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हाफिज सईद की गिरफ्तारी और हम

Hindustan Editor Shashi Shekhar

हाफिज सईद की गिरफ्तारी ने संकेत दिया है कि पाकिस्तान पर भारत जनित अंतरराष्ट्रीय दबाव अब बढ़ रहा है। हालांकि, इसे मुकम्मल तभी माना जाएगा, जब सईद को सजा मिलेगी और जाधव सकुशल घर लौट सकेंगे।

हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय अदालत से कुलभूषण जाधव की सजा-ए-मौत पर रोक और पाकिस्तान में हाफिज सईद की गिरफ्तारी के बीच क्या कोई संबंध है? देखने में ये दोनों अलग घटनाएं लगती हैं, पर सच यह है कि इसके लिए भारतीय सत्ता-सदन ने कड़ी मेहनत की है। सवाल उठता है कि क्या भारत ने पाकिस्तान के प्रति अनमनी नीति को अतीत के अंधे कुएं में कहीं गहरे दफना दिया है? 

यहां मुझे कारगिल के रक्तिम दिन याद आ रहे हैं। वे दिन, जब पाकिस्तान ने हम पर एक और लड़ाई थोप दी थी और हम शुरुआती तौर पर उसे बडे़ अनमने तरीके से ले रहे थे। मैं यहां अनमना शब्द इसलिए इस्तेमाल कर रहा हूं, क्योंकि अवाम के बीच वह जोश नदारद था, जो उससे पहले की दो जंगों में देखा गया था और जो पुलवामा हमले के बाद देखा गया। खुद नई दिल्ली के सत्तानायक उस जंग के शुरुआती वक्त में जोरदार दावे करने से बचते थे। क्यों? वह राजकीय संकोच और शील की परंपरा का पालन था या कुछ और?

मैं इसे कुछ और ही मानता हूं। वजह बहुत साफ है। मई-जुलाई,1999 के बीच के इस घटनाक्रम के बहुत पहले से हमें मालूम था कि कारगिल की बर्फ जमी चोटियों पर कुछ पाकिस्तानी आ बैठे हैं। उपलब्ध साक्ष्यों के अनुसार श्रीनगर में मौजूद उत्तरी कमान के मुख्यालय ने इस संवेदनशील मुकाम पर वह तत्परता नहीं बरती, जिसकी जरूरत थी। सीमा सुरक्षा बल की खुफिया यूनिट ने पत्र लिखकर उन्हें हफ्तों पहले चेता दिया था कि चोटियों पर कुछ लोग भारी असलहे के साथ आ जमे हैं। 

अनमनेपन की तो यह शुरुआत मात्र थी।

जब यह खबर नई दिल्ली पहुंची, तब प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई में जो पहली बैठक आयोजित की गई, उसमें माहौल जोश भरा नहीं था। अंत:पुर की खुसफुसाहटों से पता चला कि बैठक के शुरुआती लम्हों में खुफिया एजेंसियों के आला अधिकारियों ने गलती स्वीकार करते हुए अपने नसीब का निर्णय प्रधानमंत्री पर छोड़ दिया था। इस पर परिपक्व वाजपेयी का कहना था कि जो हुआ सो हुआ, अब आगे बताइए? आगे की कार्रवाई पर सेना के तीनों अंग साझा रणनीति की बजाय आपसी अंतर्विरोधों के शिकार थे।

सूत्रों से छन-छनकर जो खबरें बाहर आईं, उनके अनुसार थल सेना का कहना था कि अगर हम जमीनी जंग में उलझेंगे, तो जान-माल का बहुत नुकसान होगा। अच्छा होगा यदि हम आसमान से आग बरसाएं। वायु सेना के आला अधिकारी इससे असहमत थे। उन्हें लगता था कि इससे ‘फुल स्केल वार’ छिड़ जाएगा। थल सेना का जवाबी तर्क था कि पड़ोसी देश भला किस मुंह से इसका जवाब देगा? न तो वह यह दावा कर रहा है कि उसके सैनिकों ने हमारी सीमा में दखलंदाजी की है और न ही हमारी अपनी जमीन पर की गई कार्रवाई पर उसे प्रतिरोध जताने का कोई हक है। तर्क वजनदार था, पर वायु सेना इसके लिए तैयार नहीं थी, क्योंकि ऐसे अभियान के लिए आवश्यक ‘लेजर बम’ भी उसके पास नहीं थे।

कहते हैं कि इजरायल ने उस समय ये बम उपलब्ध कराए और आने वाले दिनों में भारतीय वायु सेना ने थल सेना के साथ मिलकर इस अभियान में सार्थक भूमिका निभाई। आज के वायु सेनाध्यक्ष वीएस धनोआ भी बमवर्षकों में से एक थे। अब उनका दावा है कि वायु सेना किसी भी चुनौती के लिए तैयार है।

हम कारगिल की जंग को जीते जरूर, पर इसकी एवज में 527 जवानों ने शहादत दी और 1,363 घायल हो गए। 
इस लेख की शुरुआत में मैंने नई दिल्ली के अनमनेपन का उल्लेख किया था। हमारे हुक्मरां कई वजहों से अनमने दिख रहे थे। सबसे बड़ा कारण तो यह था कि प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को इससे गहरा आघात लगा था। कुछ ही महीने पहले वायपेयी मैत्री-बस पर सवार होकर लाहौर पहुंचे थे और उन्होंने नवाज शरीफ के साथ ऐतिहासिक घोषणा-पत्र पर दस्तखत किए थे। इस विश्वासघात ने ऐतिहासिक घोषणा-पत्र के साथ उनके भरोसे की भी धज्जियां उड़ा दी थीं। यही नहीं, देश की सुरक्षा से जुड़ी तमाम एजेंसिया, अद्र्धसैनिक बल और सुरक्षा बल इससे बेनकाब हो गए थे। वे ऐसे किसी भी हमले के लिए तैयार न थे और युद्ध से निपटने के लिए उनके पास कोई ठोस रणनीति भी नहीं थी। और तो और, शुरुआती दौर में इसे सिर्फ झड़प बताने की कोशिश की गई थी। 

कारगिल की इस जंग को हमारे जवानों ने बहुत बहादुरी से लड़ा, पर 20 बरस बीत जाने के बावजूद यह सवाल आज तक कायम है कि आगे ऐसा लहू न बहे, इसके लिए हिन्दुस्तान के सत्ता-सदन ने क्या सीखा है? लगभग साढे़ तीन साल पहले पठानकोट स्थित एयरबेस पर हमले के दौरान भी आपसी तालमेल और हमले के बाद उससे निपटने की रणनीति की कलई खुली थी। पुलवामा में 40 जवानों की असामयिक मौत ने इस यक्ष प्रश्न को एक बार फिर से देश की जनता के सामने ला खड़ा किया था। यह बात अलग है कि नरेंद्र मोदी की सरकार ने बालाकोट पर हमला कर ‘समूचे नैरेटिव’ को बदल दिया कि नया हिन्दुस्तान जवाबी कार्रवाई करने में हिचकेगा नहीं।

अब हाफिज सईद की गिरफ्तारी ने भी संकेत दिया है कि पाक पर भारत जनित अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ रहा है। हालांकि, इसे मुकम्मल तभी माना जाएगा, जब सईद को सजा मिलेगी और जाधव सकुशल घर लौट सकेंगे।

 

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