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मौसम की पहेली

पिछले हफ्ते की उस शाम न्यूयॉर्क के बिली जीन किंग नेशनल टेनिस सेंटर में अमेरिकी ओपन टेनिस टूर्नामेंट का खेल देखने आए लोगों को इतनी बड़ी उथल-पुथल की उम्मीद नहीं थी। यह माना जा रहा था कि नंबर दो की रैंकिंग वाले स्विस खिलाड़ी रोजर फेडरर अपना मैच आसानी से जीत लेंगे। उनका मुकाबला 55वीं रैंकिंग वाले ऑस्ट्रेलिया के खिलाड़ी जॉन मिलिमन से था। लेकिन वह मैच हार गए। ऐसा नहीं है कि वह पहली बार ऐसे टूर्नामेंट में हारे हों, लेकिन इस तरह की रैंकिंग वाले खिलाड़ी से वह पहली बार हारे।

हार के बाद जब उन्होंने यह तर्क दिया कि बुरी तरह गरमी थी और वह पूरे मैच में पसीना-पसीना हो रहे थे, तो पहले इसे उनका बहाना मान लिया गया। यहां तक कहा गया कि दूसरे दिनों के मुकाबले उस शाम तापमान बहुत ज्यादा भी नहीं था। लेकिन जब इस मैच का और आगे विश्लेषण हुआ, तो एक नतीजा यह भी निकला कि वह उस खिलाड़ी से नहीं, बल्कि मौसम से हार गए। उस दिन वहां आर्द्रता 70 फीसदी थी और तापमान के साथ इसे मिलाकर जो हीट इंडेक्स बनता है, वह बहुत ज्यादा था। कम तापमान और ज्यादा आर्द्रता से पसीना बनता तो बहुत है, लेकिन वह वाष्पित बहुत कम होता है। फेडरर के लिए यह स्थिति नई थी, जबकि उनके खिलाफ खेलने वाले खिलाड़ी ब्रिस्बेन के थे, जहां ऐसा मौसम आम है। फेडरर की इस हार के बाद जलवायु परिवर्तन के कुछ पक्षों पर चर्चा शुरू हो गई, जिन पर आमतौर पर ध्यान नहीं दिया जाता।

जब हम ग्लोबल वार्मिंग की बात करते हैं, तो ऐसे दिनों के उदाहरण देते हैं, जब धूप बहुत तेज निकलती है और हमारी त्वचा झुलसने लगती है। तब इस तथ्य की ओर हमारा ध्यान भी जाता है कि अब लगातार ऐसे दिनों की संख्या बढ़ रही है। लेकिन ग्लोबल वार्मिंग सिर्फ हमारे गरमी के दिनों को ही प्रभावित नहीं कर रही है, बल्कि हमारी रातों पर भी असर डाल रही है। दिन और रात के अलग-अलग अध्ययन से वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि दिन जितने गरम हो रहे हैं, हमारी रातें उसके मुकाबले कहीं ज्यादा गरम हो रही हैं। कई मामलों में तो रातों की गरमी में बढ़ोतरी दिन की गरमी में बढ़ोतरी से दोगुनी है। इसके अलावा, एक और खास चीज यह भी है कि हमारी रातों की हवा में आर्द्रता भी बढ़ रही है। यानी जिसे हम हीट इंडेक्स कहते हैं, वह दिन के मुकाबले रात का अपेक्षाकृत ज्यादा बढ़ रहा है। हीट इंडेक्स का मतलब होता है कि तापमान भले ही ज्यादा न हो, लेकिन उसका हम पर पड़ने वाला असर ज्यादा होता है। बल्कि मौसम का हाल बताने वाली कई वेबसाइट तो किसी शहर के मौसम का हाल बताते समय तापमान और महसूस होने वाले तापमान का अंतर भी बताती हैं। 

यह सब बताता है कि जिसे हम जलवायु परिवर्तन कहते हैं, वह कोई सीधी, सरल, सपाट रेखा नहीं है। इसमें कई उतार-चढ़ाव और उलझाव हैं। इसलिए दुनिया लगातार गरम होती जा रही है, यह एक मोटा निष्कर्ष भर है। इसी गरम होती दुनिया में कई ऐसे दिन भी आ रहे हैं, जो सर्दी के दशकों पुराने रिकॉर्ड तोड़ रहे हैं। कभी हमें लगता है कि ग्लोबल वार्मिंग के चलते कई जगह सूखा पड़ने लगा है, फिर यह खबर आती है कि इसी समस्या के चलते कई जगह भयानक अतिवृष्टि हुई है। इन्हीं उलझनों और जटिलताओं के बीच से हमें ग्लोबल वार्मिंग से जूझने और आगे बढ़ने का रास्ता निकालना है।
 

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  • Web Title:Hindustan Editorial on 10 september