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5 जून, 2020|3:17|IST

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घोटाले का सच

कांग्रेस कह रही है कि 2-जी घोटाले के मामले में सीबीआई अदालत का फैसला आने के बाद भारतीय जनता पार्टी का स्वांग जगजाहिर हो गया है। इस मसले को उठाते हुए आज पार्टी ने संसद में भी काफी हंगामा किया। दूसरी तरफ, भाजपा का कहना है कि कांग्रेस की 2-जी आवंटन की नीति भ्रष्ट थी, यह पहले से ही सबको पता है, इस फैसले का उस सच पर कोई असर नहीं पड़ने वाला। यह भी सच है कि फैसला कुछ भी होता, राजनीतिक तर्क-वितर्क इसी तरह से होने थे। और यह सभी जानते हैं कि राजनीतिक बयानबाजी व आरोपों के बीच किसी मामले का सच कभी नहीं खोजा जा सकता, घपले-घोटालों का तो बिल्कुल भी नहीं। लेकिन इस पूरे मामले को अगर राजनीतिक उठा-पटक से अलग करके देखें, तो भी चीजों को समझ पाना आसान नहीं है। इस पूरे मामले में दिल्ली की सीबीआई अदालत का फैसला सबसे ताजा तथ्य है, जिसमें इस मामले के सभी अभियुक्तों को बरी कर दिया गया है। हालांकि अदालत ने सिर्फ यही कहा है कि सीबीआई इस मामले में लगाए गए आरोपों को साबित करने में नाकाम रही है। सीबीआई की यह नाकामी कोई नई चीज नहीं है, उसे पिंजरे में बंद तोता भी कहा जाता है, जो सरकार के इशारे पर बोलता है। लेकिन यह मामला ऐसा नहीं है। इस मामले में सीबीआई के सामने कम से कम पिछले साढ़े तीन साल से कोई राजनीतिक बाधा तो नहीं ही थी, उसके बावजूद अगर वह आरोप साबित नहीं कर पाई, तो सवाल या तो आरोपों पर उठेंगे या फिर उसकी काबिलियत पर।

बेशक, एक तर्क यह भी उठाया जाता रहा है कि 2-जी घोटाले जैसी कोई चीज थी ही नहीं। लेकिन यह तर्क भी बहुत पुख्ता नहीं है। विनोद राय की अगुवाई में भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने अपनी रिपोर्ट में 2-जी आवंटन की नीति के कारण सरकार को हुए नुकसान का एक आकलन पेश किया था। इसी से यह माना गया कि 2-जी स्पेक्ट्रम के आवंटन में भारी घोटाला हुआ है। बाद में 2-जी आवंटन को लेकर फोन पर हुए ढेर सारे वार्तालाप लीक हुए, तो घोटाले की बात और भी पुख्ता हुई। बाद में सुप्रीम कोर्ट तक इस नतीजे पर पहुंचा कि 2-जी आवंटन पर यूपीए सरकार की नीति गलत थी। संचार मंत्री ए राजा के कार्यकाल में जिस तरह से यह आवंटन हुआ था, उसे अदालत ने असांविधानिक और मनमाने ढंग से किया गया काम माना था। यही नहीं, इस दौरान आवंटित हुए सभी 122 2-जी स्पेक्ट्रम लाइसेंस सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिए थे। बाद में आवंटन की यह प्रक्रिया नए सिरे से चलाई गई थी। इसी के बाद से इस मामले में भ्रष्टाचार का मुद्दा राजनीतिक रूप से गरम हुआ था। इसमें ए राजा और द्रमुक सांसद व तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री एम करुणानिधि की बेटी कनीमोई समेत कई लोगों को जेल भी जाना पड़ा था। पर अब ये सब भ्रष्टाचार के आरोपों से बरी हो चुके हैं।

तो क्या यह मान लिया जाए कि प्रक्रिया भले ही असांविधानिक थी, पर उसमें कोई भ्रष्टाचार नहीं हुआ? प्रक्रिया गलत थी या सही, यह एक तकनीकी मुद्दा होता है और इसे साबित करना शायद उतना कठिन नहीं होता। लेकिन भ्रष्टाचार हुआ है, इसे साबित करने के लिए सुबूतों की जरूरत होती है, जो सहज ही उपलब्ध नहीं होते। सीबीआई जैसी एजेंसियों से इसकी उम्मीद की जाती है, पर उसकी नाकामी कोई नई बात नहीं है। यह भी सच है कि हमारे यहां भ्रष्टाचार के बहुत कम मामले ही अंतिम परिणति तक पहुंचते हैं। यह भी कहा जाता है कि पूरी व्यवस्था ऐसी है, जिसमें भ्रष्टाचारियों को बच निकलने के बहुत से रास्ते मिल जाते हैं। सजा देना तो दूर, अक्सर हम सच तक भी नहीं पहुंच पाते।

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  • Web Title:Hindustan editorial on 22 december