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चीन की दादागिरी

अमेरिका का रक्षा बजट सिर्फ उसकी रक्षा जरूरतों के खर्च का हिसाब-किताब भर नहीं होता। एक तरह से वह उसकी रक्षा नीति और उसकी प्राथमिकताओं का दस्तावेज भी होता है। भारत के रक्षा बजट में आंकड़े महत्वपूर्ण होते हैं, लेकिन अमेरिका के बजट में महत्वपूर्ण चीज आंकड़ों में नहीं, शाब्दिक विस्तार में होती है। वहां अगर किसी मद में खर्च बढ़ाया जाता है, तो यह भी बताया जाता है कि इसकी जरूरत क्यों है और कैसे है? और इस सबसे उसकी रक्षा नीति की व्याख्या भी हो जाती है। इन बातों की ओर दुनिया का सबसे ज्यादा ध्यान तब जाता है, जब वह अपने रक्षा बजट में खासी बढ़ोतरी करता है, जैसे कि इस साल की गई है। बजट प्रस्तावों के अनुसार, अमेरिका अगले दो साल में अपनी सेना पर होने वाले खर्च में 195 अरब डॉलर की वृद्धि करेगा। फिलहाल हमारे लिए इस वृद्धि से ज्यादा महत्वपूर्ण वे तर्क हैं, जो बजट प्रस्तावों में दिए गए हैं। इन प्रस्तावों में सबसे महत्वपूर्ण खतरा चीन की तरफ से दिखाया गया है। इसमें अमेरिकी रक्षा विभाग यानी पेंटागन ने कहा है कि भारतीय-प्रशांत क्षेत्र यानी इंडो-पैसिफिक के देशों को जिस तरह से चीन दादागिरी दिखा रहा है, वह चिंता की बात है। वियतनाम, कोरिया और जापान जैसे देश इसे लेकर कई बार आपत्ति भी जता चुके हैं। भारत के आस-पास श्रीलंका, मालदीव और म्यांमार जैसे कई देशों में वह कई तरह से सैनिक और व्यापारिक आधिपत्य जमा रहा है, उसकी पिछले कुछ दिनों में काफी चर्चा हुई है। पाकिस्तान को तो खैर अब कुछ लोग चीन का उपनिवेश ही कहते हैं। इतना ही नहीं, चीन से बहुत दूर ऑस्ट्रेलिया तक अपनी चिंता जाहिर कर चुका है। जाहिर है कि ऐसी चिंताओं का अमेरिकी रक्षा बजट में जगह पाना कोई हैरत की बात नहीं है।

हालांकि अमेरिकी रक्षा बजट में चिंता अकेले चीन को लेकर व्यक्त नहीं की गई है। उसमें रूस को लेकर भी चिंता व्यक्त की गई है। रूस को लेकर अमेरिका की चिंता पूर्वी यूरोप तक ही सीमित नहीं है। पश्चिम एशिया में रूस की जिस तरह की दखल है, वह भी अमेरिका की परेशानी का कारण है। सीरिया में तो अमेरिका और रूस परस्पर विरोधी ताकतों को लड़ा ही रहे हैं। उत्तर कोरिया ने जो सिरदर्द अमेरिका को दिया है, उसकी झलक भी इस रक्षा बजट में देखी जा सकती है और ईरान की तरफ से खड़े होने वाले खतरों की भी। हालांकि ये दोनों खतरे उतने बडे़ नहीं हैं, पर दो नई परमाणु ताकतों का उदय अमेरिका की परेशानियां बढ़ा तो रहा ही है। सबसे बड़ा खतरा वह चीन को मान रहा है।

चीन की इस दादागिरी के भारतीय अनुभव बहुत सारे हैं। ताजा अनुभव डोका ला क्षेत्र का है, जहां उसने बेवजह तनाव पैदा किया है और वहां से चीनी सक्रियता की छिटपुट खबरें आती ही रहती हैं। वैसे तो भारत या किसी भी अन्य देश को अमेरिकी रक्षा बजट से ज्यादा लेना-देना नहीं होना चाहिए, लेकिन कोई महाशक्ति जब अपनी दादागिरी दिखाने लगे, तो सभी पर क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय समीकरण बनाने का दबाव आ जाता है। अमेरिका का रक्षा बजट हालांकि अमेरिकी जरूरतों और उसकी सामरिक सोच के हिसाब से बना है, लेकिन कुछ हद तक यह उन देशों को आश्वस्त जरूर कर सकता है, जो चीन के दबाव का सबसे बड़ा शिकार हैं। बाकी यह तो सभी देशों को पता है कि आखिर में इस दादागिरी से निपटने का काम खुद उन्हें ही करना पड़ेगा।

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  • Web Title:Hindustan Editorial on 14 february