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शशि शेखर

आज हम भारतीय राजनीति में दबे पांव दाखिल हो रहे एक नए चलन पर बात करेंगे। ऐसा पहली बार हो रहा है, जब नितांत क्षेत्रीय दलों के अधिपति अपने सुरक्षित आश्रयों से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति में प्रासंगिकता साबित करने में जुटे हैं। 

अगर ऐसा न होता, तो उद्धव ठाकरे अयोध्या आकर राम मंदिर के पक्ष में दहाड़ लगाते नहीं दिख रहे होते। इस खर्चीले आयोजन की परिकल्पना के वक्त यकीनन वह जानते थे कि राम मंदिर का निर्माण अकेले शिव सेना के वश की बात नहीं। शिव सेना के कर्णधार इस तथ्य से भी कैसे अनजान हो सकते हैं कि महाराष्ट्र के बाहर उनकी पार्टी का सार्थक वजूद कहीं नहीं है? इसके बावजूद उन्होंने सैकड़ों किलोमीटर दूर बसी इस धर्मनगरी का रुख महज इसलिए किया, ताकि महाराष्ट्र के मतदाताओं तक संदेश पहुंच सके कि सिर्फ हम ही हिंदुत्व के ध्वजावाहक हैं। ऐसा नहीं है कि ‘सेना’ ने पहली बार यह दावा किया हो। आपको याद होगा, मातोश्री में विराजे बाल ठाकरे कहा करते थे कि बाबरी मस्जिद के ध्वंस में मेरा और मेरे कार्यकर्ताओं का बड़ा योगदान है, पर यह पुरानी बात हो गई। अब हिंदुत्व और मराठी स्वाभिमान के मुद्दे पर उनकी जूनियर पार्टनर रही भाजपा ने उनसे कहीं अधिक कब्जा जमा लिया है। 

उद्धव ठाकरे को यकीनन इस बात का अफसोस होगा कि यह उलट-फेर उनके सामने हुआ। वह जानते हैं कि अगले वर्ष होने वाले चुनावों में इसे दुरुस्त करने का वक्त अगर गंवा दिया, तो फिर भाजपा हाथ नहीं आने वाली। उससे जूझने का अकेला तरीका यही है कि शिव सेना एक बार फिर साबित करे कि दम-खम के मामले में अभी तक महाराष्ट्र में उसका कोई तोड़ नहीं है। यही वजह है कि उद्धव परिवार सहित अयोध्या आए और राम मंदिर पर अपनी सहयोगी पार्टी को खरी-खोटी सुना गए। उनसे पहले पार्टी के तेज-तर्रार सांसद संजय राउत यह कहकर सनसनी फैला चुके थे कि शिव सैनिकों ने 17 मिनट में मस्जिद के ढांचे को ढहा दिया। एजेंडा सेट करने का शिव सेना का यह तरीका पुराना है। 

यहां एक और बात गौरतलब है। क्षेत्रीय पार्टियों ने अब तक राष्ट्रीय दलों का इस्तेमाल कर सिर्फ अपना विस्तार किया है। उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा ने इस दांव से कांग्रेस का समूचा वोट बैंक चट कर लिया था। वे ही नहीं, कश्मीर से कन्याकुमारी तक तमाम इलाकाई दलों ने इस महामंत्र का इस्तेमाल किया। चंद्रबाबू नायडू ने तो कांग्रेस और भाजपा, दोनों को काबू में रखने में सफलता अर्जित की, पर उद्धव मात खा गए। वह अब भूल सुधार की मुद्रा में हैं। यही वजह है कि अयोध्या में उन्होंने एक और पासा प्रवासियों पर फेंका कि महाराष्ट्र में आपका स्वागत है। शिव सेना जानती है कि महाराष्ट्र में प्रवासियों की संख्या इतनी बढ़ गई है कि अब वे भी एक ‘वोट बैंक’ बन गए हैं। ‘सेना’ की यह नई समझ चुनावों में उसे कितनी व्यापकता प्रदान करेगी, यह देखना दिलचस्प होगा।

