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बाजार का टूटना

एक फरवरी को जिस दिन संसद में बजट पेश हुआ, देश के शेयर बाजार डगमगाने लग पड़े थे। और अगले दिन से तो इसमें अच्छी-खासी गिरावट भी दर्ज होने लगी। जाहिर है कि इस सबका दोष बजट के ही मत्थे मढ़ा जाना था। कहा जाने लगा कि बजट में जिस तरह से लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स की वापसी हुई है, उससे यह तो होना ही था। यह भी कहा गया कि बाजार कंपनी कर में बड़ी कटौती की उम्मीद लगाए बैठा था, बजट में यह नहीं हुआ, तो बाजार नीचे आ गया। हालांकि कुछ लोग यह भी कह रहे थे कि बाजार पिछले साल कुछ ज्यादा ही बढ़ा था, यथार्थ के पास आने के लिए उसका नीचे आना भी जरूरी है। 2017 में शेयर कीमतों से औसतन कमाई 28 प्रतिशत के आसपास हुई थी। जब अर्थव्यवस्था सात फीसदी विकास दर को पार करने के लिए संघर्ष कर रही हो, तो यह 28 प्रतिशत का आंकड़ा कुछ ज्यादा लग ही सकता है। हालांकि शेयर बाजार में ऐसा ही होता है। लेकिन सोमवार तक किसी ने भी नहीं सोचा था कि असल खतरा कहीं और से दबे पांव कदम बढ़ा रहा है। सोमवार को अमेरिकी वॉल स्ट्रीट यानी न्यूयॉर्क शेयर बाजार में जबर्दस्त गिरावट आई, तो तमाम एशियाई बाजार भी मंगलवार को मुंह के बल गिरे। इनमें भारतीय शेयर बाजारों का शामिल होना भी लाजिमी ही था। अलग-अलग शेयर सूचकांक में गिरावट के ब्योरे में न जाएं, तो मोटा अनुमान है कि कुछ ही घंटों में भारतीय शेयर बाजारों में निवेशकों के 9.6 लाख करोड़ रुपये स्वाहा हो गए। हालांकि वॉल स्ट्रीट की गिरावट के सामने यह कुछ भी नहीं है। वहां इंटरनेट सर्च कंपनी गूगल का शेयर 5.2 फीसदी नीचे आया, तो उसका बाजार पूंजीकरण 40 अरब डॉलर गोता लगा गया।

दुनिया भर के शेयर बाजारों में अचानक ही टपक पड़ी इस मंदी की वजह क्या है? ऐसे में शेयर बाजार की भेड़चाल के सच को पकड़ पाना अक्सर आसान नहीं होता। बाजार पहले उछलता या टूटता है, जबकि कारण बाद में ढूंढे़ जाते हैं। लेकिन एक कारण बहुत स्पष्ट है कि अमेरिकी सरकार ने अपने बॉन्ड की ब्याज दर बढ़ा दी थी। बॉन्ड की ब्याज दर बढ़ने का अर्थ होता है कि बहुत से लोग शेयर बाजार से पैसा निकालकर बॉन्ड में लगा देते हैं। यह आशंका इतवार से ही थी और सोमवार को वहां यही हुआ। एक दूसरा कारण यह भी बताया जा रहा है कि भारतीय शेयर बाजारों की तरह ही शेयरों की कीमतें वहां भी जितनी होनी चाहिए थी, उससे कहीं ज्यादा थीं। वैसे हर मंदी के बाद यह एक कारण तो बताया ही जाता है। एक कारण यह भी बताया जा रहा है कि बिटक्वॉइन के कारोबार में टूटन का भी शेयर बाजार पर असर पड़ा है। 

बाजार की ऐसी टूटन अक्सर तात्कालिक होती है और अर्थव्यवस्था पर उसका असर ज्यादा नहीं होता। न ही इसमें अर्थव्यवस्था की किसी खामी की झलक ही है। बाजार का यह भाव जब तक स्थाई और दीर्घकालिक न हो जाए, इससे बहुत ज्यादा डरने की कोई बात नहीं। अगर यह मंदी सिर्फ भारतीय शेयर बाजार में दिखती, तो इसके खतरे हो सकते थे। तब यह डर हो सकता था कि निवेशक दूर भागेंगे, खासकर संस्थागत निवेशक, जो सीधे शेयर बाजार में पैसा लगाते हैं। इस टूटन का स्वरूप विश्व-व्यापी है, इसलिए यह खतरा भी नहीं है। खास बात यह है कि न तो इसका देश की विकास दर पर कोई असर पड़ना है और न ही यह अर्थव्यवस्था के मूल आधार को किसी तरह कमजोर करती है। 

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  • Web Title:Hindustan Editorial on 07 february