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बदलते त्योहार

त्योहार कैसे मनाए जाएं? क्या सब कुछ भूलकर उसकी मौज-मस्ती का हिस्सा बना जाए? या फिर पूरी श्रद्धा के साथ उन्हें धार्मिक ढंग से परंपरागत अनुष्ठानों के बीच मनाया जाए? ये ऐसे सवाल हैं, जिनसे दुनिया के लगभग हर धर्म को कभी न कभी जूझना पड़ता है। भारत में हम हर होली या दीपावली पर इस सवाल से जूझते हैं, तो पश्चिम के लोग लगभग हर क्रिसमस पर। यह सच है कि हमारे ज्यादातर त्योहारों का उद्भव और विकास धर्म से जुड़ा हुआ है, लेकिन इन त्योहारों को मनाया सामाजिक और सांस्कृतिक तौर पर जाता है। धार्मिक आस्थाएं और परंपराएं अक्सर उतनी तेजी से नहीं बदलतीं, जितनी तेजी से समाज और संस्कृति बदल जाते हैं। हर पीढ़ी अपनी सामाजिक जरूरतों और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति से अपने त्योहारों में कुछ नया जोड़ देती है और पुरानी पीढ़ी के लोग सिर्फ इतना ही कह पाते हैं कि अब त्योहार में वह बात नहीं रही, जो पहले हुआ करती थी। आमतौर पर ऐसी बातों का लहजा शिकायती होता है, पर बदलाव को भला कौन रोक सकता है?

पिछले दिनों प्रतिष्ठित शोध एजेंसी ‘प्यू रिसर्च’ ने इस पर काफी शोध किया कि अमेरिका के लोग क्रिसमस की छुट्टी को किस तरह देखते हैं? इसके लिए उसने 1,500 से भी ज्यादा लोगों से बात की। इन लोगों में बच्चे शामिल नहीं थे, क्योंकि बच्चों के लिए त्योहार का धार्मिक पक्ष उतना महत्वपूर्ण नहीं होता, जितना कि इसका मस्ती वाला पक्ष होता है। और इस शोध में पाया गया कि ज्यादातर लोग मानते हैं कि क्रिसमस भले ही धार्मिक छुट्टी है, लेकिन इसके आयोजनों में से धार्मिक पक्ष धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। वहां 56 प्रतिशत लोगों की राय यही है। हालांकि इनमें से 32 प्रतिशत लोग ही इसे लेकर कुछ या ज्यादा चिंतित हैं। अमेरिका में 90 फीसदी से ज्यादा लोग क्रिसमस मनाते हैं और 55 फीसदी लोग मानते हैं कि यह मूल रूप से एक धार्मिक त्योहार ही है। 46 प्रतिशत लोग तो इसे पूरी तरह धार्मिक त्योहार के तौर पर ही मनाते हैं। बाकी नौ प्रतिशत का मानना है कि यह धार्मिक त्योहार तो है ही, साथ ही सांस्कृतिक त्योहार भी है। जबकि यह पाया गया कि अमेरिका के 33 प्रतिशत लोग इसे मूलत: सांस्कृतिक त्योहार ही मानते हैं और इसे इसी रूप में मनाते हैं। चार साल पहले ऐसे ही एक सर्वे में पाया गया था कि 59 प्रतिशत अमेरिकी इसे धार्मिक त्योहार ही मानते हैं और 51 प्रतिशत इसे इसी रूप में मनाते हैं। उस सर्वे में एक और चौंकाने वाली बात यह पता चली कि ऐसे लोगों की संख्या भी बढ़ी है, जो क्रिसमस की धार्मिक कथाओं में बहुत ज्यादा विश्वास नहीं करते। 

कुछ लोग मानते हैं कि धर्म को निजी आस्था मानने वाले समाज में त्योहार का सामाजिक और सांस्कृतिक पक्ष मजबूत होगा ही। दूसरे धर्मों के लोग त्योहार के धार्मिक आयोजन में तो आपके साथ नहीं आते, लेकिन वे आसानी से सामाजिक और सांस्कृतिक आयोजनों का हिस्सा बन जाते हैं। यही वह बिंदु है, जहां धार्मिक त्योहारों को एक धर्मनिरपेक्ष जमीन मिलती है। त्योहार अगर एक खुशी है, तो उस खुशी में हर कोई शामिल हो जाता है, भले ही उसकी निजी धार्मिक आस्था कुछ भी हो। हालांकि धार्मिक पक्ष को कम महत्व मिलने से कट्टरपंथी अक्सर दुखी दिखाई देते हैं। लेकिन यह भी सच है कि त्योहार का सामाजिक और सांस्कृतिक पक्ष त्योहार को, और उसके अलावा धर्म को भी एक नया आयाम देता है। कुछ लोग मानते हैं कि हमारे त्योहारों को समाज या संस्कृति उतनी तेजी से नहीं बदल रहे, जितनी तेजी से बाजार बदल रहा है। बेहतर होगा कि इन चिंताओं से अलग होकर हम कहें- मेरी क्रिसमस। और इसकी खुशियों का हिस्सा बन जाएं।

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  • Web Title:Hindustan Editorial on 25 december