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निजता की राजनीति

सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों वाली संविधान पीठ इन दिनों एक ऐसे मामले की सुनवाई कर रही है, जिसका वास्ता हम सब की निजी जिंदगी से है। निजता का अधिकार हमारा मूल अधिकार है या नहीं, इस पर अदालत जो भी फैसला करेगी, उसका असर हमारे सामाजिक जीवन पर भी दिखेगा और सरकार व प्रशासन से हमारे संबंधों पर भी। इस समय जब देश भर के विधि विशेषज्ञ, संविधान वेत्ता और नागरिक अधिकार संगठन पूरी कार्यवाही को दम साधे देख रहे हैं, इस मामले में एक दिलचस्प हस्तक्षेप हुआ है। देश के चार राज्यों- कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, पुडुचेरी और पंजाब की सरकारों ने इस मामले में याचिका दायर करके मामले में हस्तक्षेप की इजाजत मांगी है। अदालत में इन राज्यों की नुमाइंदगी कर रहे वकील कपिल सिब्बल का कहना है कि निजता को मूल अधिकार माना जाना चाहिए। जबकि इस मामले में केंद्र सरकार शुरू से ही यह कह रही है कि हमारे संविधान ने हमें जो मूल अधिकार दिए हैं, उनमें निजता का अधिकार कहीं नहीं है। अभी तक यह मामला केंद्र सरकार बनाम नागरिक अधिकार का था। यह माना जा रहा था कि सरकारें अपनी प्रकृति से ही अनुदार होती हैं, इसलिए केंद्र सरकार के इस रुख पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए। लेकिन अब चार राज्यों के हस्तक्षेप के बाद इसका स्वरूप बदल गया है। 

मूल रूप से यह सारी बहस आधार नंबर को लेकर शुरू हुई है। कुछ नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका डालकर कहा है कि सरकार आधार परियोजना के लिए लोगों की उंगलियों के निशान और उनकी आंख की पुतली के बॉयोमेट्रिक्स जमा कर रही है, जो उनकी निजता का उल्लंघन है। इससे शुरू हुई बहस अब इस बिंदु पर पहंुच गई है कि निजता का अधिकार संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों के तहत आता है या नहीं? वैसे निजता के अधिकार पर इस समय भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में बहस चल रही है। पश्चिमी देशों में निजता के अधिकार पर काफी काम हुआ है, साथ ही यह भी सच है कि दुनिया में कहीं भी नागरिकों को पूरी तरह से निजता का अधिकार नहीं मिला है। इस बीच विश्वव्यापी आतंकवाद के उभार ने इस पूरी बहस को काफी कुछ बदल दिया है। या दूसरे शब्दों में कहें, तो निजता के अधिकार के विस्तार को काफी हद तक रोक दिया है। यह भी कहा जाता है कि आतंकवाद ने सरकारों को एक और बहाना दे दिया है, जिससे वे निजता के अधिकार का रास्ता रोक सकें। आतंकवाद के खतरों से निपटने के लिए लोगों की ई-मेल पढ़नी पड़ती है, उनकी बातचीत सुननी पड़ती है, उनकी चैट पर नजर रखी जाती है, लेकिन इस सबसे निजता के अधिकार का उल्लंघन भी होता ही है। लेकिन भारत में जो बहस है, वह नौकरशाही और राजनीति में उलझ गई है।

बहस में चार राज्यों का हस्तक्षेप इसके राजनीतिकरण को ही दर्शाता है। जिन चार राज्यों ने हस्तक्षेप किया है, वहां एनडीए की विरोधी सरकारें हैं। इनमें से तीन प्रदेशों में तो कांग्रेस की ही सरकार है। कहना मुश्किल है कि केंद्र में अगर इस समय कांग्रेस की सरकार होती, तो इस मसले पर उसका रुख क्या होता? आधार परियोजना का पूरी तरह विरोध करने वाले जब सत्ता में आए, तो उनका रुख कैसे बदला, यह हम देख ही चुके हैं। अगर यह मामला सिर्फ नागरिक अधिकार संगठन बनाम सरकार का होता, तो आशंका शायद इतनी नहीं होती। दलगत राजनीति घुस आने से डर यह है कि मामला राजनीतिक जिद का रूप भी ले सकता है। लेकिन, राजनीति भले ही जैसी भी हो, फिलहाल हमें यही उम्मीद करनी चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट फैसला करते हुए नागरिकों के हितों का पूरा ध्यान रखेगी। 

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