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छत की आस और संगठित लूटतंत्र

शशि शेखर

मुझे यह कहानी एक प्रोफेसर ने सुनाई थी। उनके संस्थान में वरिष्ठ नौकरशाह का पुत्र पढ़ता था और उसी के जरिए वह राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में स्थित एक विकास प्राधिकरण के आला अधिकारी तक पहुंचे थे। प्रोफेसर साहब को एक फ्लैट खरीदना था और वह आला अधिकारी तक इस मंशा के साथ पहुंचे थे कि उन्हें ‘वाजिब’ कीमत पर संपत्ति मिल जाएगी। बकौल उनके- ‘मैं तय समय पर आला अफसर के दफ्तर पहुंचा। परिचय देते ही मुझे अंदर प्रवेश मिल गया। साहब कुछ लोगों के साथ बैठक कर रहे थे। उन्होंने मुझे सामने पड़े सोफे पर विराजने का संकेत किया। क्या दफ्तर था! उस हॉलनुमा कमरे में बैठकर मुझ जैसा कोई भी व्यक्ति खुद-ब-खुद अदना महसूस करने लगेगा। मैं जिस जोश के साथ घर से निकला था, उसकी हवा सरकने लगी थी। 

कुछ देर बाद साहब ने बैठक खत्म की और स्निग्ध भाव से मेरी ओर बढे़। वह सामने आकर बैठे ही थे कि चाय आ गई। मैंने उन्हें इसके लिए आदेश करते नहीं सुना था, मगर उस कक्ष में जैसे सब कुछ साहब की भौंह के इशारे पर हो रहा था। चाय के दौरान मैंने उनसे कहा कि मैं कोई रियायत नहीं चाहता, बस इतनी सी दरख्वास्त है कि बिल्डर मुझे ठगे नहीं और उचित मूल्य पर फ्लैट दे दे।

वह मुस्कराते हुए उठ खड़े हुए और आगे बढ़कर एक कक्ष का दरवाजा खोला। मैंने कल्पना नहीं की थी कि द्वार के पीछे तीन-चार लोगों के बैठने लायक स्थान होगा। यकीनन, गुप्त मंत्रणा के लिए इसे तैयार किया गया था। वहां ऊपर से लेकर नीचे तक सफेद कपडे़ पहने दुबले-पतले सज्जन पहले से बैठे थे। साहब ने जब उनसे मेरा परिचय कराया, तो पता चला कि यह तो वही बिल्डर हैं, जिनसे मुझे मिलना था। इतना नामी बिल्डर और ऐसा साधारण व्यक्तित्व! मुझे धक्का लगा। उसी दौरान साहब के शब्द कानों में पड़े, आप दोनों लोग बातें करें, मैं एकाध काम निपटाकर आता हूं।

अब उस कक्ष में हम दोनों अकेले थे। बिल्डर काइयां था और मेरे लिए इतने बड़े सौदे का यह पहला अवसर। शुरुआत में ही लग गया कि वह किसी निष्कर्ष पर पहुंचने की जल्दी में नहीं है और समय काट रहा है। मैं उचटे हुए मन से बात करता हुआ साहब का इंतजार करता रहा। भरोसा था कि वह डांट-डपटकर इस काइयां शख्स को सही राह पर ला देंगे, लेकिन असली आश्चर्य अभी शेष था।

साहब आए, तो मैंने उन्हें बताया कि आपको तकलीफ देना तो बेकार गया। यह कह रहे हैं कि 80 लाख के फ्लैट पर 75 हजार की छूट दे देंगे। साहब ने उनकी ओर देखा। बिल्डर महोदय ने इसे अनदेखा करते हुए मुस्कराकर कहा कि आपने ‘सर’ को नाहक तकलीफ दी। इतना तो हम तब भी कर देते, जब आप हमारे पास सीधे आते। सर भी जानते हैं कि हमें यह प्लॉट ‘... भाई साहब’ की ‘आज्ञा’ से मिला है। उसने जो नाम लिया था, वह किसी ऐसे-वैसे का नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री के सगे भाई का था। भाई साहब की तूती बोलती थी और उसका असर वहां भी देखने को मिल रहा था। साहब सकपका गए थे, पर इज्जत बचाने के लिए उन्होंने उससे कहा कि अरे हम कह रहे हैं, तो कुछ और कर दो। बड़ी मुश्किल से उसने 15 हजार रुपये और छोड़ने की घोषणा की। वह भी इस अंदाज में, जैसे उसे हम दोनों पर तरस आ रहा हो।’
आपको इस किस्से के जरिए मैं बताना चाहता था कि उत्तर प्रदेश के विकास प्राधिकरण किस तरह नेताओं और अफसरों के काले धन को ठिकाने लगाने का जरिया बन गए थे। प्रोफेसर साहब को जो शख्स मिला था, वह सिर्फ एक चेहरा मात्र था। उसके पीछे जो धन लगा था, वह हुक्मरानों की काली करतूतों से उपजा था। यही वजह है कि ये बिल्डर मनमानी करने को आजाद थे। इनमें से कुछ मुखौटे, तो कुछ साझीदार थे।

