DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

गम और गुस्से के बीच आगे की राह

शशि शेखर

हम इस समय गम, गुस्से, आंसू और आक्रोश के कठिन दौर से गुजर रहे हैं। पुलवामा के हमले ने देश भर में भावनाओं की सुनामी ला दी है। जनमानस में पाकिस्तान के लिए ऐसी दाहकता आजाद भारत के इतिहास में कुछ बार ही महसूस की गई। बहुत छोटा था, जब 1965 की जंग हुई। मेरे पिता मिर्जापुर में तैनात थे। उन दिनों हर शाम, बिला नागा, मेरे माता-पिता बहुत सारा भोजन बनाकर उन जवानों को देने जाते, जिनकी टे्रनें उत्तरी मोर्चे तक जाने के लिए हमारे शहर से गुजर रही होतीं। मैं अपनी नन्ही आंखों से देखा करता कि कैसे महिलाएं भोजन के अलावा सिपाहियों को नेग के रुपये देने की कोशिश करतीं, उनकी कलाइयों पर राखियां बांधतीं और माथे पर तिलक लगातीं। दर्जनों लोग अपने नारों से आसमान गुंजा देते- आगे-आगे तुम बढ़ो, पीछे तुम्हारे साथ हैं। 

अगली लड़ाई 1971 में हुई। तब तक मैं किशोरावस्था की ओर बढ़ चला था। तब इलाहाबाद स्टेशन पर समान दृश्य देखने को मिलते। 1999 के कारगिल के वक्त तक मैं कलमनवीस बन चुका था, और उस वक्त के हालात पर सवाल उठा था कि क्या भारतीय संवेदनाएं कठुआ गई हैं? स्टेशनों पर न नारे थे, न शहर की सड़कों से गुजरने वाले जवानों का उस तरह खैरमकदम किया जा रहा था। मन में चिंता उभरी थी कि नई-नई आई मुक्त बाजार संस्कृति ने कहीं हमारी भावनाओं पर तो कब्जा नहीं कर लिया? पिछली 14 फरवरी से देश में जिस तरह भावनाएं फूटी पड़ रही हैं, उससे जहां भारतीयों की एकता मन में पुलक उठती है, वहीं कुछ सवाल भी खड़े होते हैं। अति भावुकता में कहीं हम अपनी सरकार पर जरूरत से ज्यादा दबाव तो नहीं डाल रहे? 

इसमें कोई दो राय नहीं कि पाकिस्तान का इलाज होना चाहिए। इसमें भी कोई विवाद नहीं हो सकता कि जो हमारे देश में रहकर, हमारी ही संप्रभुता को चुनौती दे रहे हैं, उनका भी दिमाग ठिकाने लगना चाहिए, पर इसके लिए जरूरी है कि हमारी प्रतिक्रिया पूरी तरह सुविचारित और सुनियोजित हो। तेजी से उभरते हुए भारत से दुनिया अधिक जिम्मेदारी की उम्मीद करती है। पाकिस्तान के सत्तानायक कितने बेशर्म हैं, इसका उदाहरण इमरान खान का बयान है। पुलवामा हमले के बाद पहले तो उन्होंने चुप्पी साध ली और जब पांचवें दिन बोले भी, तो क्या बोले? यही कि इस हमले से हमारे मुल्क का कोई वास्ता नहीं है। हम खुद दहशतगर्दी के शिकार हैं। भारत चाहे, तो हम बातचीत को तैयार हैं, मगर कोई हम पर हमला करने की न सोचे। अगर पाकिस्तान पर आक्रमण हुआ, तो हम भी जवाब देंगे। अब आप ही बताइए, इस बयान में नया क्या है? हर हमले के बाद हम पड़ोसी हुक्मरानों की समान तोता रटंत सुनते आए हैं। 

खुद को सियासतदां कहने वाली यह जमात सेना की लिखी स्क्रिप्ट पढ़ने के लिए बाध्य है। जो अपने अल्फाज नहीं बोल सकते, वे किस मुंह से भरोसा कमाने की बात करते हैं? हम जानते हैं। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की कुरसी पर बैठे शख्स की सत्ता-सीमा हमेशा से रावलपिंडी का सत्ता प्रतिष्ठान तय करता आया है। आज इमरान इस दुर्गति का शिकार हैं, कल कोई और था। रही बात सेना की, तो वह पुराने मुगालते में जी रही है। मौजूदा ‘रिजीम’ को लगता है, वैश्विक स्थिति उनके पक्ष में है। अमेरिका को उनकी जरूरत है, क्योंकि वह 18 साल पाकिस्तानी संसाधनों का उपयोग कर अफगानिस्तान में जूझता रहा है और अब उसे इस अंधी खोह से निकलने के लिए इस्लामाबाद-रावलपिंडी गठजोड़ की जरूरत है। चीन को ‘इकोनॉमिक कॉरीडोर’ के निर्माण और अरब सागर पर प्रभुत्व के लिए पाकिस्तान की आवश्यकता है, तो सऊदी अरब को अपने परंपरागत शत्रु 
ईरान से निपटने के लिए हमारे पड़ोसी मुल्क की मदद चाहिए। 

