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8 अप्रैल, 2020|7:36|IST

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शर्मसार गुरुग्राम

किसी भी शहर या राज्य को बलात्कार की राजधानी जैसी उपमा देना अच्छा तो नहीं लगता, लेकिन जब जनता अपने आसपास के घटनाक्रम से हर दिन अपमानित-असुरक्षित महसूस करे, तब यह सवाल बेमानी हो जाता है। हरियाणा के लगातार घटनाक्रम और गुरुग्राम की ताजा घटना के बाद एक बार फिर ऐसा ही लगता है। हरियाणा के पास तो गर्व करने के तमाम कारण हैं, लेकिन सुर्खियों में वह बार-बार कुछ बेजा हरकतों से ही आया है, जो दुर्भाग्यपूर्ण है। गुरुग्राम में फिर ऐसी ही बेजा घटना घटी है। विवाह समारोह से लौटते एक परिवार को गनप्वॉइंट पर लेकर उसकी औरत के साथ उनके सामने ही बलात्कार हुआ। इससे भी शर्मनाक यह कि जब उस महिला और परिवार ने हिम्मत करके पुलिस को आपबीती सुनाई, तो उसे मामला दर्ज न कराने में ही समझदारी की सीख मिली। यह उन्हीं खट्टर साहब की पुलिस थी, जो चंद रोज पहले ऐसी ही एक घटना के बाद ऐसे मामलों में अभियुक्तों को फांसी दिलाने की वकालत करते दिखाई दी थी। यह वही गुरुग्राम था, जहां तमाम घटनाओं के बाद भी पुलिस नहीं चेती है। यहां बड़ी-बड़ी, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के दफ्तर हैं और इस शहर का शानदार ले-आउट व सुख-सुविधाओं की सब तारीफ करते नहीं अघाते। यह आईटी हब बन चुका वही गुरुग्राम है, जिसे हमारा युवा रोजगार के लिए बेंगलुरु व पुणे से कम नहीं आंकता, बल्कि अपनी प्राथमिकताओं में रखता है। आखिर इतनी खूबियों वाला गुरुग्राम बार-बार शर्मसार हो रहा है, तो क्यों? यह सवाल चिंता बढ़ाने वाला है। 

यह सब उस बालिका दिवस के ठीक पहले हुआ, जिसके बहाने एक बार फिर बड़ी-बड़ी बातें हो रही हैं। महिलाओं के खिलाफ अपराध कम होने के आंकड़े गिनाए जा रहे हैं। लेकिन क्या बेहतर नहीं होगा कि इस बालिका दिवस को हम आंकड़ों की बाजीगरी से नहीं, हकीकत की जमीन पर देखें और महसूस करें। आंकड़ों की कमी तो ताजा घटना के बाद भुक्तभोगी को मिली पुलिसिया सलाह से बखूबी समझ में आ जाती है। इसलिए बात सच्चाई की उस जमीन पर होनी चाहिए, जिस पर साफ लिखा है कि हरियाणा में बीते दस दिनों में हर दिन बलात्कार हुआ है। शुक्रवार को ही फरीदाबाद से उठाकर एक नाबालिग से चलती कार में गैंगरेप की घटना सामने आई थी, जिसके बाद मुख्यमंत्री ने खासी सख्ती बरतने के निर्देश दिए थे। लेकिन हुआ क्या? 

महिलाओं की सुरक्षा और उनके खिलाफ अपराध गंभीर चिंता का मुद्दा रहे हैं। दिल्ली के निर्भया कांड के बाद जैसी हलचल मची, उम्मीद थी कि ऐसी घटनाएं जल्दी सामने नहीं आएंगी, मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ। अकेले हरियाणा में ही ऐसे-ऐसे मामले सामने आए, जो निर्भया कांड की तरह रोंगटे खड़े करने वाले थे। दरअसल यह सब सिर्फ भाषणों, वायदों से होने वाला भी नहीं। इसके लिए सख्त कानून और पुलिसिया सक्रियता की जरूरत थी। कानून तो सख्त हुआ, पर पुलिस अपनी ही रफ्तार चली। अब जब गुरुग्राम जैसी घटना के बाद पुलिस उस परिवार को रिपोर्ट न लिखाने में ही भलाई की सलाह देती दिखाई दी हो, जिसके सामने सब कुछ हुआ हो, तो सारी उम्मीदें खुद ब खुद धराशाई हो जाती हैं। दरअसल यह समाज के जागने, औरत के पक्ष में खड़ा होने का ही सवाल नहीं, पूरे तंत्र को अपराधी और अपराधी में फर्क न करने की समझ विकसित करने का सवाल भी है। यह समझ पुलिस ही नहीं, राजनेताओं में भी विकसित करनी होगी। तभी वादे अमल में उतरेंगे, तभी कानून का पालन सुनिश्चित हो सकेगा। महिलाओं के खिलाफ अपराधों के मामले में तो यह तत्काल होना ही चाहिए। इस बालिका दिवस यह एक बड़ी चिंता के रूप में सामने आए, तो बेहतर होगा। 

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  • Web Title:Hindustan Editorial on 24 January