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मोदी-शाह का नया दांव

शशि शेखर

इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन से जनादेश जब चाहे निकले, पर समूचा देश अभी से चुनाव चर्चा में सराबोर हो रहा है। सियासी गपशप के दौरान अक्सर यह जुमला सुनाई देता है, 2019 का चुनाव 2014 से अलग और संघर्षपूर्ण साबित होगा। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी के आक्रामक अगुवा अमित शाह इस तथ्य को भली-भांति समझते हैं। यही वजह है कि उन्होंने इस बार दूसरी रणनीति अपनाई है। इसके तहत देश के विभिन्न हिस्सों में प्रधानमंत्री की सौ जनसभाएं आयोजित करने का लक्ष्य रखा गया है। अगर आप अब तक हुई रैलियों पर गौर फरमाएं, तो पाएंगे कि भाजपा ने प्रधानमंत्री का सर्वाधिक सदुपयोग पश्चिम बंगाल, केरल, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, ओडिशा और पूर्वोत्तर के प्रदेशों में करने का फैसला किया है। वजह? पिछले चुनावों में भाजपा ने उत्तर और पश्चिम भारत के राज्यों में अभूतपूर्व सीटें पाई थीं। दक्षिण में कर्नाटक और अविभाजित आंध्र में तेलुगुदेशम पार्टी के साथ चुनाव लड़ते हुए उन्होंने क्रमश: 17 और 19 सीटें जीती थीं। एक सीट तमिलनाडु में भी मिली थी, पर केरल अछूता रह गया था। तमिल प्रदेश में भरपाई के लिए भाजपा ने जहां अन्नाद्रमुक का सहयोग हासिल कर लिया है, वहीं सुपर स्टार रजनीकांत अलग होते हुए भी उसका साथ देने का आभास दे रहे हैं। 

रही बात केरल की, तो यह ऐसा अनूठा राज्य है, जहां माकपा और आरएसएस के कार्यकर्ता सड़कों पर एक-दूसरे से टकराते आए हैं। इसके बावजूद भाजपा को अभी तक अपेक्षित सफलता नहीं मिली है। प्रधानमंत्री ने पिछले दिनों जिस तरह यहां एक जनसभा में संस्कृति ध्वंस का जिक्र किया, तय है कि भगवा दल वहां भावनात्मक तौर पर अपनी जड़ें मजबूत करना चाह रहा है। केरल में अब तक कांग्रेस और माकपा के मोर्चे बारी-बारी से सत्ता-रथ पर सवार होते आए हैं। इन परंपरागत प्रतिद्वंद्वियों के बीच अपनी राह निकालने की कोशिश में भाजपा पिछले तीन वर्षों से जमीन-आसमान एक किए हुए है। 

इसी से मिलते-जुलते हालात पश्चिम बंगाल के हैं। ममता बनर्जी ने बंग प्रदेश में वाम मोर्चे के 34 वर्ष पुराने शासन को उखाड़कर सत्ता जरूर हासिल कर ली, परंतु उन्होंने रीति-नीति में बहुत परिवर्तन नहीं किए। कांग्रेस, वाम मोर्चे और तृणमूल की तिकोनी लड़ाई में भाजपा को लगता है कि वह वोटों का ध्रुवीकरण अपने पक्ष में करा पाएगी। इसके लिए अमित शाह वहां अथक परिश्रम कर रहे हैं। पिछले दिनों वह रथयात्रा निकालना चाहते थे, पर अदालत से अनुमति न मिली।  

पड़ोस के ओडिशा पर भी मोदी और शाह की महत्वाकांक्षी नजर है। नवीन पटनायक लोकप्रिय नेता हैं और लगभग19 वर्षों से हुकूमत कर रहे  हैं। यह उनकी मजबूती है या कमजोरी? मध्य प्रदेश में शिवराज और छत्तीसगढ़ में रमन सिंह जिस तरह जनप्रिय होने के बावजूद सत्ता हासिल नहीं कर पाए, उससे भाजपा को उम्मीद बंधनी स्वाभाविक है। कांग्रेस वहां अब तक मुख्य विपक्षी पार्टी रही है, पर प्रधानमंत्री ने 24 दिनों में चार दौरे करके साबित कर दिया है कि कलिंग की ऐतिहासिक भूमि पर वह भाजपा को प्रमुख पार्टी के तौर पर स्थापित करने के लिए प्रयासरत हैं। 
साफ है, भाजपा लगभग 125 अछूती सीटों में अधिकाधिक अपने पक्ष में जीतने के लिए जी-जान एक किए हुए है। यह इसलिए भी जरूरी है, ताकि उत्तरी और पश्चिमी प्रदेशों में होने वाली आशंकित हानि की भरपाई की जा सके।    

