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2 जुलाई, 2020|11:53|IST

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माओवादी आतंक

कहा जाता है कि हारते हुए बागी अक्सर ज्यादा खतरनाक हो जाते हैं। तब उनकी लड़ाई किसी मैदान को जीतने के लिए नहीं होती, बल्कि यह प्रचार करने के लिए होती है वे कितना नुकसान पहुंचा सकते हैं। बिहार के मसुदन रेलवे स्टेशन पर मंगलवार की रात नक्सलियों ने जो किया, उसका मकसद यह संदेश देना ही था कि वे अभी भी नुकसान पहुंचाने की स्थिति में हैं। वरना स्टेशन पर हमला बोलकर आग लगाने, संचार व्यवस्था को तोड़ने और सहायक स्टेशन मास्टर समेत दो रेलवे कर्मचारियों के अपहरण से उनका कोई मकसद हल होने वाला नहीं था। इन नक्सलवादियों की कुल जमा समझ में आने वाली दिक्कत यही थी कि उन्होंने 18 व 19 दिसंबर को पूरे बिहार और झारखंड में विरोध दिवस मनाया, तो इसकी खबर तक कहीं नहीं दिखी। उसके बाद 20 दिसंबर को उन्होंने बिहार और झारखंड बंद का आयोजन किया था, जिसका फ्लॉप होना लगभग तय हो चुका था। ऐसे में, उनके सामने विकल्प यही था कि वे कहीं कोई विस्फोटक सा कारनामा कर दिखाएं, सो उन्होंने मसुदन रेलवे स्टेशन पर कर दिखाया। इस विरोध दिवस और बंद की अपील भाकपा माओवादी की बिहार-झारखंड स्पेशल एरिया कमेटी ने की थी। इसका मकसद था ऑपरेशन ग्रीन हंट का विरोध, जिसने ज्यादातर प्रभावित इलाकों में नक्सलवादी और माओवादी आंदोलन की कमर लगभग पूरी तरह तोड़ दी है।

हालांकि दिलचस्प बात यह है कि भारत सरकार के अपने रिकॉर्ड में ऑपरेशन ग्रीन हंट जैसा कुछ भी नहीं है। वह ये जरूर स्वीकार करती है कि नक्सलवादियों के खिलाफ पूरे देश में सख्ती बरती जा रही है, और जहां कहीं भी जरूरी है, उनकी धर-पकड़ के अभियान भी चल रहे हैं, लेकिन किसी ऑपरेशन विशेष से वह इनकार करती रही है। यह ऑपरेशन ग्रीन हंट नाम पता नहीं कहां से आया, लेकिन इसका जिक्र पिछले आठ साल से मीडिया में तब से चल रहा है, जब केंद्र सरकार ने अद्र्धसैनिक बलों और राज्य पुलिस बलों की सहायता से नक्सलवादियों और माओवादियों के खिलाफ बड़ा अभियान शुरू किया था। पहली बार देश के अंदर चलने वाले ऐसे किसी आतंकवाद विरोधी अभियान में हेलीकॉप्टर और ड्रोन का इस्तेमाल हुआ। यह भी कहा जाता है कि उग्रवादियों के ठिकानों का पता लगाने के लिए उपग्रह से प्राप्त तस्वीरों का इस्तेमाल भी हुआ। जो भी हो, इस अभियान ने सचमुच असर दिखाया है, माओवादी उग्रवादियों का प्रभाव क्षेत्र इस दौरान काफी कम हुआ है, साथ ही आतंकवादी वारदात करने की उनकी क्षमता भी काफी कम हुई है। 

वारदात के लिए जान-बूझकर मसुदन जैसे छोटे से स्टेशन को चुना गया, जहां सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम नहीं थे। यह बहुत छोटा स्टेशन है और वहां पैसेंजर व इंटरसिटी गाड़ियां ही रुकती हैं, लेकिन वहां से गुजरने वाला रेल मार्ग दिल्ली को पश्चिम बंगाल से जोड़ने वाली लूप लाइन का हिस्सा है। यानी माओवादियों ने अपना निशाना ऐसी जगह को बनाया, जहां खतरा बहुत कम था, लेकिन प्रचार की संभावना काफी ज्यादा थी। इसके अलावा जो कुछ हुआ, उसमें कोई दूरगामी रणनीति नहीं, बल्कि बचकानापन ही दिखता है। तमाम मूर्खताओं के बावजूद यह तो माओवादी नेतृत्व भी समझता ही होगा कि एक छोटे से स्टेशन पर हल्ला बोलकर किसी रेल लाइन पर यातायात रुकवा पाना संभव नहीं है। और इससे केंद्र सरकार के माओवादी विरोधी अभियान पर असर पड़ने की बात तो खैर सोची ही नहीं जा सकती। मसुदन स्टेशन पर हुए आतंकी हमले ने केंद्र सरकार को एक संदेश तो दिया ही होगा कि इन्फ्रास्ट्रक्चर और सरकारी कर्मचारियों की सुरक्षा भी माओवादी विरोधी अभियान का हिस्सा होनी चाहिए। 

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  • Web Title:Hindustan editorial Over Maoist terror on 21 december