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आतंकी की रिहाई

अभी कुछ ही दिन पहले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने कहा था कि पाकिस्तान भारत के खिलाफ पूरी ताकत झोंक देगा। इसी के साथ पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा का यह बयान भी आया था कि भारत से बदला लेने के लिए पाकिस्तान किसी भी हद तक जा सकता है। इसके बाद से इस पूरी ताकत और किसी भी हद तक जाने को लेकर अटकलें लगने लगी थीं। यह साफ था कि पाकिस्तान सिर्फ परमाणु बम की धमकी दे सकता है, लेकिन अभी वह खुद भी इसके लिए तैयार नहीं है। इन दोनों ही बयानों के अर्थ अब खुलने लग गए हैं। पाकिस्तान से जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर को रिहा करने की खबर आ रही है। हालांकि आधिकारिक तौर पर उसे रिहा नहीं किया गया है, लेकिन उसे जिस जेल में बंद किया गया था, वह अब उस जेल में नहीं है। बताया गया है कि इस गुपचुप रिहाई के बाद वह अब जैश मुख्यालय पहुंच चुका है, जहां वह उन कामों को अंजाम देने में फिर से जुट गया है, जिसके लिए वह जाना जाता है।

मसूद अजहर की यह रिहाई दरअसल पाकिस्तान के खत्म होते विकल्पों की कहानी भी कहती है। भारत ने जब से जम्मू-कश्मीर से अपने संविधान के अनुच्छेद 370 को हटाया है, पाकिस्तान सरकार पर कुछ कर दिखाने का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। शुरू में पाकिस्तान को लगता था कि वह अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के साथ मिलकर भारत को नीचा दिखाने का काम करेगा। लेकिन इस मामले में उसके सभी पासे उलटे पड़ गए। सुरक्षा परिषद के जिस प्रस्ताव से उसने सबसे ज्यादा उम्मीद बांधी थी, चीन की काफी सक्रिय मदद के बावजूद उसे वहां से भी कुछ हासिल नहीं हुआ। बेतरह आर्थिक बदहाली में फंसे पाकिस्तान को यह भी पता है कि सैन्य प्रयासों में पाने की बजाय खोने के बहुत सारे और बहुत ज्यादा खतरे हैं। इसलिए अब आखिर में वह उसी तरीके को आजमाने जा रहा है, जिसके लिए पाकिस्तान पूरी दुनिया में खासा बदनाम हो चुका है। मसूद अजहर भारत के कई हिस्सों और खासकर कश्मीर में आतंक फैलाने की साजिशों के लिए काफी कुख्यात है। पठानकोट और पुलवामा के हमले जैसी उसकी करतूतों की फेहरिस्त बहुत लंबी है। पाकिस्तान अब इसी सिलसिले को बढ़ाना चाहता है। यह याद रखना बहुत जरूरी है कि बालाकोट की सर्जिकल स्ट्राइक के बाद इस तरह के आतंकवादी हमले काफी कम हो गए थे।

इन हमलों में कमी का एक कारण यह भी था कि अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण पाकिस्तान अपने यहां के तमाम नामी-गिरामी आतंकियों को जेल में डालने पर मजबूर हो गया था। फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स ने उसका नाम ग्रे लिस्ट में डाल दिया था और आशंका यह बन रही थी कि उसका नाम शीघ्र काली सूची में जा सकता है। इसका अर्थ होता कि दुनिया भर की संस्थाओं से उसे मिलने वाली मदद का पूरी तरह से बंद हो जाना। ऐसे में, उन आतंकवादियों को जेल में डालना एक मजबूरी बन गई थी, जिनकी सक्रियता उसकी विदेश नीति का ही हिस्सा थी। लेकिन लगता है कि पाकिस्तान ने इसकी एक काट भी निकाल ली है। कागजों में जो आतंकवादी जेल में हैं, वे अब चुपचाप अपने ठिकानों पर पहुंचा दिए गए हैं। लेकिन अच्छा यही रहेगा कि ऐसी किसी भी हरकत से पहले पाकिस्तान बालाकोट को याद कर ले।

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  • Web Title:release of masood azhar