अब तक हमने उस रणनीति की बात की, जो जनता की नजर से ओझल है। अब आते हैं, प्रधानमंत्री के भाषणों पर। आपने गौर किया होगा कि मोदी जिस क्षेत्र में भी जाते हैं, अपनी सरकार द्वारा उस इलाके के लिए किए गए काम-काज गिनाते हैं। मसलन, पंजाब में उन्होंने सिर्फ करतारपुर साहिब गलियारे की बात नहीं की, बल्कि सूबे की महिलाओं, बेरोजगारों, युवकों और बुजुर्गों के लिए केंद्र सरकार ने क्या किया, उसका तफसील से ब्योरा दिया। केरल में भी उन्होंने सबरीमाला के बहाने धार्मिक भावनाएं भुनाने की कोशिश की, तो उससे कहीं अधिक अपनी सरकार की विकास योजनाओं और कार्यों को एक-एक कर गिनाया। यकीनन भाजपा की कोशिश उन्हें विकास पुरुष के तौर पर पेश करने की है। क्या यह राजनीति को सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ाने की कोशिश है? 

मोदी और शाह जानते हैं कि चमत्कार पुराने पड़ जाते हैं। जनता को खुद से बांधे रखने के लिए लगातार कुछ नया रचना होता है। इसीलिए उज्ज्वला की सफलता के बाद स्वास्थ्य बीमा जैसी कल्याणकारी योजनाएं लागू की गईं। आर्थिक तौर पर निर्बल अगड़ों को आरक्षण इसकी अगली कड़ी थी। आदर्श चुनाव संहिता लागू होने तक ऐसी कुछ और घोषणाएं संभव हैं। बात यहीं खत्म नहीं होती। राजनीति में टेढ़ी चाल का भी बेहद महत्व है। ऐसा प्रतिपक्षी का ध्यान बंटाने के लिए किया जाता है। भरोसा न हो, तो कर्नाटक प्रकरण पर नजर डाल लीजिए। वहां कांग्रेस और जेडी-एस की मिली-जुली सरकार पिछले पूरे हफ्ते आशंका और अनहोनी के झूले में झूलती रही। कल मध्य प्रदेश में भी ऐसी कोशिश होती दिखाई पडे़, तो आश्चर्य में मत पड़ जाइएगा।

भाजपा जानती है कि क्षेत्रीय गठबंधन उसकी राह के रोडे़ हैं। इसीलिए छोटे-मोटे सहयोगियों की चिंता किए बगैर उसने पंजाब और बिहार में अपने गठबंधनों को अंतिम स्वरूप प्रदान कर दिया है। असम गण परिषद, अपना दल, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी जैसे नितांत क्षेत्रीय सहयोगी अगर अलग हो रहे हैं, तो उसे इसकी परवाह इसलिए नहीं है, क्योंकि वह इन क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत कर चुकी है। पार्टी के लिए चिंता का अकेला सबब शिव सेना है। एक तरफ, जहां महाराष्ट्र में कांग्रेस और एनसीपी का गठबंधन अंतिम रूप ले चुका है, वहीं सबसे पुरानी साझीदार ‘सेना’ के तेवर अब भी बगावती हैं। दिलचस्प यह है कि ‘सेना’ नाराजगी व्यक्त करती है, पर अभी तक केंद्र में साझीदार है। क्या यह सिर्फ सीटों के बंटवारे का खेल है? जो हो, इस महत्वपूर्ण राज्य में दोनों दलों को अपने कार्यकर्ताओं का मनोबल कायम रखने के लिए जल्दी निर्णय करना होगा। 
जाहिर है, मोदी और शाह ने शतरंज की बिसात पर आदतन पहली चाल चल दी है। इस पर मतदाता कैसा रुख अपनाते हैं, इसके लिए कुछ महीने इंतजार करना होगा। 

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  • Web Title:shashi shekhar aajkal hindustan column on 20 january