इस गफलत में इमरान भूल गए कि आईएसआई की गोद में बैठे मसूद अजहर के नुमाइंदे पुलवामा धमाके के तुरंत बाद इसकी जिम्मेदारी लेने का बयान जारी करते हैं। दहशतगर्दों का यह दुस्साहस रावलपिंडी के सेना सदन की देन है, जो फिलवक्त अति आत्मविश्वास के शिकार हैं।
गलतफहमियों की हवा से अपनी हीन भावना सहलाने वाले ये लोग भूल जाते हैं कि हालात उरी हमले के बाद भी ऐसे ही थे, पर भारतीय दस्तों ने ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ कर जता दिया कि नई दिल्ली का निजाम अब समझौतावादी रवैया अपनाने को तैयार नहीं है। सिर्फ ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ ही क्यों? सऊदी अरब के युवराज गत सप्ताह की शुरुआत में इस्लामाबाद में थे। इमरान खान दुनिया को यह जताने के लिए कि उनके संबंध कितने बेतकल्लुफ हैं, खुद गाड़ी चलाकर गंतव्य तक ले गए थे। मतलब साफ था। 

क्रिकेटर से प्रधानमंत्री बने इमरान बाउंसर फेंककर भभकी देना चाह रहे थे कि सऊदी हमारे साथ है, पर उसके बाद जो हुआ, वह और अधिक दिलचस्प है। युवराज इस्लामाबाद से नई दिल्ली आना चाह रहे थे, पर भारत ने कहा कि वहां से सीधी उड़ान भरने की बजाय आप स्वदेश होकर आएं। ऐसा हुआ भी। इतना ही नहीं, मोदी और मुहम्मद बिन सलमान के संयुक्त बयान में पुलवामा हमले की निंदा का स्वर भी गूंजा। इस बीच 40 से अधिक देश भारतीय रुख-रवैये की तरफदारी कर चुके हैं। अमेरिका ने खुलकर पाक की लानत-मलामत की है। इतना ही नहीं, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने मसूद अजहर के आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद का नाम लेते हुए पुलवामा हमले की निंदा की। चीन को भी मजबूरन इस निंदा में अपना सुर मिलाना पड़ा। 

ध्यान रखें। नई दिल्ली पुलवामा का प्रतिशोध तभी ले पाएगी, जब घरेलू मोर्चे पर हालात सकारात्मक होंगे, पर यहां कुछ लोग अति वाचालता व्याधि के शिकार हैं। इनमें से एक हैं, मेघालय के राज्यपाल तथागत राय। उन्होंने ट्वीट के जरिए पाक सेना द्वारा 1971 में पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में किए गए नरसंहार को याद करते हुए भारतीय सेना से भी यही उम्मीद की है। संविधान की शपथ लेकर जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग ऐसी बचकाना बातें कर सरकार को सांसत में डाल देते हैं। उनकी लगाम कसी जानी चाहिए। यही नहीं, कुछ लोग शेष भारत में रह रहे कश्मीरियों पर तंज कस रहे हैं। देहरादून से तो दर्जनों छात्र भयवश घाटी पलायन कर गए। इन भयभीत बच्चों को मोहाली के गुरुद्वारे ने शरण मुहैया कराई। क्या यह सुरक्षा बलों की शहादत का अपमान नहीं है? हमारे जवानों ने देश की अखंडता के लिए जान न्योछावर की। घर बैठे आंसू बहाने वाले लोग कश्मीरियों को धमकाकर अखंडता के पवित्र भाव का गला घोंट रहे हैं। राज्य सरकारों को ऐसे तत्वों के साथ सख्ती बरतनी चाहिए। क्या हमारे सूबाई हुक्मरां यह नहीं समझते कि उनकी इस लापरवाही का लाभ अलगाववादियों और आईएसआई को मिलेगा?

Twitter Handle: @shekharkahin 
शशि शेखर के फेसबुक पेज से जुड़ें
shashi.shekhar@livehindustan.com

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:shashi shekhar aajkal hindustan column on 24 february