बहुत दूर क्यों जाएं, दिल्ली से सटे नोएडा को ही उदाहरण के तौर पर ले लें। ऐसे बिल्डरों की देखा-देखी यहां अन्य व्यवसायों या उद्योगों के स्थापित कारोबारियों ने भी हाथ आजमाने की सोची। उन्होंने जनता से अरबों रुपये तो वसूले, पर उन्हें फ्लैट नहीं सौंपे। भवनों के नाम पर बने ऊंचे-ऊंचे ढांचे खडे़ करके छोड़ दिए। आज नोएडा इन अधबनी इमारतों की वजह से ‘घोस्ट टाउन’ यानी उजड़ा हुआ शहर लगता है। इन्हीं बड़े ढांचों की आड़ में छोटी-मोटी तमाम अवैध इमारतें भी उग आई थीं। शाहबेरी का हादसा इसी की देन था। पिछले साल 17 जुलाई को वहां एक इमारत धंसने से नौ लोग मारे गए थे। क्या कमाल है! शाहबेरी और कारगिल के ‘विजय दिवस’ की तारीखें आस-पास हैं। कारगिल आला अफसरों की लापरवाही की देन था और शाहबेरी राजनीति, प्रशासन और व्यापारिक गठजोड़ से उपजा हुआ पाप। दोनों ने ही देश की संतानों की बलि ली। यह बात अलग है कि कारगिल में मारे गए लोग शहीद कहलाते हैं और शाहबेरी के मृतकों का कहीं नाम-ओ-निशान नहीं। क्या उन्हें जीने का हक नहीं था? 

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शाहबेरी के 30 बिल्डरों को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के अंतर्गत जेल भेजने का आदेश दिया है। साथ ही उन अधिकारियों की सूची बनाने के लिए भी कहा है, जिन्होंने उस समय चल रहे इस काले कारोबार की अनदेखी की, ताकि उनकी जवाबदेही तय कर सख्त कार्रवाई की जा सके। ऐसा संभवत: पहली बार हुआ है, जब सरकार अधिकारियों पर सख्त हुई हो। क्या इसे नेता-अफसर-बिल्डर गठजोड़ के अंत की शुरुआत माना जाए? ध्यान रहे, अवैध निर्माण, अधूरी इमारतों और कमजोर भवनों के लिए सिर्फ प्राधिकरण के अफसर दोषी नहीं। तमाम विभागों और बैंकों के कारकून इस गोरखधंधे में लिप्त हैं। अगर सरकार वाकई इन अधिकारियों को भी दंडित करती है, तो तमाम बिल्डरों के साथ आईएएस और पीसीएस, इंजीनियर और बैंक अफसर भी जेल में होंगे। यही नहीं, इसके साथ ही उनकी पीठ पर हाथ धरने वाले सभी पार्टियों के कई नेता भी बेनकाब होंगे।

यह किसी एक प्रदेश या भूभाग का मामला नहीं है। पूरे देश में ऐसी ही मनमानी हुई है। इसीलिए सवाल उठता है कि क्या इतने सारे रसूखदारों पर कार्रवाई संभव है? मैं इस प्रश्न के उत्तर का जिम्मा नई दिल्ली और सूबाई राजधानियोंके सत्तानायकों पर छोड़ता हूं। वे भूलें नहीं, समय उनका भी न्याय करेगा।

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  • Web Title:shashi shekhar aajkal hindustan column on 27th july