मराठा क्षत्रप शरद पवार, तेलुगू राजनीतिज्ञ चंद्रबाबू नायडू, उमर अब्दुल्ला, ममता बनर्जी आदि की सरगोशियां भी यही साबित करती हैं। इन वरिष्ठ नेताओं का प्रभाव क्षेत्र सिर्फ अपने-अपने प्रदेश में है, फिर भी वे राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में अपनी दखल दिखाने को बेताब हैं। आप पूछ सकते हैं कि ये महानुभाव पहले भी ऐसा कर चुके हैं? नया क्या है? मेरा विनम्र जवाब है कि आज जैसी स्थितियां पहले कभी न थीं। 

यही वजह है कि सिर्फ कश्मीर में अपना प्रभाव रखने वाले उमर अब्दुल्ला चार महीने पहले इसी नीयत से कोलकाता जा पहुंचे थे। वहां उन्होंने ममता बनर्जी की उपस्थिति में टीवी के कैमरों में आंखें गड़ाकर कहा था कि जब जरूरत होगी, तो मैं इस अनुरोध के साथ दीदी का हाथ पकड़ उन्हें दिल्ली ले जाऊंगा कि जैसा अच्छा काम पश्चिम बंगाल में हुआ है, वैसा अब दिल्ली में भी होना चाहिए, पर अभी बंगाल को उनकी आवश्यकता है। उमर अनुभव, उम्र और सियासी हैसियत में ममता से कहीं कमतर हैं, फिर उन्होंने ऐसा क्यों किया? यकीनन, वह भी कश्मीर के मतदाताओं को संदेश दे रहे थे कि सिर्फ अब्दुल्ला परिवार ऐसा है, जिसकी राष्ट्रीय पहचान है। उसके हाथों में आपके अधिकार ज्यादा सुरक्षित रहेंगे। शिव सेना की तरह उनकी पार्टी भी नितांत एक प्रदेशीय है, मगर राजनीति की नई करवट उन्हें पर फैलाने को मजबूर कर रही है।

भाजपा के उभार ने देश के तमाम दलों के सामने खतरा पैदा कर दिया है। आज नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने देश की चुनावी राजनीति में नया रंग-रोगन कर दिया है। अब तक उनकी पार्टी अपने गठजोड़ के जरिये 17 चुनाव जीत चुकी है। इस वक्त 20 प्रदेशों में इस गठजोड़ की हुकूमत है। भाजपा इससे पहले कभी इतनी मजबूत नहीं थी। उसने न केवल राष्ट्रीय रुतबा हासिल किया है, बल्कि प्रादेशिक किलों को भी एक-एक कर ध्वस्त करना शुरू कर दिया है। यह सियासी अश्वमेध न केवल विपक्षियों को, बल्कि सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल क्षेत्रीय दलों के पेट में पानी कर रहा है। वे सब मिलकर मोदी को रोकने की जुगत में जुट पडे़ हैं।    

उधर, कांग्रेस भी अपना खोया आधार पाने के लिए जी-तोड़ कोशिश कर रही है। गुजरात चुनावों से अब तक यकीनन इस पार्टी ने अपने हालात में बेहद सुधार किया है। राहुल गांधी ने अपनी ‘ब्रांड इमेज’ को भी पहले से कहीं अधिक सुधारा है। राहुल जानते हैं कि भाजपा को हराने के लिए गठबंधन जरूरी है, पर समर्पण नहीं। इसीलिए कांग्रेस ने मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में बसपा को धता बता दी। इन नए हालात में क्षेत्रीय दलों के लिए आवश्यक हो गया है कि वे अपने प्रादेशिक मतदाताओं के सामने नई छवि प्रस्तुत करें   और विधानसभा के साथ लोकसभा में अपनी सीटें अधिक से अधिक बढ़ाएं। सियासी सिद्धांत है, विधानमंडलों में जिसकी जितनी हिस्सेदारी, सत्ता  पर उसकी उतनी ज्यादा दावेदारी। 
यही वजह है कि उमर से उद्धव तक सभी नेता अपने मतदाताओं को संदेश देने के लिए अपनी भूमि से परे जाकर भी अवसर तलाश रहे हैं। आने वाले दिनों में आपको ऐसे कुछ और करतब देखने को मिल सकते हैं। 

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