सरकार नपी-तुली भाषा का इस्तेमाल कर रही थी। यही वजह है कि विश्व जनमत चीन के खिलाफ होता चला गया और अंतत: चीन को वहां सड़क बनाने की जिद छोड़नी पड़ी। भारतीय फौजी भी वायदे के अनुसार वापस अपने शिविरों में आ गए। 

कमाल! चीन ने इसके बाद भी सीनाजोरी की कोशिश की। उसने सड़क निर्माण पर तो चुप्पी साध ली, लेकिन भारतीय सैनिकों की वापसी की प्रक्रिया को वह तूल देने का प्रयास करने लगा। उसका यह बयान कि हमारे सैनिक उस इलाके में गश्त करते रहेंगे, यह जताने की कोशिश थी कि वे वहां डटे हुए हैं, जबकि हिन्दुस्तान को पीछे हटना पड़ा है। यह बात अलग है कि उन्हें वहां गश्त करने से कोई रोक नहीं रहा था। डोका ला के विवादित भूभाग में चीनी, भारतीय और भूटानी फौजी बरसों से गश्त करते रहे हैं। सारा झगड़ा सड़क निर्माण पर था, जिस पर उन्हें अपने कदम वापस खींचने पड़े। इस पर विवाद कहां था? सवाल उठता है कि बिला वजह चीन क्यों गलतफहमी फैलाने की कोशिश कर रहा था? बता दूं। राष्ट्रपति शी जिनपिंग आर्थिक मोर्चों पर पहले जितने सफल नहीं हो रहे हैं, उनकी लोकप्रियता का ग्राफ गिर रहा है और सेना से उनके रिश्तों पर पाला पड़ता जा रहा है। उनकी हुकूमत ऐसे बयानों के जरिए आम चीनी जन को सांत्वना दे रही थी कि सब चंगा है। क्या वाकई?

कुछ लोगों का मानना है कि चीन अपने महत्वाकांक्षी ‘ओबोर’ प्रोजेक्ट की असफलता के बाद ब्रिक्स से भारत की गैर-मौजूदगी बर्दाश्त नहीं कर सकता। इससे उसके आर्थिक हितों को गहरी चोट पहुंचने की आशंका थी, इसीलिए वह समय रहते संभल गया। पूरी संभावना है कि भारत के नीति-नियंताओं ने इस नजाकत को पहले से भांपकर सर्द-गर्म कदम उठाए हों। सफल हुकूमतें सीमा पर दस्ते उतारने से पहले कूटनीति के मोर्चों की समस्त संभावनाएं तलाश लेती हैं। नई दिल्ली ने ऐसा ही किया। 

प्रधानमंत्री मोदी आज बीजिंग में हैं। बदले माहौल में यकीनन वह अधिक आत्मविश्वास के साथ अपने चीनी समकक्ष से रू-ब-रू होंगे। उम्मीद है, दोनों देश अमन-चैन और खुशहाली को वरीयता देंगे। चाणक्य ने गलत तो नहीं कहा था कि हम सब बदल सकते हैं, पर अपना पड़ोस नहीं। सतर्कता, समझ और सहयोग ही पड़ोसियों के लिए सर्वश्रेष्ठ नीति होती है। चीन को वक्त रहते इसे समझ लेना चाहिए। भारत में उसकी कंपनियां कारोबार करती हैं। अगर जनमानस खिलाफ हो गया, तो उनका माल कौन खरीदेगा?

यहां यह मान बैठना भूल होगी कि पूर्ववर्ती सरकारों ने सीमा की रक्षा के लिए कुछ नहीं किया। 1967 में नाथू ला के समीप हुई झड़प में हिन्दुस्तानियों ने तीन सौ से अधिक चीनी फौजियों को ढेर कर दिया, पर आमजन को इसकी भनक तक नहीं लगने दी गई थी। 1999 में कारगिल के संघर्ष को युद्ध घोषित करने में भी अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार को लंबा वक्त लगा। वे कूटनीति के संकोच भरे दिन हुआ करते थे। 

नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली मौजूदा सरकार ने उस नीति को जैसे अलविदा कह दिया है। म्यांमार में आतंकवादियों के खिलाफ की गई कार्रवाई हो या पाकिस्तान के विरुद्ध ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ अथवा चीनी सैनिकों से झड़पें, हर बार नई दिल्ली ने इसके खुलासे से संकोच नहीं किया। अब तक अमेरिका और उसके कुछ मित्र देश ऐसा करते आए हैं। पिछले कुछ महीनों के दौरान नई दिल्ली ने जिस नए आचार-व्यवहार का प्रदर्शन किया है, इसका खैर-मकदम करें। यह नए उपजे आत्मविश्वास का प्रतीक है।

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